चाणक्य नीति – मोक्ष पर चाणक्य के अनमोल विचार Chanakya quotes in Hindi

Chanakya Neeti – Moksha par Chanakya ke Anmol vichar

chanakya on mokshaबन्धन्य विषयासङ्गः मुक्त्यै निर्विषयं मनः। मन एव मनुष्याणां कारणं बन्धमोक्षयोः॥
बुराइयों में मन को लगाना ही बन्धन है और इनसे मन को हटा लेना ही मोक्ष का मार्ग दिखाता है । इस प्रकार यह मन ही बन्धन या मोक्ष देनेवाला है।

धर्मार्थकाममोश्रेषु यस्यैकोऽपि न विद्यते। जन्म जन्मानि मर्त्येषु मरणं तस्य केवलम्॥
जिस मनुष्य को धर्म, काम-भोग, मोक्ष में से एक भी वस्तु नहीं मिल पाती, उसका जन्म केवल मरने के लिए ही होता है

अधना धनमिच्छन्ति वाचं चैव चतुष्पदाः। मानवाः स्वर्गमिच्छन्ति मोक्षमिच्छन्ति देवताः॥
निर्धन व्यक्ति धन की कामना करते हैं और चौपाये अर्थात पशु बोलने की शक्ति चाहते हैं । मनुष्य स्वर्ग की इच्छा करता है और स्वर्ग में रहने वाले देवता मोक्ष-प्राप्ति की इच्छा करते हैं और इस प्रकार जो प्राप्त है सभी उससे आगे की कामना करते हैं ।

श्रुत्वा धर्म विजानाति श्रुत्वा त्यजति दुर्मतिम्। श्रुत्वा ज्ञानमवाप्नोति श्रुत्वा मोक्षमवाप्नुयात्॥
सुनकर ही मनुष्य को अपने धर्म का ज्ञान होता है, सुनकर ही वह दुर्बुद्धि का त्याग करता है । सुनकर ही उसे ज्ञान प्राप्त होता है और सुनकर ही मोक्ष मिलता है ।

धर्मार्थकाममोक्षाणां यस्यैकोऽपि न विद्वते। अजागलस्तनस्येव तस्य जन्म निरर्थकम्॥
धर्म, अर्थ, काम तथा मोक्ष में से जिस व्यक्ति को एक भी नहीं पाता, उसका जीवन बकरी के गले के स्थान के समान व्यर्थ है।

यस्य चित्तं द्रवीभूतं कृपया सर्वजन्तुषु । तस्य ज्ञानेन मोक्षेण किं जटा भसमलेपनैः॥
जिस मनुष्य का हृदय सभी प्राणियों के लिए दया से द्रवीभूत हो जाता है, उसे ज्ञान, मोक्ष, जटा, भष्म – लेपन आदि से क्या लेना ।

