लोग मिलते हैं बदलते हुए मौसम की तरह

ग़ज़ल

कभी गुंचा कभी शोला कभी शबनम की तरह
लोग मिलते हैं बदलते हुए मौसम की तरह

मेरे महबूब मेरे प्यार को इलज़ाम न दे
हिज्र में ईद मनाई है मुहर्रम की तरह

मैंने खुशबू की तरह तुझको किया है महसूस
दिल ने छेड़ा है तेरी याद को शबनम की तरह

कैसे हमदर्द हो तुम कैसी मसीहाई है
दिल पे नश्तर भी लगाते हो तो मरहम की तरह

– राना सहरी

 

बारिश – देवेंद्र आर्य की भीगी हुई कविता

बारिश

ढंक दो
पानी भींग रहा है बारिश में
ठंड न लग जाए ।

देवेंद्र आर्य की एक भीगी हुई कविता बरस रहे हैं पेड़ हज़ारों पत्तों से
भींग रही है हवा झमाझम खोले केश
छींक न आए ।

निर्वसन नदी तट से दुबकी दुबकी लगती
बादल अपनी ओट में लेके चूम रहा है बांह कसे ।

चोट सह रही हैं पंखुरियां
पड़ पड़ पड़ पड़ बूंदों की
अमजद खां के स्वर महीन संतूरों पर
जाकिर के तबलों की थापें
बारिश है ले रही अलापें बीच बीच में भीमसेन सी

गंध बेचारी भींग न जाए इस बारिश में ।

बहुत दिनों के बाद खेलतीं बैट-बाल
गलियां सड़कों पर उतर आई हैं
तड़ तड़ तड़ तड़ बज उठती बूंदों की ताली

बिजली चमकी
या चमका है सचिन का बल्ला
या गिर गया सरक के पल्ला स्वर्ण कलश से
बोल रही है देह निबोली भीगी भीगी
सिहर उठे मौसम के सपने

ढंक दो ,
यह काला चमकीलापन शब्दों का
खुरच न जाए इस बारिश में ।

* देवेंद्र आर्य

 

जीवन को वरदान बना दो – आशीष श्रीवास्तव की कविता

।।जीवन को वरदान बना दो।।

CEREBRAL PALSI AFFECTED CHILDमस्तिष्क पक्षाघात से जूझ रहा हूँ
छोटा-सा सवाल पूछ रहा हूं ?

क्यों नहीं हो सकता मुझपे खर्च
वैज्ञानिक क्यों नहीं करते रिसर्च।

रोबोट में तो डाल रहे संवेदना
समझ नहीं रहा कोई मेरी वेदना।

क्यों रहूं मैं किसी पर निर्भर
मैं भी होना चाहता हूं आत्मनिर्भर।

अंतरिक्ष के रहस्य जानना चाहता हूं
मैं भी इंसान होना चाहता हूं ।

कई रोगों का तो मिटा दिया धब्बा
मैं थामे हूं अब भी दवाईयों का डब्बा।

क्या कमाल नहीं, तुमने दिखला दिए
आविष्कारों से उजियारे ला दिए।

देखना बुझे न विश्वास के दीये
मैं भी खुशियां के जलाऊं दीये।

अरे क्यों आपस में लड़ते हो
किससे होड़कर जलते हो।

लड़ना ही है तो निःशक्तता से लड़ो
सच्चे इंसान बन आगे बढ़ो।

बस एक ही सवाल मुझे है सालता
कब दूर होगी दुनिया से विकलांगता।

जीवन को वरदान बना दो
मुझको भी हंसना सिखा दो।

हे महान वैज्ञानिक! तुम सुन लो मेरी बात
इस धरा से समाप्त कर दो मस्तिष्क पक्षाघात

उचित इलाज के अभाव में हो न किसी पे आघात
इस दुनिया से दूर भगा दो मस्तिष्क पक्षाघात

मस्तिष्क पक्षाघात यानी सेरेब्रल पाल्सी : ऐसे बच्चे जो जन्म के समय नहीं रोते या जिन्हें पर्याप्त ऑक्सीजन नहीं मिल पाती, वे बहुविकलांगता का शिकार होकर बाकी की जिंदगी रेंगते हुए अथवा दूसरे के सहारे जीने को विवश होते हैं। इन बच्चों की आयु कम होती है, लेकिन इनकी संख्या कहीं अधिक है।

– आशीष श्रीवास्तव
पटकथा लेखक, मध्यप्रदेश

जीवन का हर दिन होली है ! (Holi par Kavita)

जीवन का हर दिन होली है !

