नई दिल्ली: प्रधान मंत्री नरेंद्र मोदी द्वारा 8 नवम्बर को लिए गए ऐतिहासिक नोटबंदी के फैसले के बाद पचास दिनों तक देश में अफरा-तफरी, अफवाहों और नोट बदलने और जमा करने के लिए आरबीआई के रोज़ बदलते नियमों माहौल रहा. बैंकों के आगे लंबी-लंबी लाइनों और ख़ाली पड़े एटीएम आम नज़ारे बन चुके थे लेकिन सारा देश प्रधान मंत्री के काला धन पकड़ने में सहयोग के आह्वान पर मोदी का साथ दे रहा था. हालांकि लगभग 97 % से ज्यादा पुराने 500  और 1000  रुपये के नोटों के बैंकों में वापस जमा हो जाने के बाद काला धन पकडे जाने की उम्मीदें तो धूमिल सी हो गयी थीं लेकिन आज नोटबंदी के बारे में आरबीआई ने कुछ ऐसा कह दिया है कि भाजपा सरकार की नोटबंदी के पीछे नीयत पर सवाल उठने शुरू हो गए हैं.

reserve-bank-puta-modi-government-in-fix-by-suggesting-note-ban-was-modi-governments-ideaदरअसल शुरू से ही मोदी सरकार, ख़ास कर वित्तमंत्री अरुण जेटली नोट बंदी को आरबीआई की सलाह पर लिया गया फैसला बताते आ रहे हैं पर कांग्रेस नेता एम वीरप्पा मोइली की अध्यक्षता में संसद की वित्तीय मामलों की कमिटी के सामने 7 पन्नों के नोट में आरबीआई ने कहा कि सरकार ने 7 नवंबर 2016 को सलाह दी थी कि जालसाजी, आतंकियों को मिलने वाले वित्तीय मदद और ब्लैक मनी को रोकने के लिए सर्वोच्च बैंक का सेंट्रल बोर्ड को 500 और 1000 रुपये के पुराने नोट को हटाने पर विचार करना चाहिए। सरकार की इस सलाह के बाद रिजर्व बैंक ने ज़रा भी देर ना लगाते हुए अगले ही दिन नोटबंदी की अनुशंसा कर दी थी। जिस एजी से रिजर्व बैंक ने यह अनुशंसा सरकार को वापस कर दी उससे यह कयास लगाए जा रहे हैं कि बैंक ने दरअसल सरकार के दबाव में आकर ही ऐसा किया.

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सूत्रों ने बताया कि मोदी नीत भाजपा सरकार की ‘नोटबंदी सलाह’ पर विचार करने के लिए रिज़र्व बैंक के केंद्रीय बोर्ड की विशेष बैठक बुलाई गयी जिसमें केंद्र सरकार की सलाह पर विचार किया गया (या विचार करने का नाटक किया गया).इस बैठक के बाद कुछ ही घंटों में आननफानन में इस बोर्ड द्वारा केंद्र सरकार को 500 और 1000 रुपये पुराने नोट को बंद करने की अनुशंसा भेज दी गई। कुछ देर बाद ही 8 नवंबर को प्रधान मंत्री नरेंद्र मोदी की अध्यक्षता में केंद्रीय कैबिनेट ने 500 और 1000 रुपये के पुराने नोट बंद करने की अनुशंसा कर दी। ध्यान रहे कि सरकार के नोटबंदी फैसले के बचाव में सरकार के सभी मंत्री और नेता लगातार कहते आ रहे थे कि केंद्र सरकार ने आरबीआई की अनुशंसा पर नोटबंदी का फैसला किया था।

बताया जा रहा है कि रिज़र्व बैंक पिछले कुछ सालों से नए सीरीज के नोटों को बाजार में लाने पर काम कर रहा था ताकि नोटों की सुरक्षा और जालसाजी को रोका जा सके। लेकिन इसके साथ ही साथ केंद्र सरकार भी ब्लैक मनी और आतंकियों को मिलने वाले धन पर रोक लगाने की कोशिश में लगी हुई थी। ‘खुफिया एजेंसियों ने रिपोर्ट दी थी कि 500 और 1000 रुपये के नोटों के कारण ब्लैक मनी बढ़ रहा था और साथ ही आतंकियों को वित्तीय मदद में भी इसका इस्तेमाल किया जा रहा था।’ फिर इन समस्याओं से निटपने के लिए केंद्र सरकार और आरबीआई नई सीरीज का नोट जारी करने और 500 और 1000 रुपये के पुराने नोटों को बंद करने का फैसला किया। नोट में कहा गिया कि शुरू में नोटबंदी किया जाए या नहीं इसका फैसला नहीं लिया गया था। नई सीरीज के नोटों के लिए तैयारियां अभी भी जारी थीं।

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इस स्थिति में जबकि सरकार के ऊपर नोटबंदी को लेकर आरोप लगाया जा रहा है कि नोटबंदी ‘खोदा पहाड़ निकली चुहिया, वह भी मरी हुई’ साबित हुई है, रिज़र्व बैंक का यह खुलासा कि नोटबंदी रिज़र्व बैंक का आर्थिक फैसला ना होकर भाजपा सरकार का फैसला (संभवतया राजनीतिक, क्योंकि अभी पांच प्रमुख राज्यों के विधान सभा चुनाव होने वाले हैं) केंद्र की भाजपा सरकार के लिए खासा मुसीबत खड़ा करें वाला हो सकता है.