Chanakya ke Anmol Vichar | चाणक्य के अनमोल विचार

Chanakya ke Anmol Vichar | चाणक्य के अनमोल विचार

चाणक्य के अनमोल विचार
हाथ में आए शत्रु पर कभी विश्वास न करें।
हर पल अपने प्रभुत्व को बनाए रखना ही कर्त्तव्य है।
हंस पक्षी श्मशान में नहीं रहता। अर्थात ज्ञानी व्यक्ति मूर्ख और दुष्ट व्यक्तियों के पास बैठना पसंद नहीं करते।
स्वार्थ पूर्ति हेतु दी जाने वाली भेंट ही उनकी सेवा है।
स्वामी द्वारा एकांत में कहे गए गुप्त रहस्यों को मूर्ख व्यक्ति प्रकट कर देते हैं।
स्वामी के क्रोधित होने पर स्वामी के अनुरूप ही काम करें।
स्वाभिमानी व्यक्ति प्रतिकूल विचारों को सम्मुख रखकर दुबारा उन पर विचार करे।
स्वाभिमानी व्यक्ति प्रतिकूल विचारों को सम्मुख रखकर दोबारा उन पर विचार करे।
स्वर्ग-पतन से बड़ा कोई दुःख नहीं है।
स्वर्ग की प्राप्ति शाश्वत अर्थात सनातन नहीं होती।
स्वयं को अमर मानकर धन का संग्रह करें।
स्वयं अशुद्ध व्यक्ति दूसरे से भी अशुद्धता की शंका करता है।
स्वभाव का मूल अर्थ लाभ होता है।
स्वभाव का अतिक्रमण अत्यंत कठिन है।
स्वजनों को तृप्त करके शेष भोजन से जो अपनी भूख शांत करता है, वह अमृत भोजी कहलाता है।
स्वजनों के अपमान से मनस्वी दुःखी होते है।
स्वजनों की सीमा का अतिक्रमण न करें।
स्वजनों की बुरी आदतों का समाधान करना चाहिए।
स्नेह करने वालों का रोष अल्प समय के लिए होता है।
स्त्री रत्न से बढ़कर कोई दूसरा रत्न नहीं है।
स्त्री में गंभीरता न होकर चंचलता होती है।
स्त्री भी नपुंसक व्यक्ति का अपमान कर देती है।
स्त्री बिना लोहे की बे ड़ीहै।
स्त्री पर जरा भी विश्वास न करें।
स्त्री के बंधन से मोक्ष पाना अति दुर्लभ है।
स्त्री के बंधन से छूटना अथवा मोक्ष पाना अत्यंत कठिन है।
स्त्री के प्रति आसक्त रहने वाले पुरुष को न स्वर्ग मिलता है, न धर्म-कर्म।
स्त्री का निरीक्षण करने में आलस्य न करें।
स्त्री का नाम सभी अशुभ क्षेत्रों से जुड़ा हुआ है।
स्त्री का आभूषण लज्जा है।
स्त्रियों का मन क्षणिक रूप से स्थिर होता है।
स्तुति करने से देवता भी प्रसन्न हो जाते है।
सौभाग्य ही स्त्री का आभूषण है।
सौंदर्य अलंकारों अर्थात आभूषणों से छिप जाता है।
सोने के साथ मिलकर चांदी भी सोने जैसी दिखाई पड़ती है अर्थात सत्संग का प्रभाव मनुष्य पर अवश्य पड़ता है।
सेवकों को अपने स्वामी का गुणगान करना चाहिए।
सेवक को स्वामी के अनुकूल कार्य करने चाहिए।
सुख का आधार धर्म है।
सुख और दुःख में समान रूप से सहायक होना चाहिए।
सुख और दुःख में समान रूप से सहायक होना चाहिए।
सीधे और सरल व्यक्ति दुर्लभता से मिलते है।
सिद्ध हुए कार्य का प्रकाशन करना ही उचित कर्तव्य होना चाहिए।
सिंह भूखा होने पर भी घास नहीं खाता।
साहसी लोगों को अपना कर्तव्य प्रिय होता है।
सामर्थ्य के अनुसार ही दान दें।
साधू पुरुष किसी के भी धन को अपना ही मानते है।
साधारण पुरुष परम्परा का अनुसरण करते है।
साधारण दोष देखकर महान गुणों को त्याज्य नहीं समझना चाहिए।
सांप को दूध पिलाने से विष ही बढ़ता है, न कि अमृत।
समृद्धता से कोई गुणवान नहीं हो जाता।
समुद्र के पानी से प्यास नहीं बुझती।
समस्त संसार धन के पीछे लगा है।
समस्त दुखों को नष्ट करने की औषधि मोक्ष है।
समस्त कार्य पूर्व मंत्रणा से करने चाहिए।
समय को समझने वाला कार्य सिद्ध करता है।
समय का ध्यान नहीं रखने वाला व्यक्ति अपने जीवन में निर्विघ्न नहीं रहता।
समय का ज्ञान न रखने वाले राजा का कर्म समय के द्वारा ही नष्ट हो जाता है।
सभी व्यक्तियों का आभूषण धर्म है।
सभी मार्गों से मंत्रणा की रक्षा करनी चाहिए।
सभी प्रकार के भय से बदनामी का भय सबसे बड़ा होता है।
सभी प्रकार की सम्पति का सभी उपायों से संग्रह करना चाहिए।
सभी अशुभों का क्षेत्र स्त्री है।
सभा के मध्य शत्रु पर क्रोध न करें।
सभा के मध्य जो दूसरों के व्यक्तिगत दोष दिखाता है, वह स्वयं अपने दोष दिखाता है।
सदैव आर्यों (श्रेष्ठ जन) के समान ही आचरण करना चाहिए।
सदाचार से शत्रु पर विजय प्राप्त की जा सकती है।
सदाचार से मनुष्य का यश और आयु दोनों बढ़ती है।
सत्संग से स्वर्ग में रहने का सुख मिलता है।
सत्य से स्वर्ग की प्राप्ति होती है।
सत्य से बढ़कर कोई तप नहीं।
सत्य भी यदि अनुचित है तो उसे नहीं कहना चाहिए।
सत्य पर ही देवताओं का आशीर्वाद बरसता है।
सत्य पर संसार टिका हुआ है।
सत वाणी से स्वर्ग प्राप्त होता है।
सज्जन दुर्जनों में विचरण नही करते।
सज्जन थोड़े-से उपकार के बदले बड़ा उपकार करने की इच्छा से सोता भी नहीं।
सज्जन तिल बराबर उपकार को भी पर्वत के समान बड़ा मानकर चलता है।
सज्जन को बुरा आचरण नहीं करना चाहिए।
सज्जन की राय का उल्लंघन न करें।
सच्चे लोगो के लिए कुछ भी अप्राप्य नहीं।
संसार में लोग जान-बूझकर अपराध की ओर प्रवृत्त होते हैं।
संसार में निर्धन व्यक्ति का आना उसे दुखी करता है।
संसार की प्रत्येक वस्तु नाशवान है।
संयोग से तो एक कीड़ा भी स्थिति में परिवर्तन कर देता है।
संबंधों का आधार उद्देश्य की पूर्ति के लिए होता है।
संपन्न और दयालु स्वामी की ही नौकरी करनी चाहिए।
संधि करने वालो में तेज़ ही संधि का उद्देश्य होता है।
संधि और एकता होने पर भी सतर्क रहे।
संतान को जन्म देने वाली स्त्री पत्नी कहलाती है।
संकट में बुद्धि ही काम आती है।
श्रेष्ठ स्त्री के लिए पति ही परमेश्वर है।
श्रेष्ठ व्यक्ति अपने समान ही दूसरों को मानता है।
श्रेष्ठ और सुहृदय जन अपने आश्रित के दुःख को अपना ही दुःख समझते है।
शुद्ध किया हुआ नीम भी आम नहीं बन सकता।
शिष्य को गुरु के वश में होकर कार्य करना चाहिए।
शिकारपरस्त राजा धर्म और अर्थ दोनों को नष्ट कर लेता है।
शास्त्रों के न जानने पर श्रेष्ठ पुरुषों के आचरणों के अनुसार आचरण करें।
शास्त्रों के ज्ञान से इन्द्रियों को वश में किया जा सकता है।
शास्त्र शिष्टाचार से बड़ा नहीं है।
शास्त्र का ज्ञान आलसी को नहीं हो सकता।
शासक को स्वयं योग्य बनकर योग्य प्रशासकों की सहायता से शासन करना चाहिए।
शासक को स्वयं योग्य बनकर योग्य प्रशासकों की सहायता से शासन करना चाहिए।
शांतिपूर्ण देश में ही रहें।
शांत व्यक्ति सबको अपना बना लेता है।
शराबी व्यक्ति का कोई कार्य पूरा नहीं होता है।
शराबी के हाथ में रखे दूध को भी शराब ही समझा जाता है।
शत्रुओं से अपने राज्य की पूर्ण रक्षा करें।
शत्रु हमारे छिद्र (कमजोरी) पर ही प्रहार करते है।
शत्रु भी उत्साही व्यक्ति के वश में हो जाता है।
शत्रु द्वारा किया गया स्नेहिल व्यवहार भी दोषयुक्त समझना चाहिए।
शत्रु दण्डनीति के ही योग्य है।
शत्रु के छिद्र (दुर्बलता) पर ही प्रहार करना चाहिए।
शत्रु के गुण को भी ग्रहण करना चाहिए।
शत्रु की बुरी आदतों को सुनकर कानों को सुख मिलता है।
शत्रु की निंदा सभा के मध्य नहीं करनी चाहिए।
शत्रु की दुर्बलता जानने तक उसे अपना मित्र बनाए रखें।
शत्रु की जीविका भी नष्ट नहीं करनी चाहिए।
शत्रु का शत्रु मित्र होता है।
शत्रु का पुत्र यदि मित्र है तो उसकी रक्षा करनी चाहिए।
शत्रु के प्रयत्नों की समीक्षा करते रहना चाहिए।
शक्तिहीन को बलवान का आश्रय लेना चाहिए।