Holi par kavita jeevan ka har din holi haiकहीं एक नन्हा सा बिरवा उपज रहा है, धीरे-धीरे
सोख  रहा है  थोड़ा पानी,  थोड़ी  मिट्टी, धीरे-धीरे
बड़ा एक दिन होगा, उसकी  शाखों पर  होंगे पत्ते
भर  देगा   हरियाली  मेरी  आँखों  में,  धीरे-धीरे
जीवन का हर दिन होली है !

 

 
जिसकी   चादर   में   सिमटे,  ये   सूरज,   तारे  हैं  सारे
जिसके आँचल में आ सिमटे बादल, अपना  सब कुछ वारे
जिसका  विस्तार, निमंत्रण  पाखी को  देता है, उड़  जा रे
उस  नीले  अम्बर   का  नीलापन,  मेरी  आँखों  के  धारे
जीवन का हर दिन होली है !

 

 
दिनभर जलकर, थककर, दिनकर का स्वर्णिम-ओज  हुआ खाली
ठंडी   बयार    के    मंद – मंद    झोंकों   ने   थपकी    दे   डाली
मानस-मन   की   सारी   पीड़ा,  ज्यों   अपने  अंतस   में   पाली
ढलती   शामों   ने   आकर   मेरी   आँखों   में   भर   दी   लाली
जीवन का हर दिन होली है !

 

 
पीली-राखी,  पीली-हल्दी,  पीली सरसों,  पीली चादर
सिन्दूर  सुहागन  मांगों में,  धानी-धानी लहरी चूनर
प्रेम-पिपासु नयनों में बिखरा-बिखरा दूध और केसर
रंगों का उत्सव मनता है पल-पल में देखो जीवन भर

जीवन का हर दिन होली है !

– पुष्पेन्द्र वीर साहिल

वसंत आगमन पर संध्या नवोदिता की कविता

sandhya navoditaआदमी में बहुत कुछ होता है
थोडा पेड़, थोड़ी घास, थोड़ी मिट्टी,
थोड़ा वसंत

थोड़ा सूखा, थोड़ी बाढ़

इस दुनिया में ऐसा कुछ नहीं
जो आदम के भीतर न हो

ऐसा कोई भाव नहीं, ऐसा कोई रस नहीं
ऐसा कोई फूल, ऐसी कोई गन्ध नहीं

आदमी में सब मिलता है
आदमी में सब खिलता है

आदमी सबमें मिलता है
आदमी सबमें खिलता है

वो स्वाद, वो मेघ, वो बूँदें, वो नदी,
वो समन्दर, वो पहाड़

वो हिरन से लेकर शेर तक से लगाव

वसंत आदमी का अपने होने से प्यार है
वसंत हमारे अस्तित्व का प्यारा गहन स्वीकार है
वसंत हमारे जिन्दा होने की गवाही है
वसंत हर दुःख से सुख की उगाही है

वसंत यूँ उगता है चेतना के संसार में
जैसे धरती डूब गयी हो सूरज के प्यार में

वसंत हमारी अनकही अभिलाषा है
वसंत बार बार लगातार ज़िन्दगी की आशा है

वसंत की लय बस यूं ही बंधी रहे
ज़िन्दगी में भूख, गम, कष्ट से दूरी रहे
हर गम की लड़ाई का जवाब हो वसंत
मेरे तुम्हारे मिलने का त्यौहार हो वसंत

संध्या जी हिन्दी की ख्याति प्राप्त कवियित्री एवं लेखिका हैं और समसामयिक विषयों पर अपनी राय बेबाकी से व्यक्त करने के लिए जानी जाती हैं।  उनके फेसबुक पेज के लिए यहाँ से जाएँ – https://www.facebook.com/sandhya.navodita

संध्या नवोदिता

दाढ़ी खींचने की सजा – अकबर बीरबल की कहानियां

एक दिन, बादशाह अकबर (Akbar) बहुत विचारशील मुद्रा में दरबार में आए।  उन्होंने दरबार में उपस्थित अपने सभी मंत्रियों की तरफ देखा और कहा, ”माननीय मंत्री, मुझे बताएं कि जिसने मेरी दाढ़ी खींचने की हिम्मत की है, उसे मैं कौन सी सजा दूं?“

दाढ़ी खींचने की सजा - अकबर बीरबल की कहानियां

दरबार में सभी इस तरह के अजीब सवाल पर चिंतित हो गए। इस प्रकार के अपराध के लिए हर कोई आपस में चर्चा करने लगा। कौन बादशाह की दाढ़ी खींचने की हिम्मत करेगा?

