दुनिया में ऐसे कई अजीबो-गरीब जीव-जंतु हैं. जो आज भी विज्ञान के नज़रों से छुपे हुए हैं. ऐसा ही एक जीव हाल ही में भारत में केरल के जंगल में पाया गया है. वैसे तो यह है एक मेंढक लेकिन दिखने में इतना छोटा है कि आप खुली आँखों से शायद ही इसके शरीर के सारे अंगों को देख सकें.

केरल के पश्चीम घाट के जंगलों में इस मेंढक के अलावा और भी तीन बड़े मेंढकों की प्रजाति पाई जाती है. लेकिन ये मेंढक अपने छोटे आकार के कारण चर्चे में है. अब तक इस तरह के सात मेंढकों को खोज लिया गया है. केवल जमीन पर रहने वाले इस मेंढक की ख़ास बात यह है कि ये केवल रातों में निकलते हैं और कीट पतंगों के तरह आवाज़ नकालते हैं. ये मेंढक आकृति में इतने छोटे हैं कि आपके ऊँगली के नाखून पर आसानी से बैठ सकते हैं.

जानकारों के मुताबिक पश्चिमी भारत के जगलों में जीव जंतु के ऐसे कई दुर्लभ प्रजाति पाए जाते हैं. लेकन ये प्रजातियाँ खतरे में हैं. इस तरह के दुर्लभ जीव कई सालों के खोज के बाद मिले हैं. दिल्ली विश्वविद्यालय की सोनाली ग्रेग कहती हैं कि, “ये नन्हें मेंढक सिक्के या अंगूठे के नाखून पर भी बैठ सकते हैं.”

सोनाली ये भी कहती हैं कि, “ये नन्हें मेंढक इतनी अधिक तादाद में हमें मिले हैं कि हम हैरान हैं. लगता है आकार में बहुत छोटे होने, एकांतप्रिय और कीटों की तरह आवाज करने के कारण शोधकर्ता इन्हें अब तक नजरअंदाज करते आ रहे थे.” आपको बता दें कि सोनाली एक ऐसी वैज्ञानिक समूह की सदस्य हैं. जो ख़ास तौर पर नए जीवों के तलाश में जुटी हुई है.

छोटे आकर में पाए जाने वाले इस प्रजाति के मेंढकों को ‘निक्टीबाट्रेचस’ नाम से जाना जाता है. इस समूह में कुल 28 मेंढक आते हैं. जिनमें से तीन मेंढकों का आकर 18 मिमी से भी कम है. वैज्ञानिकों के मुताबिक मेंढकों की ये प्रजाति लगभग 7-8 करोड़ साल पुरानी है. हालाँकि ज्यादातर नये प्रजाति के मेंढक मानव बस्ती से सटे इलाकों में रहते हैं.

आपको बतादें कि इस पुरे शोध का नेतृत्व करने वाले प्रोफेसर एसडी बीजू कर रहे हैं. बीजू ने अब तक भारतीय नस्लों के 80 से अधिक उभयचरों की खोज की है. बीजू कहते है कि, “पश्चिमी घाट पर पाए जाने वाले मेंढकों में से एक तिहाई, यानी लगभग 32 फीसदी से अधिक मेंढक पहले से खतरे में हैं. नई मिली सात प्रजातियों में से पांच पर गंभीर खतरा है. जिन्हें तुरंत संरक्षण देने की जरूरत है.” मेंढकों की नौ प्रजाति के बारे में यूके चैरिटी के संरक्षण प्रमुख डॉक्टर लॉरेंस का कहना है कि ये प्रजाति वैश्विक रूप से काफी महत्व रखते हैं.