शक्तिशाली शत्रु को कमजोर समझकर ही उस पर आक्रमण करें।
शक्तिशाली राजा लाभ को प्राप्त करने का प्रयत्न करता है।
व्यसनी व्यक्ति लक्ष्य तक पहुँचने से पहले ही रुक जाता है।
व्यसनी व्यक्ति कभी सफल नहीं हो सकता।
व्यक्ति को उट-पटांग अथवा गंवार वेशभूषा धारण नहीं करनी चाहिए।
व्यक्ति के मन में क्या है, यह उसके व्यवहार से प्रकट हो जाता है।
वैभव के अनुरूप ही आभूषण और वस्त्र धारण करें।
वेद से बाहर कोई धर्म नहीं है।
वृद्धजन की सेवा ही विनय का आधार है।
वृद्ध सेवा अर्थात ज्ञानियों की सेवा से ही ज्ञान प्राप्त होता है।
विष में यदि अमृत हो तो उसे ग्रहण कर लेना चाहिए।
विष प्रत्येक स्थिति में विष ही रहता है।
विश्वासघाती की कहीं भी मुक्ति नहीं होती।
विश्वास की रक्षा प्राण से भी अधिक करनी चाहिए।
विशेषज्ञ व्यक्ति को स्वामी का आश्रय ग्रहण करना चाहिए।
विशेष स्थिति में ही पुरुष सम्मान पाता है।
विशेष कार्य को (बिना आज्ञा भी) करें।
विवेकहीन व्यक्ति महान ऐश्वर्य पाने के बाद भी नष्ट हो जाते है।
विवाद के समय धर्म के अनुसार कार्य करना चाहिए।
विनाशकाल आने पर आदमी अनीति करने लगता है।
विनाश काल आने पर दवा की बात कोई नहीं सुनता।
विनाश का उपस्थित होना सहज प्रकृति से ही जाना जा सकता है।
विनयरहित व्यक्ति को ताना देना व्यर्थ है।
विनय से युक्त विद्या सभी आभूषणों की आभूषण है।
विनय सबका आभूषण है।
विद्वान और प्रबुद्ध व्यक्ति समाज के रत्न है।
विद्या से विद्वान की ख्याति होती है।
विद्या को चोर भी नहीं चुरा सकता।
विद्या ही निर्धन का धन है।
विचार न करके कार्य करने वाले व्यक्ति को लक्ष्मी त्याग देती है।
विचार अथवा मंत्रणा को गुप्त न रखने पर कार्य नष्ट हो जाता है।
विकृतिप्रिय लोग नीचता का व्यवहार करते है।
वाहनों पर यात्रा करने वाले पैदल चलने का कष्ट नहीं करते।
वन की अग्नि चन्दन की लकड़ी को भी जला देती है अर्थात दुष्ट व्यक्ति किसी का भी अहित कर सकते है।
लोहे को लोहे से ही काटना चाहिए।
लोभी और कंजूस स्वामी से कुछ पाना जुगनू से आग प्राप्त करने के समान है।
लोभ बुद्धि पर छा जाता है, अर्थात बुद्धि को नष्ट कर देता है।
लोभ द्वारा शत्रु को भी भ्रष्ट किया जा सकता है।
लोक-व्यवहार में कुशल व्यक्ति ही बुद्धिमान है।
लोक व्यवहार शास्त्रों के अनुकूल होना चाहिए।
लोक चरित्र को समझना सर्वज्ञता कहलाती है।
लापरवाही अथवा आलस्य से भेद खुल जाता है।
रोग शत्रु से भी बड़ा है।
रूप के अनुसार ही गुण होते है।
रात्रि में नहीं घूमना चाहिए।
राज्यतंत्र से संबंधित घरेलु और बाह्य, दोनों कर्तव्यों को राजतंत्र का अंग कहा जाता है।
राज्यतंत्र को ही नीतिशास्त्र कहते है।
राज्य नीति का संबंध केवल अपने राज्य को सम्रद्धि प्रदान करने वाले मामलों से होता है।
राज्य को नीतिशास्त्र के अनुसार चलना चाहिए।
राज्य का आधार अपनी इन्द्रियों पर विजय पाना है।
राजाज्ञा से सदैव डरते रहे।
राजा, गुप्तचर और मंत्री तीनो का एक मत होना किसी भी मंत्रणा की सफलता है।
राजा से बड़ा कोई देवता नहीं।
राजा योग्य अर्थात उचित दंड देने वाला हो।
राजा के सेवकों का कठोर होना अधर्म माना जाता है।
राजा के प्रतिकूल आचरण नहीं करना चाहिए।
राजा के पास खाली हाथ कभी नहीं जाना चाहिए।
राजा के दर्शन न देने से प्रजा नष्ट हो जाती है।
राजा के दर्शन देने से प्रजा सुखी होती है।
राजा की भलाई के लिए ही नीच का साथ करना चाहिए।
राजा की आज्ञा का कभी उल्लंघन न करे।
राजा अपने बल-विक्रम से धनी होता है।
राजा अपने गुप्तचरों द्वारा अपने राज्य में होने वाली दूर की घटनाओ को भी जान लेता है।
राजसेवा में डरपोक और निकम्मे लोगों का कोई उपयोग नहीं होता।
राजपुरुषों से संबंध बनाए रखें।
राजपरिवार से द्वेष अथवा भेदभाव नहीं रखना चाहिए।
राजधन की ओर आँख उठाकर भी नहीं देखना चाहिए।
राजदासी से कभी शारीरिक संबंध नहीं बनाने चाहिए।
राजकुल में सदैव आते-जाते रहना चाहिए।
राज अग्नि दूर तक जला देती है।
रत्नों की प्राप्ति बहुत कठिन है। अर्थात श्रेष्ठ नर और नारियों की प्राप्ति अत्यंत दुर्लभ है।
रत्न कभी खंडित नहीं होता। अर्थात विद्वान व्यक्ति में कोई साधारण दोष होने पर उस पर ज्यादा ध्यान नहीं देना चाहिए।
योग्य सहायकों के बिना निर्णय करना बड़ा कठिन होता है।
योग्य सहायकों के बिना निर्णय करना बड़ा कठिन होता है।
याचकों का अपमान अथवा उपेक्षा नहीं करनी चाहिए।
याचक कंजूस-से-कंजूस धनवान को भी नहीं छोड़ते।
यह संसार आशा के सहारे बंधा है।
यश शरीर को नष्ट नहीं होने देता।
यदि स्वयं के हाथ में विष फ़ैल रहा है तो उसे काट देना चाहिए।
यदि माता दुष्ट है तो उसे भी त्याग देना चाहिए।
यदि न खाने योग्य भोजन से पेट में बदहजमी हो जाए तो ऐसा भोजन कभी नहीं करना चाहिए।
मृत्यु भी धर्म पर चलने वाले व्यक्ति की रक्षा करती है।
मृतिका पिंड (मिट्टी का ढेला) भी फूलों की सुगंध देता है। अर्थात सत्संग का प्रभाव मनुष्य पर अवशय पड़ता है जैसे जिस मिटटी में फूल खिलते है उस मिट्टी से भी फूलों की सुगंध आने लगती है।
मृत व्यक्ति का औषधि से क्या प्रयोजन।
मृगतृष्णा जल के समान है।
मूर्खों से विवाद नहीं करना चाहिए।
मूर्खों में साहस होता ही है। (यहाँ साहस का तात्पर्ये चोरी-चकारी, लूट-पाट, हत्या आदि से है )
मूर्ख से मूर्खों जैसी ही भाषा बोलें।
मूर्ख व्यक्ति दान देने में दुःख का अनुभव करता है।
मूर्ख व्यक्ति को अपने दोष दिखाई नहीं देते, उसे दूसरे के दोष ही दिखाई देते हैं।
मूर्ख व्यक्ति उपकार करने वाले का भी अपकार करता है। इसके विपरीत जो इसके विरुद्ध आचरण करता है, वह विद्वान कहलाता है।
मूर्ख लोगों का क्रोध उन्हीं का नाश करता है।
मूर्ख का कोई मित्र नहीं है।
मुर्ख लोग कार्यों के मध्य कठिनाई उत्पन्न होने पर दोष ही निकाला करते है।
मित्रों के संग्रह से बल प्राप्त होता है।
माता द्वारा प्रताड़ित बालक माता के पास जाकर ही रोता है।
मांस खाना सभी के लिए अनुचित है।
महान व्यक्तियों का उपहास नहीं करना चाहिए।
महात्मा को पराए बल पर साहस नहीं करना चाहिए।
महाजन द्वारा अधिक धन संग्रह प्रजा को दुःख पहुँचाता है।
मलेच्छ अर्थात नीच व्यक्ति की भी यदि कोई अच्छी बात हो अपना लेना चाहिए।
मलेच्छ अर्थात नीच की भाषा कभी शिक्षा नहीं देती।
मर्यादाओं का उल्लंघन करने वाले का कभी विश्वास नहीं करना चाहिए।
मर्यादा का कभी उल्लंघन न करें।
मन्त्रणा की सम्पति से ही राज्य का विकास होता है।
मनुष्य स्वयं ही दुःखों को बुलाता है।
मनुष्य के चेहरे पर आए भावों को देवता भी छिपाने में अशक्त होते है।
मनुष्य के कार्य में आई विपति को कुशलता से ठीक करना चाहिए।
मनुष्य की वाणी ही विष और अमृत की खान है।
मधुर व प्रिय वचन होने पर भी अहितकर वचन नहीं बोलने चाहिए।
मछेरा जल में प्रवेश करके ही कुछ पाता है।
मंत्रणा रुपी आँखों से शत्रु के छिद्रों अर्थात उसकी कमजोरियों को देखा-परखा जाता है।
मंत्रणा को गुप्त रखने से ही कार्य सिद्ध होता है।
मंत्रणा के समय कर्त्तव्य पालन में कभी ईर्ष्या नहीं करनी चाहिए।
मंत्रणा की गोपनीयता को सर्वोत्तम माना गया है।
भूखा व्यक्ति अखाद्य को भी खा जाता है।
