Global Warming Essay in Hindi for Class 5/6 in 100 words

ग्लोबल वार्मिंग का अर्थ है पर्यावरण में बढ़ता तापमान। सूर्य की गर्मी से धरती लगातार गर्म हो रही है और इसका मुख्य कारण है पर्यावरण में कार्बन डाईआक्साईड की मात्रा में वृद्धि। इस कार्बन डाईआक्साईड के स्तर के बढ़ने का मुख्य कारण है, धरती पर घटती पेड़ों की संख्या जो कि हवा को शुद्ध करने का कार्य करते हैं। बढ़ते तापमान के कारण धरती पर मौसम में अत्यधिक परिवर्तन, कहीं बाढ़ तो कहीं तूफान, फसलों को नुकसान के कारण खाद्य सामग्री में कमी व कई प्रकार की बीमारियाँ बढ़ रही हैं। इन सबसे निपटने के लिए हमें अपने पर्यावरण को स्वच्छ रखने की आवश्यकता है।
Global Warming Essay in Hindi

Global Warming Essay in Hindi for Class 7/8 in 200 words

ग्लोबल वार्मिंग की समस्या सम्पूर्ण विश्व में चर्चा का मुख्य विषय बनी हुई  है क्योंकि इससे धरती के लगातार बढ़ते तापमान के कारण धरती पर जीवन की संभावनाएं कम होने का भय बना हुआ है। यदि इसके समाधान के लिए जल्दी ही कदम नहीं उठाये गये धरती पर जीवन एक कल्पना बन कर रह जायेगा।

धरती पर इस बढ़ते तापमान से समुद्री जल के स्तर में वृद्धि हो रही है, वर्षा प्रचुर मात्रा में न होने के कारण कई देशों में सूखा पड़ रहा है जिसका सीधा असर फसलों पर पड़ रहा है और खाद्यानों की कमी हो रही है। पर्यावरण में घुली हानिकारक गैसों के कारण नई बीमारियाँ उत्पन्न् हो रही हैं। इन सबका सीधा असर भविष्य में जीवन की सम्भावनाओं की कमी के रूपमें दिखाई दे रहा है।

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कोई खास वर्ग अथवा अकेला  देश ही इसके लिए जिम्मेदार नहीं हैं। हम सब की लापरवाही का ही यह नतीजा है कि हमें प्रकृति के इस रूप का सामना करना पड़ रहा है। अतः हम सबको मिलकर अपनी धरती को ग्लोबल वार्मिंग से होने वाले और अधिक नुकसान से बचाना होगा। हर स्तर पर इसके प्रति जागरूकता फैलानी होगी। बच्चों को इसके कुप्रभावों से अवगत कराकर उन्हें राह दिखानी होगी ताकि वे इस समस्या से लड़ने में अपना सहयोग दे सकें।

Global Warming Essay in Hindi for Class 9/10 in 500 words

धरती की सतह का तापमान लगातार बढ़ते रहने के कारण दुनिया को ग्लोबल वार्मिंग की समस्या का सामना करना पड़ रहा है। जिसके कारण धरती पर जीवन का अस्तित्व ही खतरे में पड़ गया है। कई प्राकृतिक आपदायें पृथ्वी पर बढ़ती जा रही हैं। जिस कारण पृथ्वी पर पर्यावरण का संतुलन बिगड़ गया है। इसके कई नुकसान तो ऐसे हैं जिनकी भरपाई करना असंभव है। किंतु इससे पहले कि यह स्थिति और विकट हो हमें इसे समझ कर इससे निपटने के उपायों पर ध्यान देना होगा।

धरती पर बढ़ती आबादी ने जरूरतों को भी बढ़ाया है और इन जरूरतों को पूरा करने के लिए आज हम औद्योगिक इकाइयों और प्राकृतिक संसाधनों पर इतने अधिक निर्भर हो गये हैं कि बेतहाशा रूप से इनका प्रयोग कर रहे हैं। प्रकृति की प्रदूषण को अवशोषित करने की क्षमता कम होती जा रही है और औद्योगिक इकाइयों से ग्रीन हाऊस गैसों का स्राव बढ़ता जा रहा है। ये ग्रीन हाऊस गैस हैं – कार्बन डाईआक्साईड, मिथेन जो कि कार्बनिक पदार्थों के सड़ने पर बनती है और वातावरण में मिलती है, नाइट्रोजन का आक्साईड, कार्बन कम्पाउण्ड आदि। ये सब गैसें जब पर्यावरण में मिलती हैं तो पर्यावर्णीय संतुलन को बिगाड़ देती हैं। इन गैसों के उत्सर्जन से वातावरण में ओजोन लेयर का क्षरण हो रहा है। ओजोन लेयर हमें सूर्य की हानिकारण अल्ट्रा वायलट किरणों से बचाती हैं। किंतु इसकी कमी के कारण इसका प्रभाव साफ-साफ देखने को मिल रहा है। ग्रीन हाऊस गैसों के निकलने का कारण  प्रकृति के साथ-साथ मानवीय कारण भी है। अपने स्वार्थ के लिए अंधाधुध पेड़ों की कटाई, रसायनों का प्रयोग, अत्यधिक गर्मी के कारण एयर कण्डिशनर के प्रयोग से निकलने वाली गैस आदि इसके कई कारण हैं।

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आज के समय में गर्मी के मौसम में काफी हद तक बढ़ोतरी, गर्म हवाओं में बढ़ोतरी एवं सर्दी के मौसम में काफी कमी देखी जा रही है। बेमौसमी बरसात कई समस्याओं को जन्म दे रही ही। ग्लेषियर एवं बर्फ की चोटियाँ पिघलती जा रही हैं जिससे समुद्री जल के स्तर में वृद्धि हो रही है। जिससे ग्लेशियरों की संख्या में भी कमी हुई है। अंटार्कटिका में ओजोन परत में कमी आई है। महामारी, चक्रवात, सुनामी, भूस्खलन और भी कई ऐसी आपदायें हैं जिनके लिए ग्लोबल वार्मिंग जिम्मेदार है और ग्लोबल वार्मिंग के लिए हम।

इस प्रभाव को कम करने के लिए कुछ स्थाई समाधान निकालने की आवश्यकता है। आम जनता को इसका मतलब, कारण और प्रभाव की ओर जागरुक करना चाहिये। कई सरकारी एवं गैर सरकारी संस्थायें, शिक्षण संस्थायें, निजी एजेंसियां इस ओर कार्य कर रही हैं। लेकिन इन प्रयासों में और अधिक तेजी की आवश्यकता है। निजी स्तर पर मनुष्य को चाहिये कि कई लोगों के एक ही स्थान पर जाते हुए अलग-अलग वाहन प्रयोग में न लायें। बिजली की बजाय सौर ऊर्जा का प्रयोग करें। तेल और कोयले के प्रयोग में कमी लायें। जितना हो सके वृक्षारोपण करें। जीवन के किसी भी क्षेत्र में रसायनों का प्रयोग कम एवं प्राकृतिक उपायों का प्रयोग अधिक करना चाहिये। ग्रीन हाऊस गैसों का उत्सर्जन कम से कम करने की कोशिश करनी चाहिये।