मंत्रियों में से एक ने कहा, ”महाराज, जिस किसी ने भी यह हरकत करने की कोशिश की है, उसके हाथ काट लेने चाहिए।“

दूसरे मंत्री ने कहा, ”जी महाराज, उसे मृत्यु की सजा ही मिलनी चाहिए।“

फिर एक और मंत्री ने खड़े होकर कहा, ”महाराज, इस तरह के दैत्य को उम्र कैद की सजा मिलनी चाहिए। उसे चूहों के साथ तहखाने में फेंक देना चाहिए।“

उपयुक्त सजा के लिए कई विचार आने लगे। जैसे वह चर्चा में बढ़ते गए सभी मंत्री और भी रचनात्मक होते गए। अकबर (Akbar) और भी मजे के साथ उन सभी की बातों को सुन रहा था। अंत में उन्होंने बीरबल (Birbal) की तरफ देखा और कहा, ”क्यों प्रिय बीरबल, तुम इतने शान्त क्यों हो?“ तुम्हारे मुताबिक मेरी दाढ़ी खींचने की हिम्मत करने वाले के लिए उपयुक्त सजा क्या होनी चाहिए?

बीरबल (Birbal) उठा और बादशाह की ओर सम्मान से सिर झुकाकर बोला, ”महाराज! उस पर चुंबन की बौछार करनी चाहिए, उसे गले लगाना चाहिए और उसे खाने के लिए खूब सारी मिठाईयां देनी चाहिए।“

यह सुनकर दरबार में सभी एक बार फिर हैरान हो गए। एक मंत्री ने कहा, ”महाराज! बादशाह की दाढ़ी को खींचना एक जुर्म से कम नहीं है और बीरबल (Birbal) चाहते हैं कि उस इंसान को मिठाईयां दी जायें।“ अकबर (Akbar) मुस्करा रहे थे। उन्होंने बीरबल (Birbal) से पूछा, ”आपको क्यों लगता है कि यह एक उपयुक्त सजा है?“ बीरबल (Birbal) ने जवाब दिया, ”महाराज, आपके पोतों के अलावा आपकी दाढ़ी खींचने की हिम्मत और कौन करेगा?“

बीरबल (Birbal) सही था। उस सुबह, जब बादशाह अपने पोते के साथ खेल रहे थे, तब उसने शरारत से अपने दादा की दाढ़ी को खींच लिया था। अकबर (Akbar) ने सोचा, यह अपने मंत्रियों की परीक्षा लेने का एक अच्छा विचार है, इसलिए उन्होंने यह अजीब सवाल पूछा था।

केवल बीरबल (Birbal) सही ढंग से सवाल का जवाब देने में सक्षम था। अकबर (Akbar) ने उसके बुद्धिमान विचार के लिए सोने का एक थैला बीरबल (Birbal) को भेंट किया।

खूं से लिखी, वो किताब ढूंढ़ता हूँ – आनंद मधुकर

anand madhukarठौर  ढूंढ़ता  हूँ, ठाँव  ढूंढ़ता  हूँ ,
शहर में कहीं अपना गाँव ढूंढ़ता हूँ.

जाने सफर में कहाँ खो गया हूँ ,
ज़मीं से जुदा अपने पाँव ढूंढ़ता हूँ.

उम्र ने सिखाये मसलिहत के माने ,
वो नौजवान तेवर, वो ताव ढूंढ़ता हूँ.

कोई चिन्गारी दबी रह गयी हो,
मुंज़मिद दिलों में अलाव ढूंढ़ता हूँ.

लफ्ज़ बेमानी, कलम थक गयी है,
खूं  से लिखी, वो किताब ढूंढ़ता हूँ.

~ आनंद मधुकर

https://www.facebook.com/anand.madhukar.39

हिंदुस्तान के हिस्से में तो महज़ गुलामी है आई

हिंदुस्तान के हिस्से में तो महज़ गुलामी है आई

हिंदुस्तान के हिस्से में तो महज़ गुलामी है आई,
अपने हों गद्दार तो कैसे चमकेगी किस्मत भाई.

हिंदुस्तान के हिस्से में तो महज़ गुलामी है आई

गोरी आये गजनी आये लूट गए सारा सोना,
सोमनाथ को देख के लुटता सबकी आँखें भर आयीं.

डचों शकों ने और हूणों ने पहले तो हमको रौंदा,
अंग्रेजों ने सदियों हमसे अपनी गुलामी करवाई.

आज़ादी के दीवानों ने हिम्मत मगर नहीं हारी,
अपनी जान गंवाई लेकिन आज़ादी तो दिलवाई,

आज़ादी के जश्न में डूबे और नहीं कुछ भी सोचा,
गौर से देखा तो धोखा है मन में गुलामी है छाई.