भूख के समान कोई दूसरा शत्रु नहीं है।
भाग्य पुरुषार्थी के पीछे चलता है।
भाग्य के विपरीत होने पर अच्छा कर्म भी दुखदायी हो जाता है।
भाग्य का शमन शांति से करना चाहिए।
भविष्य के अन्धकार में छिपे कार्य के लिए श्रेष्ठ मंत्रणा दीपक के समान प्रकाश देने वाली है।
भले लोग दूसरों के शरीर को भी अपना ही शरीर मानते है।
भली प्रकार से पूजने पर भी दुर्जन पीड़ा पहुंचाता है।
ब्राह्मणों का आभूषण वेद है।
बुरे व्यक्ति पर क्रोध करने से पूर्व अपने आप पर ही क्रोध करना चाहिए।
बुद्धिहीन व्यक्ति पिशाच अर्थात दुष्ट के सिवाय कुछ नहीं है।
बुद्धिहीन व्यक्ति निकृष्ट साहित्य के प्रति मोहित होते है।
बुद्धिमानों के शत्रु नहीं होते।
बुद्धिमान व्यक्ति को मुर्ख, मित्र, गुरु और अपने प्रियजनों से विवाद नहीं करना चाहिए।
बिना विचार कार्य करने वालो को भाग्यलक्ष्मी त्याग देती है।
बिना प्रयत्न के जहां जल उपलब्ध हो, वही कृषि करनी चाहिए।
बिना प्रयत्न किए धन प्राप्ति की इच्छा करना बालू में से तेल निकालने के समान है।
बिना उपाय के किए गए कार्य प्रयत्न करने पर भी बचाए नहीं जा सकते, नष्ट हो जाते है।
बिना अधिकार के किसी के घर में प्रवेश न करें।
बहुमत का विरोध करने वाले एक व्यक्ति का अनुगमन नहीं करना चाहिए।
बहुत से गुणों को एक ही दोष ग्रस लेता है।
बहुत बड़ा कनेर का वृक्ष भी मूसली बनाने के काम नहीं आता।
बहुत पुराना नीम का पेड़ होने पर भी उससे सरौता नहीं बन सकता।
बहुत दिनों से परिचित व्यक्ति की अत्यधिक सेवा शंका उत्पन्न करती है।
बलवान से युद्ध करना हाथियों से पैदल सेना को लड़ाने के समान है।
बल प्रयोग के स्थान पर क्षमा करना अधिक प्रशंसनीय होता है।
बच्चों की सार्थक बातें ग्रहण करनी चाहिए।
फूलों की इच्छा रखने वाला सूखे पेड़ को नहीं सींचता।
प्रेत भी धर्म-अधर्म का पालन करते है।
प्रिय वचन बोलने वाले का कोई शत्रु नहीं होता।
प्रायः पुत्र पिता का ही अनुगमन करता है।
प्रातःकाल ही दिन-भर के कार्यों के बारें में विचार कर लें।
प्राणी अपनी देह को त्यागकर इंद्र का पद भी प्राप्त करना नहीं चाहता।
प्रयत्न न करने से कार्य में विघ्न पड़ता है।
प्रत्येक अवस्था में सर्वप्रथम माता का भरण-पोषण करना चाहिए।
प्रत्यक्ष और परोक्ष साधनों के अनुमान से कार्य की परीक्षा करें।
प्रजाप्रिय राजा लोक-परलोक का सुख प्रकट करता है।
प्रकृति का कोप सभी कोपों से बड़ा होता है।
प्रकृति (सहज) रूप से प्रजा के संपन्न होने से नेताविहीन राज्य भी संचालित होता रहता है।
पूर्वाग्रह से ग्रसित दंड देना लोकनिंदा का कारण बनता है।
पुष्पहीन होने पर सदा साथ रहने वाला भौंरा वृक्ष को त्याग देता है।
पुरुष के लिए कल्याण का मार्ग अपनाना ही उसके लिए जीवन-शक्ति है।
पुराना होने पर भी शाल के वृक्ष से हाथी को नहीं बाँधा जा सकता।
पुत्र से ही कुल को यश मिलता है।
पुत्र प्राप्ति सर्वश्रेष्ठ लाभ है।
पुत्र प्राप्ति के लिए ही स्त्री का वरण किया जाता है।
पुत्र को सभी विद्याओं में क्रियाशील बनाना चाहिए।
पुत्र को पिता के अनुकूल आचरण करना चाहिए।
पुत्र के सुख से बढ़कर कोई दूसरा सुख नहीं है।
पुत्र के बिना स्वर्ग की प्राप्ति नहीं होती।
पुत्र के गुणवान होने से परिवार स्वर्ग बन जाता है।
पुत्र की प्रशंसा नहीं करनी चाहिए।
पापी की आत्मा उसके पापों को प्रकट कर देती है।
पाप कर्म करने वाले को क्रोध और भय की चिंता नहीं होती।
पात्र के अनुरूप दान दें।
पहले निश्चय कीजिये, फिर कार्य आरम्भ करें।
परीक्षा किये बिना कार्य करने से कार्य विपत्ति में पड़ जाता है।
परीक्षा करने से लक्ष्मी स्थिर रहती है।
परीक्षा करके विपत्ति को दूर करना चाहिए।
परिचय हो जाने के बाद दोष नहीं छिपाते।
पराया व्यक्ति यदि हितैषी हो तो वह भाई है।
पराए धन को छीनना अपराध है।
पराए खेत में बीज न डाले। अर्थात पराई स्त्री से सम्भोग (सेक्स) न करें।
पराई स्त्री के पास नहीं जाना चाहिए।
पराई वस्तु को पाने की लालसा नहीं रखनी चाहिए।
पति के वश में रहने वाली पत्नी ही व्यवहार के अनुकूल होती है।
पति का अनुगमन करना, इहलोक और परलोक दोनों का सुख प्राप्त करना है।
पडोसी राज्यों से सन्धियां तथा पारस्परिक व्यवहार का आदान-प्रदान और संबंध विच्छेद आदि का निर्वाह मंत्रिमंडल करता है।
पक्ष अथवा विपक्ष में साक्षी देने वाला न तो किसी का भला करता है, न बुरा।
न्याय ही धन है।
न्याय विपरीत प्राप्त किया गया धन, धन नहीं है।
नीम का फल कौए ही खाते है।
नीतिवान पुरुष कार्य प्रारम्भ करने से पूर्व ही देश-काल की परीक्षा कर लेते है।
नीच व्यक्ति ह्र्दयगत बात को छिपाकर कुछ और ही बात कहता है।
नीच व्यक्ति को उपदेश देना ठीक नहीं।
नीच व्यक्ति को अपमान का भय नहीं होता।
नीच व्यक्ति के सम्मुख रहस्य और अपने दिल की बात नहीं करनी चाहिए।
नीच व्यक्ति की शिक्षा की अवहेलना करनी चाहिए।
नीच लोगों पर विश्वास नहीं करना चाहिए।
नीच लोगों की कृपा पर निर्भर होना व्यर्थ है।
नीच की विधाएँ पाप कर्मों का ही आयोजन करती है।
नीच और उत्तम कुल के बीच में विवाह संबंध नहीं होने चाहिए।
निर्बल राजा को तत्काल संधि करनी चाहिए।
निर्बल राजा की आज्ञा की भी अवहेलना कदापि नहीं करनी चाहिए।
निर्धन होकर जीने से तो मर जाना अच्छा है।
निर्धन व्यक्ति की हितकारी बातों को भी कोई नहीं सुनता।
निर्धन व्यक्ति की पत्नी भी उसकी बात नहीं मानती।
निम्न अनुष्ठानों (भूमि, धन-व्यापार उधोग-धंधों) से आय के साधन भी बढ़ते है।
नित्य दूसरे को समभागी बनाए।
निकृष्ट उपायों से प्राप्त धन की अवहेलना करने वाला व्यक्ति ही साधू होता है।
निकम्मे अथवा आलसी व्यक्ति को भूख का कष्ट झेलना पड़ता है।
निकट के राज्य स्वभाव से शत्रु हो जाते हैं।
नग्न होकर जल में प्रवेश न करें।
नक्षत्रों द्वारा भी किसी कार्य के होने, न होने का पता चल जाता है।
न जाने योग्य जगहों पर जाने से आयु, यश और पुण्य क्षीण हो जाते है।
धैर्यवान व्यक्ति अपने धैर्ये से रोगों को भी जीत लेता है।
धूर्त व्यक्ति अपने स्वार्थ के लिए दूसरों की सेवा करते हैं।
धार्मिक अनुष्ठानों में स्वामी को ही श्रेय देना चाहिए।
धर्मार्थ विरोधी कार्य करने वाला अशांति उत्पन्न करता है।
धर्म ही लोक को धारण करता है।
धर्म से भी बड़ा व्यवहार है।
धर्म को व्यावहारिक होना चाहिए।
धर्म के समान कोई मित्र नहीं है।
धर्म के द्वारा ही लोक विजय होती है।
धर्म का विरोध कभी न करें।
धर्म का आधार ही सत्य और दान है।
धर्म का आधार अर्थ अर्थात धन है।
धनिक को शुभ कर्म करने में अधिक श्रम नहीं करना पड़ता।
धनहीन की बुद्धि दिखाई नहीं देती।
धनविहीन महान राजा का संसार सम्मान नहीं करता।
धनवान व्यक्ति का सारा संसार सम्मान करता है।
धनवान असुंदर व्यक्ति भी सुरुपवान कहलाता है।
धन होने पर अल्प प्रयत्न करने से कार्य पूर्ण हो जाते है।
धन के नशे में अंधा व्यक्ति हितकारी बातें नहीं सुनता और न अपने निकट किसी को देखता है।
धन का लालची श्रीविहीन हो जाता है।
दोषहीन कार्यों का होना दुर्लभ होता है।
दोपहर बाद के कार्य को सुबह ही कर लें।
दैव (भाग्य) के अधीन किसी बात पर विचार न करें।
देहधारी को सुख-दुःख की कोई कमी नहीं रहती।
