हिन्दी कविता, Hindi Kavita

स्त्री की सीमा रेखायें नदी के तट पर जमी रेत मिट्टी की तरह कितना कुछ दे जाती हो उपजाऊ सा स्री और बढ़
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ज़्यादातर उदासी खर्च हो चुकी होती है चालीस की उम्र तक बची- खुची में भी पुरानापन आ जाता है जैसे पुरानी किताबों के
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श्री राम तुम वन में भले, घर तो खंडहर हो चुके मन भी मलिन हो गये अब वहाँ कैसे रहोगे हे राम तुम
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