इंग्लिश रानी बनी घूमती संसद में न्यायालय में,
हिंदी-पट्टी में ही हिंदी झेल रही कितनी रुसवाई.

कोई दल हो कोई गुट हो राज न कोई कर पाया,
कांग्रेस भी तभी चली जब पड़ी विदेशी परछाई.

जन्मा वारिस लन्दन का और शोर शराबा यहाँ हुआ,
टी.वी.पर चौबीसों घंटे बजी यहाँ पर शहनाई.

अमरीका से विनती करते अपने ये देशी नेता,
इसे न वीजा मिलने पाए गुजराती है दंगाई.

देशी चरखे को कबाड़ में फेंक दिया तरुणाई .
आयें और विदेशी लूटें लागू है ऍफ़.डी.आई.

सत्य अहिंसा और स्वदेशी बापू के ही साथ गए,
छोड़ दिया इन सबको सबने जैसे ही सत्ता पायी.

पहले थी अंग्रेज कंपनी अब अमरीकी आयेंगी,
हाय गुलामी फिर झेलेंगे कैसी है किस्मत पायी.

~ शरत चन्द्र श्रीवास्तव

मेरे अल्लाह खतरे में तेरे भगवान खतरे में

ग़ज़ल

mere allah khatare mein tere bhagvan khatre mein poem by mahesh katare sugamहमारी हर समय रहने लगी है जान खतरे में
कभी दीवाली खतरे में कभी रमज़ान खतरे में

किसी के ऐतराज़ों में उलझकर रह गयी श्रद्धा
कहीं पर हव्य खतरे में कहीं लोबान खतरे में

ज़रा सी बात पर पड़ते दिखाई देने लगते हैं
मेरे अल्लाह खतरे में तेरे भगवान खतरे में

नहीं महफूज़ दिखती है यहां इंसान की हस्ती
यहां है शान खतरे में वहां सम्मान खतरे में

घिरे रहते हमेशा ही यहां पर खौफ के बादल
सियासत की वज़ह से आ गया इंसान खतरे में

सुगम अब फूलने ,फलने के पहले सूख जाते हैं
दुआएं सख्त खतरे में सभी वरदान खतरे में

(महेश कटारे सुगम )

महेश कटारे सुगम Mahesh Katare sugam

महेश कटारे सुगम हिंदी और बुंदेली कविता का एक मशहूर नाम हैं।  उनके फेसबुक पेज के लिए यहाँ से जाएँ  https://www.facebook.com/maheshkatare.sugam

चाँद ख़ुदकुशी करने निकला है

आज मैं कोई कविता नहीं लिखूंगा
कोई कहानी नहीं सुनाऊंगा
बस बैठ कर
इन्तेजार करुंगा

चाँद खुदकुशी

तुम्हें पता ना हो
शायद
कि सायों की भी रूह होती है
जो धूप में पिघल जाती है
और अंधेरों से डरती है
जब साये लंबे होते हैं
तो वो अक्सर बातें करती हैं
मैं आज डूबते सूरज की रोशनी से
एक रूह को बाँध लूँगा
मुझे देखना है
कि अंधेरे में
क्या साये भी किरदार बदलते हैं?

आज मैं कोई कविता नहीं लिखूंगा
कोई कहानी नहीं सुनाऊंगा
बस बैठ कर
इन्तेजार करूंगा

मुझे सितारों से कोई गिला नहीं
राहू से मेरी दोस्ती है
अकसर वो किस्मत की तंग गली में
मुझे मिल ही जाता है
कई बार साथ बैठ कर हमने
सिगरेट सुलगाई है
और रातें शाद की हैं
जब वो नाचता है तो गजब की ताल होती है
आज मुझे उसके घुँघरूओं का हिसाब करना है
वो कहता है
जब ये आवाज करते हैं
तो मैं सो नहीं सकता

आज मैं कोई कविता नहीं लिखूंगा
कोई कहानी नहीं सुनाऊँगा
बस बैठ कर
इन्तेजार करूंगा

कहते हैं आज रात भारी है
चाँद ख़ुदकुशी करने निकला है
वो मायूस है कि उसके चेहरे के दागों ने
आईने को भी बदशकल बना डाला
मैं उस से बात करूंगा
शायद वो ये समझ पाए
कि आईने बाजारों में बिकते हैं
कीमत अदा जो करे
उनका वही हबीब है

आज मैं कोई कविता नहीं लिखूंगा
कोई कहानी नहीं सुनाऊँगा
बस
इन्तेजार
करूंगा

~ स्कंद नयाल खान