देश और फल का विचार करके कार्ये आरम्भ करें।
देवता के चरित्र का अनुकरण नहीं करना चाहिए।
देवता का कभी अपमान न करें।
दूसरों के धन का अपहरण करने से स्वयं अपने ही धन का नाश हो जाता है।
दूसरों की रहस्यमयी बातों को नहीं सुनना चाहिए।
दूसरे के धन पर भेदभाव रखना स्वार्थ है।
दूसरे के धन का लोभ नाश का कारण होता है।
दूसरे के धन अथवा वैभव का लालच नहीं करना चाहिए।
दूसरे का धन किंचित भी नहीं चुराना चाहिए।
दूध में मिला जल भी दूध बन जाता है।
दूध पीने के लिए गाय का बछड़ा अपनी माँ के थनों पर प्रहार करता है।
दूध के लिए हथिनी पालने की जरुरत नहीं होती। अर्थात आवश्कयता के अनुसार साधन जुटाने चाहिए।
दुष्टता नहीं अपनानी चाहिए।
दुष्ट स्त्री बुद्धिमान व्यक्ति के शरीर को भी निर्बल बना देती है।
दुष्ट व्यक्ति पर उपकार नहीं करना चाहिए।
दुष्ट व्यक्ति का कोई मित्र नहीं होता।
दुष्ट के साथ नहीं रहना चाहिए।
दुष्ट की मित्रता से शत्रु की मित्रता अच्छी होती है।
दुर्वचनों से कुल का नाश हो जाता है।
दुर्बल के साथ संधि न करें।
दुर्बल के आश्रय से दुःख ही होता है।
दुर्जन व्यक्तियों द्वारा संगृहीत सम्पति का उपभोग दुर्जन ही करते है।
दुर्जन व्यक्ति के साथ अपने भाग्य को नहीं जोड़ना चाहिए।
दिया गया दान कभी नष्ट नहीं होता।
दिन में स्वप्न नहीं देखने चाहिए।
दिन में सोने से आयु कम होती है।
दानवीर ही सबसे बड़ा वीर है।
दान ही धर्म है।
दान जैसा कोई वशीकरण मन्त्र नहीं है।
दरिद्र मनुष्य का जीवन मृत्यु के समान है।
दया धरम की जन्मभूमि है।
दण्डनीति से आत्मरक्षा की जा सकती है।
दण्डनीति के प्रभावी न होने से मंत्रीगण भी बेलगाम होकर अप्रभावी हो जाते है।
दण्डनीति के उचित प्रयोग से ही प्रजा की रक्षा संभव है।
दंडनीति से राजा की प्रवृत्ति अर्थात स्वभाव का पता चलता है।
दंड से सम्पदा का आयोजन होता है।
दंड का भय न होने से लोग अकार्य करने लगते है।
दंड का निर्धारण विवेकसम्मत होना चाहिए।
तीन वेदों ऋग, यजु व साम को जानने वाला ही यज्ञ के फल को जानता है।
तपस्वियों को सदैव पूजा करने योग्य मानना चाहिए।
तत्वों का ज्ञान ही शास्त्र का प्रयोजन है।
ढेकुली नीचे सिर झुकाकर ही कुँए से जल निकालती है। अर्थात कपटी या पापी व्यक्ति सदैव मधुर वचन बोलकर अपना काम निकालते है।
ठंडा लोहा लोहे से नहीं जुड़ता।
झूठे अथवा दुर्वचन लम्बे समय तक स्मरण रहते है।
झूठी गवाही देने वाला नरक में जाता है।
झूठ से बड़ा कोई पाप नहीं।
ज्ञानी पुरुषों को संसार का भय नहीं होता।
ज्ञानी और छल-कपट से रहित शुद्ध मन वाले व्यक्ति को ही मंत्री बनाए।
ज्ञानियों में भी दोष सुलभ है।
ज्ञानियों के कार्य भी भाग्य तथा मनुष्यों के दोष से दूषित हो जाते है।
ज्ञान से राजा अपनी आत्मा का परिष्कार करता है, सम्पादन करता है।
ज्ञान ऐश्वर्य का फल है।
ज्ञान अर्थात अपने अनुभव और अनुमान के द्वारा कार्य की परीक्षा करें।
जो सुख मिला है, उसे न छोड़ें।
जो व्यक्ति जिस कार्य में कुशल हो, उसे उसी कार्य में लगाना चाहिए।
जो मांगता है, उसका कोई गौरव नहीं होता।
जो धैर्यवान नहीं है, उसका न वर्तमान है न भविष्य।
जो धर्म और अर्थ की वृद्धि नहीं करता वह कामी है।
जो दूसरों की भलाई के लिए समर्पित है, वही सच्चा पुरुष है।
जो जिस कार्य में कुशल हो उसे उसी कार्य में लगना चाहिए।
जो कुलीन न होकर भी विनीत है, वह श्रेष्ठ कुलीनों से भी बढ़कर है।
जो अपने कर्म को नहीं पहचानता, वह अँधा है।
जो अपने कर्तव्यों से बचते है, वे अपने आश्रितों परिजनों का भरण-पोषण नहीं कर पाते।
जैसी शिक्षा, वैसी बुद्धि।
जैसी बुद्धि होती है , वैसा ही वैभव होता है।
जैसी आज्ञा हो वैसा ही करें।
जैसा शरीर होता है वैसा ही ज्ञान होता है।
जैसा बीज होता है, वैसा ही फल होता है।
जैसा कुल, वैसा आचरण।
जुगनू कितना भी चमकीला हो, पर उससे आग का काम नहीं लिया जा सकता।
जुए में लिप्त रहने वाले के कार्य पूरे नहीं होते है।
जीवन के लिए सत्तू (जौ का भुना हुआ आटा) भी काफी होता है।
जिससे कुल का गौरव बढे वही पुरुष है।
जिसके द्वारा जीवनयापन होता है, उसकी निंदा न करें।
जिसकी आत्मा संयमित होती है, वही आत्मविजयी होता है।
जिस प्रकार बालू अपने रूखे स्वभाव नहीं छोड़ सकता, उसी प्रकार दुष्ट भी अपना स्वभाव नहीं छोड़ पाता।
जिन्हें भाग्य पर विश्वास नहीं होता, उनके कार्य पूरे नहीं होते।
जिन वचनों से राजा के प्रति द्वेष उत्पन्न होता हो, ऐसे बोल नहीं बोलने चाहिए।
जितेन्द्रिय व्यक्ति को विषय-वासनाओं का भय नहीं सताता।
जहां सुख से रहा जा सके, वही स्थान श्रेष्ठ है।
जहां सज्जन रहते हों, वहीं बसें।
जहां लक्ष्मी (धन) का निवास होता है, वहां सहज ही सुख-सम्पदा आ जुड़ती है।
जहाँ पाप होता है, वहां धर्म का अपमान होता है।
जल में मूत्र त्याग न करें।
जब तक पुण्य फलों का अंश शेष रहता है, तभी तक स्वर्ग का सुख भोग जा सकता है।
जब कार्यों की अधिकता हो, तब उस कार्य को पहले करें, जिससे अधिक फल प्राप्त होता है।
जन्म-मरण में दुःख ही है।
जनपद के लिए ग्राम का त्याग कर देना चाहिए।
छः कानों में पड़ने से (तीसरे व्यक्ति को पता पड़ने से) मंत्रणा का भेद खुल जाता है।
चोर कर्म से बढ़कर कष्टदायक मृत्यु पाश भी नहीं है।
चोर और राजकर्मचारियों से धन की रक्षा करनी चाहिए।
चुगलखोर श्रोता के पुत्र और पत्नी उसे त्याग देते है।
चुगलखोर व्यक्ति के सम्मुख कभी गोपनीय रहस्य न खोलें।
चालाक और लोभी बेकार में घनिष्ठता को बढ़ाते है।
चरित्र का उल्लंघन कदापि नहीं करना चाहिए।
चतुरंगणी सेना (हाथी, घोड़े, रथ और पैदल) होने पर भी इन्द्रियों के वश में रहने वाला राजा नष्ट हो जाता है।
चंचल चित वाले के कार्य कभी समाप्त नहीं होते।
घर आए अतिथि का विधिपूर्वक पूजन करना चाहिए।
ग्राम के लिए कुटुम्ब (परिवार) को त्याग देना चाहिए।
गुरुजनों की माता का स्थान सर्वोच्च होता है।
गुरुओं की आलोचना न करें।
गुरु, देवता और ब्राह्मण में भक्ति ही भूषण है।
गुरु और देवता के पास भी खाली नहीं जाना चाहिए।
गुणों से ईर्ष्या नहीं करनी चाहिए।
गुणी व्यक्ति का आश्रय लेने से निर्गुणी भी गुणी हो जाता है।
गुणी पुत्र माता-पिता की दुर्गति नहीं होने देता।
गुणवान क्षुद्रता को त्याग देता है।
गाय के स्वभाव को जानने वाला ही दूध का उपभोग कर पाता है।
गाय के पीछे चलते बछड़े के समान सुख-दुःख भी आदमी के साथ जीवन भर चलते है।
गलत कार्यों में लगने वाले व्यक्ति को शास्त्रज्ञान ही रोक पाते है।
खाने योग्य भी अपथ्य होने पर नहीं खाना चाहिए।
क्षमाशील व्यक्ति का तप बढ़ता रहता है।
क्षमाशील पुरुष को कभी दुःखी न करें।
क्षमा करने वाला अपने सारे काम आसानी से कर लेता है।
क्षमा करने योग्य पुरुष को दुःखी न करें।
कोयल की कूक सबको अच्छी लगती है।
कोमल स्वभाव वाला व्यक्ति अपने आश्रितों से भी अपमानित होता है।
केवल साहस से कार्य-सिद्धि संभव नहीं।
केवल आशा के सहारे ही लक्ष्मी प्राप्त नहीं होती।
कृतघ्न अर्थात उपकार न मानने वाले व्यक्ति को नरक ही प्राप्त होता है।
कूट साक्षी नहीं होना चाहिए।
कुशल लोगों को रोजगार का भय नहीं होता।
