प्रशांत किशोर की मुलायम से मुलाक़ात, बिहार की तरह महागठबंधन की तैयारी, कांग्रेस हो सकती है शामिल

UP election mahagathbandhan

प्रशांत किशोर की मुलायम से मुलाक़ात, बिहार की तरह महागठबंधन की तैयारी UP election mahagathbandhan

देश के सबसे बड़े राज्य उत्तर प्रदेश में अब राजनीति समाजवादी पार्टी मुखिया मुलायम सिंह यादव के घरेलु झगडे से आगे निकलती दिख रही हैं. अजित सिंह और शिवपाल सिंह यादव की मुलाकातों के बाद उत्तर प्रदेश में विधानसभा चुनावों से पहले राजनीतिक सरगर्मियां हर रोज बदल रही हैं। ऐसी सम्भावना है कि पांच नवम्बर को समाजवादी पार्टी के २५ वें स्थापना दिवस समारोह में महागठबंधन (UP election mahagathbandhan) के बारे में कोई महत्वपूर्ण घोषणा हो सकती है.

UP election mahagathbandhanमंगलवार को कांग्रेस के चुनाव प्रबंधक प्रशांत किशोर ने समाजवादी पार्टी सुप्रीमो मुलायम सिंह यादव से मुलाकात की। बताया जाता है कि दोनों की मुलाकात कांग्रेस और समाजवादी पार्टी के गठबंधन के लिए हुई। इससे पहले प्रशांत किशोर ने उत्‍तर प्रदेश सपा के अध्यक्ष शिवपाल यादव से भी मुलाकात की थी। इस बैठक में जदयू नेता केसी त्‍यागी में भी मौजूद रहे थे। सूत्रों का कहना है कि प्रशांत किशोर बिहार की तरह यूपी में भी महागठबंधन करना चाहते हैं। कांग्रेस उत्‍तर प्रदेश में पांव जमाने के लिए गठबंधन की ताक में है। इससे पहले संकेत आए थे कि पीस पार्टी और अन्‍य छोटे दल उसके साथ आ जाएंगे। अब प्रशांत किशोर का मुलायम से मिलना गठबंधन के संभावित दायरे को व्‍यापक करने की दिशा में कदम हो सकता है। हालांकि अभी दोनों ओर से इस तरह के संकेत नहीं आए हैं।

प्रशांत किशोर ने सपा नेता अमर सिंह के साथ मुलायम सिंह यादव से उनके दिल्ली स्थित आवास पर मुलाकात की. चुनाव की तारीखों की घोषणा से पहले यह मुलाकात संभवत: एक गठजोड़ बनाने की संभावना पर चर्चा के लिए की गई.

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घटनाक्रम से करीबी तौर पर जुड़े सूत्रों ने इस बात की पुष्टि की है कि प्रशांत किशोर ने मुलायम से मुलाकात की. राजनीतिक गलियारों में यह चर्चा है कि मुलायम ने जेडीयू नेता और बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार से बात की, जो दिल्ली में हैं. हालांकि, फिलहाल इसकी पुष्टि नहीं हो पाई है. किशोर ने पिछले साल नीतीश कुमार के सफल विधानसभा चुनाव अभियान का प्रबंध किया था.

पिछले हफ्ते मुलायम के छोटे भाई और प्रदेश सपा प्रमुख शिवपाल सिंह ने जेडीयू के केसी त्यागी और रालोद प्रमुख अजीत सिंह से मुलाकात की थी, ताकि उन्हें सपा की 25वीं वर्षगांठ के मौके पर 5 नवंबर को लखनऊ आने का न्योता दिया जा सके. शिवपाल ने कहा था कि लोहियावादियों और चरण सिंह के अनुयायियों को उत्तर प्रदेश में भाजपा को हराने के लिए हाथ मिलाना चाहिए.

मिली जानकारी के मुताबिक कांग्रेस के कुछ आला नेताओं ने भी इस बात की पुष्टि की है कि उनकी पार्टी किसी जड़ता की शिकार नहीं है और अगर एक स्वस्थ गठबंधन (UP election mahagathbandhan) बनने की स्थिति राज्य में पैदा होती है तो वो उसपर विचार कर सकते हैं.

बिहार में महागठबंधन की ऐतिहासिक सफलता के बाद उसी फार्मूले को यूपी में दोहराने की तैयारी की जा रही है. अगर ऐसा हो पाता है तो भाजपा विरोधी दल सूबे में एक मज़बूत गठबंधन खड़ा कर पाने में सफल होंगे और चुनाव पर इसका व्यापक असर भी पड़ेगा.

कांग्रेस के पास कुछ दलित वोट और कुछ अगड़ों का वोट है. इसमें गैर जाटव दलित जातियां और कुछ अगड़े आते हैं. नीतीश कुमार के पास अति पिछड़ों को रिझाने का दमखम है तो मुलायम सिंह यादव के पास यादव और मुसलमान मतदाता है. अजीत सिंह इसमें जाटों के कुछ वोट जोड़ सकते हैं जो कई सीटों पर जीत के लिए निर्णायक हो सकता है.

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महागठबंधन मायावती के लिए भी चिंता की बात होगा. इसबार मायावती का चुनाव दलित-मुस्लिम समीकरण पर टिका है. अगर मुसलमानों को एक मज़बूत महागठबंधन (UP election mahagathbandhan) का विकल्प मिल जाता है तो वो वापस नेताजी के पाले में आना पसंद करेंगे. मायावती अब किसी टीवी चैनल या अख़बार से बात करती हैं, तो दावा करती हैं कि बहुजन समाज पार्टी इसी रास्ते सत्ता में लौटने जा रही है.

उनका कहना है, “इस बार उत्तर प्रदेश में मुसलमानों का वोट नहीं बंटेगा. मुस्लिम समुदाय समाजवादी पार्टी में जारी तोड़फोड़ देख रहा है और इस बार बहुजन समाज पार्टी को वोट देगा.”

उत्तर प्रदेश में मुस्लिम वोटरों की संख्या 19 फ़ीसद के क़रीब हैं. राजनीतिक विश्लेषकों का आकलन है कि ऐसे दावों ने उन्हें प्रदेश की राजनीति के केंद्र में ला दिया है. उनकी भूमिका अचानक अहम हो गई है. बहुजन समाज पार्टी के अलावा समाजवादी पार्टी और कांग्रेस भी मुसलमानों के वोट के भरोसे चुनावी ‘व्यूह रचना’ तैयार कर रही हैं.

आधिकारिक तौर पर तो समाजवादी पार्टी के नेता भी इस मुलाक़ात की जानकारी न होने की बात कर रहे हैं, लेकिन जानकारों का कहना है कि ये मुलाक़ात हुई भी है और गठबंधन के संबंध में चर्चा भी हुई है. गठबंधन से अभी तक सपा भले ही मना करती आ रही थी, लेकिन अब उसे इसकी ज़रूरत महसूस हो रही है.

पार्टी नेता कहते हैं, “2014 के बाद से जिस तरह से देश में सांप्रदायिक शक्तियां मज़बूत हुई हैं, उन्हें देखते हुए गांधीवादी और लोहियावादी दलों का साथ आना ज़रूरी है.”

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सरिता महर

Author: सरिता महर

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