कीड़ों तथा मलमूत्र का घर यह शरीर पुण्य और पाप को भी जन्म देता है।
किसी विशेष प्रयोजन के लिए ही शत्रु मित्र बनता है।
किसी लक्ष्य की सिद्धि में कभी शत्रु का साथ न करें।
किसी भी कार्य में पल भर का भी विलम्ब न करें।
किसी कार्यारंभ के समय को विद्वान और अनुभवी लोगों से पूछना चाहिए।
कार्य-सिद्धि के लिए हस्त-कौशल का उपयोग करना चाहिए।
कार्य-अकार्य के तत्वदर्शी ही मंत्री होने चाहिए।
कार्य के लक्षण ही सफलता-असफलता के संकेत दे देते है।
कार्य के मध्य में अति विलम्ब और आलस्य उचित नहीं है।
कार्य के अनुरूप प्रयत्न करें।
कार्य की सिद्धि के लिए उदारता नहीं बरतनी चाहिए।
कार्य का स्वरुप निर्धारित हो जाने के बाद वह कार्य लक्ष्य बन जाता है।
कार्य करने वाले के लिए उपाय सहायक होता है।
कार्य करते समय शत्रु का साथ नहीं करना चाहिए।
कायर व्यक्ति को कार्य की चिंता नहीं होती।
कामी पुरुष कोई कार्य नहीं कर सकता।
कल के मोर से आज का कबूतर भला। अर्थात संतोष सब बड़ा धन है।
कल की हज़ार कौड़ियों से आज की एक कौड़ी भली। अर्थात संतोष सबसे बड़ा धन है।
कल का कार्य आज ही कर लें।
कर्म करने से ही तत्वज्ञान को समझा जा सकता है।
कर्म करने वाले को मृत्यु का भय नहीं सताता।
कमजोर शरीर में बढ़ने वाले रोग की उपेक्षा न करें।
कभी भी पुरुषार्थी का अपमान नहीं करना चाहिए।
कथन के अनुसार ही उत्तर दें।
कठोर वाणी अग्निदाह से भी अधिक तीव्र दुःख पहुंचाती है।
कठोर दंड से सभी लोग घृणा करते है।
कठिन समय के लिए धन की रक्षा करनी चाहिए।
कठिन कार्य करवा लेने के उपरान्त भी नीच व्यक्ति कार्य करवाने वाले का अपमान ही करता है।
कच्चा पात्र कच्चे पात्र से टकराकर टूट जाता है।
ऐश्वर्य पैशाचिकता से अलग नहीं होता।
एरण्ड वृक्ष का सहारा लेकर हाथी को अप्रसन्न न करें।
एक ही गुरुकुल में पढ़ने वाले छात्र-छात्राओं का निकट संपर्क ब्रह्मचर्य को नष्ट कर सकता है।
एक बिगड़ैल गाय सौ कुत्तों से ज्यादा श्रेष्ठ है। अर्थात एक विपरीत स्वभाव का परम हितैषी व्यक्ति उन सौ लोगों से श्रेष्ठ है जो आपकी चापलूसी करते है।
एक अकेला पहिया नहीं चला करता।
एक अकेला पहिया नहीं चला करता।
एक अंग का दोष भी पुरुष को दुखी करता है।
ऋण, शत्रु और रोग को समाप्त कर देना चाहिए।
उम्र के अनुरूप ही वेश धारण करें।
उपार्जित धन का त्याग ही उसकी रक्षा है। अर्थात उपार्जित धन को लोक हित के कार्यों में खर्च करके सुरक्षित कर लेना चाहिए।
उपायों को जानने वाला कठिन कार्यों को भी सहज बना लेता है।
उपाय से सभी कार्य पूर्ण हो जाते है। कोई कार्य कठिन नहीं रहता।
उपकार का बदला चुकाने के भय से दुष्ट व्यक्ति शत्रु बन जाता है।
उन्नति और अवनति वाणी के अधीन है।
उदासीन होकर शत्रु की उपेक्षा न करें।
उत्साहहीन व्यक्ति का भाग्य भी अंधकारमय हो जाता है।
उचित समय पर सम्भोग (सेक्स) सुख न मिलने से स्त्री बूढी हो जाती है।
ईर्ष्या करने वाले दो समान व्यक्तियों में विरोध पैदा कर देना चाहिए।
इन्द्रियों पर विजय का आधार विनम्रता है।
इन्द्रियों को वश में करना ही तप का सार है।
इंद्रियों के अत्यधिक प्रयोग से बुढ़ापा आना शुरू हो जाता है।
आशा लज्जा को दूर कर देती है अर्थात मनुष्य को निर्लज्ज बना देती है।
आशा के साथ धैर्य नहीं होता।
आवाप अर्थात दूसरे राष्ट्र से संबंध नीति का परिपालन मंत्रिमंडल का कार्य है।
आवश्यकतानुसार कम भोजन करना ही स्वास्थ्य प्रदान करता है।
आलसी राजा प्राप्त वास्तु की रक्षा करने में असमर्थ होता है।
आलसी राजा की प्रशंसा उसके सेवक भी नहीं करते।
आलसी राजा अप्राप्त लाभ को प्राप्त नहीं करता।
आलसी राजा अपने विवेक की रक्षा नहीं कर सकता।
आलसी का न वर्तमान होता है, न भविष्य।
आपातकाल में स्नेह करने वाला ही मित्र होता है।
आधी रात तक जागते नहीं रहना चाहिए।
आत्मा व्यवहार की साक्षी है।
आत्मा तो सभी की साक्षी है।
आत्मस्तुति अर्थात अपनी प्रशंसा अपने ही मुख से नहीं करनी चाहिए।
आत्मसम्मान के हनन से विकास का विनाश हो जाता है।
आत्मविजयी सभी प्रकार की संपत्ति एकत्र करने में समर्थ होता है।
आत्मरक्षा से सबकी रक्षा होती है।
आग सिर में स्थापित करने पर भी जलाती है। अर्थात दुष्ट व्यक्ति का कितना भी सम्मान कर लें, वह सदा दुःख ही देता है।
आग में आग नहीं डालनी चाहिए। अर्थात क्रोधी व्यक्ति को अधिक क्रोध नहीं दिलाना चाहिए।
आंखों के समान कोई ज्योति नहीं।
आंखें ही देहधारियों की नेता है।
आँखों के बिना शरीर क्या है?
अहिंसा धर्म का लक्षण है।
अहंकार से बड़ा मनुष्य का कोई शत्रु नहीं।
अस्थिर मन वाले की सोच स्थिर नहीं रहती।
असहाय पथिक बनकर मार्ग में न जाएं।
असंशय की स्थिति में विनाश से अच्छा तो संशय की स्थिति में हुआ विनाश होता है।
अशुभ कार्यों को नहीं करना चाहिए।
अशुभ कार्य न चाहने वाले स्त्रियों में आसक्त नहीं होते।
अविश्वसनीय लोगों पर विश्वास नहीं करना चाहिए।
अविनीत व्यक्ति को स्नेही होने पर भी मंत्रणा में नहीं रखना चाहिए।
अविनीत व्यक्ति को स्नेही होने पर भी अपनी मंत्रणा में नहीं रखना चाहिए।
अविनीत (जो विनम्र न हो) स्वामी के होने से तो स्वामी का न होना अच्छा है।
अल्प व्यसन भी दुःख देने वाला होता है।
अर्थ, धर्म और कर्म का आधार है।
अर्थ कार्य का आधार है।
अर्थ का आधार राज्य है।
अप्राप्त लाभ आदि राज्यतंत्र के चार आधार है।
अपराध के अनुरूप ही दंड दें।
अपने स्वामी के स्वभाव को जानकर ही आश्रित कर्मचारी कार्य करते है।
अपने स्थान पर बने रहने से ही मनुष्य पूजा जाता है।
अपने से अधिक शक्तिशाली और समान बल वाले से शत्रुता न करें।
अपने व्यवसाय में सफल नीच व्यक्ति को भी साझीदार नहीं बनाना चाहिए।
अपने धर्म के लिए ही कोई सत्पुरुष कहलाता है।
अपने तथा अन्य लोगों के बिगड़े कार्यों का स्वयं निरिक्षण करना चाहिए।
अपने कुल अर्थात वंश के अनुसार ही व्यवहार करें।
अपने कार्य की शीघ्र सिद्धि चाहने वाला व्यक्ति नक्षत्रों की परीक्षा नहीं करता।
अपनी सेवा से स्वामी की कृपा पाना सेवकों का धर्म है।
अपनी शक्ति को जानकार ही कार्य करें।
अपनी दासी को ग्रहण करना स्वयं को दास बना लेना है।
अपनी कमजोरी का प्रकाशन न करें।
अन्न के सिवाय कोई दूसरा धन नहीं है।
अनुराग अर्थात प्रेम फल अथवा परिणाम से ज्ञात होता है।
अधिक मैथुन (सेक्स) से पुरुष बूढ़ा हो जाता है।
अधर्म बुद्धि से आत्मविनाश की सुचना मिलती है।
अत्यधिक भार उठाने वाला व्यक्ति जल्दी थक जाता है।
अत्यधिक आदर-सत्कार से शंका उत्पन्न हो जाती है।
अति आसक्ति दोष उत्पन्न करती है।
अज्ञानी व्यक्ति के कार्य को बहुत अधिक महत्तव नहीं देना चाहिए।
अज्ञानी लोगों द्वारा प्रचारित बातों पर चलने से जीवन व्यर्थ हो जाता है।
अजीर्ण की स्थिति में भोजन दुःख पहुंचाता है।
अग्नि में दुर्बलता नहीं होती।
अग्नि के समान तेजस्वी जानकर ही किसी का सहारा लेना चाहिए।
अगम्भीर विद्वान को संसार में सम्मान नहीं मिलता।
अकुलीन धनिक भी कुलीन से श्रेष्ठ है।
अकारण किसी के घर में प्रवेश न करें।
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चाणक्य नीति – काम पर चाणक्य के अनमोल विचार Chanakya quotes in Hindi

Chanakya Neeti – Kam par Chanakya ke Anmol vichar

नास्ति कामसमो व्याधिर्नास्ति मोहसमो रिपुः। नास्ति कोप समो वह्नि र्नास्ति ज्ञानात्परं सुखम्॥
काम के समान व्याधि नहीं है, मोह-अज्ञान के समान कोई शत्रु नहीं है, क्रोध के समान कोई आग नहीं है तथा ज्ञान के समान कोई सुख नहीं है ।

धर्मार्थकाममोक्षाणां यस्यैकोऽपि न विद्वते। अजागलस्तनस्येव तस्य जन्म निरर्थकम्॥
धर्म, अर्थ, काम तथा मोक्ष में से जिस व्यक्ति को एक भी नहीं पाता, उसका जीवन बकरी के गले के स्थान के समान व्यर्थ है ।

कामं क्रोधं तथा लोभं स्वाद शृङ्गारकौतुकम्। अतिनिद्राऽतिसेवा च विद्यार्थी ह्याष्ट वर्जयेत्॥
काम, क्रोध, लोभ, स्वाद, शृंगार, कौतुक, अधिक सोना, अधिक सेवा करना, इन आठ कामों को विद्यार्थी छोड़ दे ।

नैव पश्यति जन्मान्धः कामान्धो नैव पश्यति। मदोन्मत्ता न पश्यन्ति अर्थी दोषं न पश्यति॥
जन्मान्ध कुछ नहीं देख सकता । ऐसे ही कामान्ध और नशे में पागल बना व्यक्ति भी कुछ नहीं देखता । स्वार्थी व्यक्ति भी किसी में कोई दोष नहीं देखता ।

निस्पृहो नाधिकारी स्यान्न कामी भण्डनप्रिया। नो विदग्धः प्रियं ब्रूयात् स्पष्ट वक्ता न वञ्चकः॥
विरक्त व्यक्ति किसी विषय का अधिकारी नहीं होता, जो व्यक्ति कामी नहीं होता, उसे बनाव – शृंगार की आवश्यकता नहीं होती । विद्वान व्यक्ति प्रिय नहीं बोलता तथा स्पष्ट बोलनेवाला ठग नहीं होता ।

धर्मार्थकाममोश्रेषु यस्यैकोऽपि न विद्यते। जन्म जन्मानि मर्त्येषु मरणं तस्य केवलम्॥
जिस मनुष्य को धर्म, काम-भोग, मोक्ष में से एक भी वस्तु नहीं मिल पाती, उसका जन्म केवल मरने के लिए ही होता है

 

चाणक्य नीति – दुष्ट (दुष्टता) पर चाणक्य के अनमोल विचार Chanakya quotes in Hindi

Chanakya Neeti – Dushtata par Chanakya ke Anmol vichar

 

चाणक्य नीति दुष्ट के साथ दुष्टता का ही व्यवहार करना चाहिए Dushtata par Chanakya ke Anmol vicharकृते प्रतिकृतिं कुर्यात् हिंसेन प्रतिहिंसनम् । तत्र दोषो न पतति दुष्टे दौष्ट्यं समाचरेत्॥
उपकारी के साथ उपकार, हिंसक के साथ प्रतिहिंसा करनी चाहिए तथा दुष्ट के साथ दुष्टता का ही व्यवहार करना चाहिए। इसमें कोई दोष नहीं है ।

मूर्खशिष्योपदेशेन दुष्टास्त्रीभरणेन च। दुःखितैः सम्प्रयोगेण पण्डितोऽप्यवसीदति॥
मूर्ख शिष्य को पढ़ाने पर , दुष्ट स्त्री के साथ जीवन बिताने पर तथा दुःखियों- रोगियों के बीच में रहने पर विद्वान व्यक्ति भी दुःखी हो ही जाता है ।

दुष्टा भार्या शठं मित्रं भृत्यश्चोत्तरदायकः। ससर्पे गृहे वासो मृत्युरेव न संशयः॥
दुष्ट पत्नी, शठ मित्र , उत्तर देने वाला सेवक तथा सांप वाले घर में निवास करना , ये मृत्यु के कारण हैं इसमें सन्देह नहीं करनी चाहिए ।

दुराचारी च दुर्दृष्टिर्दुराऽऽवासी च दुर्जनः। यन्मैत्री क्रियते पुम्भिर्नरः शीघ्र विनश्यति ॥
दुराचारी, दुष्ट स्वभाववाला, बिना किसी कारण दूसरों को हानि पहुँचानेवाला तथा दुष्ट व्यक्ति से मित्रता रखने वाला श्रेष्ठ पुरुष भी शीघ्र ही नष्ट हो जाते है क्यूोंकि संगति का प्रभाव बिना पड़े नहीं रहता है ।

दुर्जनेषु च सर्पेषु वरं सर्पो न दुर्जनः। सर्पो दंशति कालेन दुर्जनस्तु पदे-पदे ॥
दुष्ट और साँप, इन दोनों में साँप अच्छा है, न कि दुष्ट । साँप तो एक ही बार डसता है, किन्तु दुष्ट तो पग-पग पर डसता रहता है ।

उपसर्गेऽन्यच्रके च दुर्भिक्षे च भयावहे। असाधुजनसम्पर्के पलायति स जीवति॥
उपद्रव या लड़ाई हो जाने पर, भयंकर अकाल पड़ जाने पर और दुष्टों का साथ मिलने पर भाग जाने वाला व्यक्ति ही जीता है ।

कुग्रामवासः कुलहीन सेवा कुभोजन क्रोधमुखी च भार्या। पुत्रश्च मूर्खो विधवा च कन्या विनाग्निमेते प्रदहन्ति कायम्॥
दुष्टों के गाँव में रहना, कुलहीन की सेवा, कुभोजन, कर्कशा पत्नी, मुर्ख पुत्र तथा विधवा पुत्री ये सब व्यक्ति को बिना आग के जला डालते हैं ।

कुराजराज्येन कृतः प्रजासुखं कुमित्रमित्रेण कुतोऽभिनिवृत्तिः। कुदारदारैश्च कुतो गृहे रतिः कृशिष्यमध्यापयतः कुतो यशः॥
दुष्ट राजा के राज्य में प्रजा सुखी कैसे रह सकती है ! दुष्ट मित्र से आनंद कैसे मिल सकता है ! दुष्ट पत्नी से घर में सुख कैसे हो सकता है ! तथा दुष्ट – मूर्ख शिष्य को पढ़ाने से यश कैसे मिल सकता है !

शकटं पञ्चहस्तेन दशहस्तेन वाजिनम्। हस्तिनं शतहस्तेन देशत्यागेन दुर्जनम्॥
बैलगाड़ी से पांच हाथ घोड़े से दस हाथ और हाथी से सौ हाथ दूर रहना चाहिए किन्तु दुष्ट व्यक्ति से बचने के लिए थोड़ा – बहुत अन्तर पर्याप्त नहीं, उससे बचने के लिए तो आवश्यकता पड़ने पर देश को भी त्याग देना चाहिए।

हस्ती त्वंकुशमात्रेण बाजो हस्तेन तापते। शृङ्गीलकुटहस्तेन खड्गहस्तेन दुर्जनः॥
हाथी को अंकुश से, घोड़े को हाथ से, सींगोंवाले पशुओं को हाथ या लकड़ी से तथा दुष्ट को खड्ग हाथ में लेकर पीटा जाता है ।

अन्तर्गतमलो दुष्टस्तीर्थस्नानशतैरपि। न शुद्धयतियथाभाण्डं सुरया दाहितं च तत्॥
जैसे सुरापात्र अग्नि में जलाने पर भी शुद्ध नहीं होता । इसी प्रकार जिसके मन में मैल हो, वह दुष्ट चाहे सैकड़ों तीर्थ – स्नान का ले, कभी शुद्ध नहीं होता ।

दह्यमानां सुतीव्रेण नीचाः परयशोऽग्निना। अशक्तास्तत्पदं गन्तुं ततो निन्दां प्रकुर्वते॥
दुष्ट व्यक्ति दूसरे की उन्नति को देखकर जलता है वह स्वयं उन्नति नहीं कर सकता । इसलिए वह निन्दा करने लगता है

त्यज दुर्जनसंसर्गं भज साधुसमागमम् । कुरु पुण्यमहोरात्रं स्मर नित्यमनित्यतः॥
दुष्टों का साथ छोड़ दो, सज्जनों का साथ करो, रत-दिन अच्छे काम करो तथा सदा ईश्वर को याद करो । यही मानव का धर्म है ।

जले तैलं खले गुह्यं पात्रे दानं मनागपि । प्राज्ञे शास्त्रं स्वयं याति विस्तारे वस्तुशक्तितः॥
जल में तेल, दुष्ट से कही गई बात, योग्य व्यक्ति को दिया गया दान तथा बुद्धिमान को दिया ज्ञान थोड़ा सा होने पर भी अपने- आप विस्तार प्राप्त कर लेते हैं ।

चाणक्य नीति – मूर्ख (मूर्खता) पर चाणक्य के अनमोल विचार Chanakya quotes in Hindi

Chanakya Neeti – Murkhata par Chanakya ke Anmol vichar

मूर्खशिष्योपदेशेन दुष्टास्त्रीभरणेन च। दुःखितैः सम्प्रयोगेण पण्डितोऽप्यवसीदति॥
मूर्ख शिष्य को पढ़ाने पर , दुष्ट स्त्री के साथ जीवन बिताने पर तथा दुःखियों- रोगियों के बीच में रहने पर विद्वान व्यक्ति भी दुःखी हो ही जाता है ।

कष्टं च खलु मूर्खत्वं कष्ट च खलु यौवनम्। कष्टात्कष्टतरं चैव परगृहेनिवासनम् ॥
मूर्खता कष्ट है, यौवन भी कष्ट है, किन्तु दूसरों के घर में रहना कष्टों का भी कष्ट है ।

मूर्खस्तु परिहर्तव्यः प्रत्यक्षो द्विपदः पशुः। भिनत्ति वाक्यशूलेन अदृश्ययं कण्टकं यथा ॥
मूर्ख व्यक्ति को दो पैरोंवाला पशु समझकर त्याग देना चाहिए, क्योंकि वह अपने शब्दों से शूल के समान उसी तरह भेदता रहता है, जैसे अदृश्य कांटा चुभ जाता है|

मूर्खाः यत्र न पूज्यन्ते धान्यं यत्र सुसंचितम् । दाम्पत्योः कलहो नास्ति तत्र श्री स्वयमागता॥
जहां मूर्खों का सम्मान नहीं होता, अन्न का भण्डार भरा रहता है और पति-पत्नी में कलह नहीं हो, वहां लक्ष्मी स्वयं आती है ।

मूर्खश्चिरायुर्जातोऽपि तस्माज्जातमृतो वरः। मृतः स चाल्पदुःखाय यावज्जीवं जडो दहेत्॥
मूर्ख पुत्र के चिरायु होने से मर जाना अच्छा है, क्योंकि ऐसे पुत्र के मरने पर एक ही बार दुःख होता है, जिन्दा रहने पर वह जीवन भर जलता रहता है ।

कुग्रामवासः कुलहीन सेवा कुभोजन क्रोधमुखी च भार्या। पुत्रश्च मूर्खो विधवा च कन्या विनाग्निमेते प्रदहन्ति कायम्॥
दुष्टों के गाँव में रहना, कुलहीन की सेवा, कुभोजन, कर्कशा पत्नी, मूर्ख पुत्र तथा विधवा पुत्री ये सब व्यक्ति को बिना आग के जला डालते हैं ।

अपुत्रस्य गृहं शून्यं दिशः शून्यास्त्वबान्धवाः। मूर्खस्य हृदयं शून्यं सर्वशून्यं दरिद्रता॥
पुत्रहीन के लिए घर सुना हो जाता है, जिसके भाई न हों उसके लिए दिशाएं सूनी हो जाती हैं, मूर्ख का हृदय सूना होता है, किन्तु निर्धन के लिए सब कुछ सूना हो जाता है ।

लुब्धमर्थेन गृह्णीयात्स्तब्धमञ्जलिकर्मणा। मूर्खश्छन्दानुरोधेन यथार्थवादेन पण्डितम्॥
लालची को धन देकर, अहंकारी को हाथ जोड़कर, मूर्ख को उपदेश देकर तथा पण्डित को यथार्थ बात बताकर वश में करना चाहिए ।

कुराजराज्येन कृतः प्रजासुखं कुमित्रमित्रेण कुतोऽभिनिवृत्तिः। कुदारदारैश्च कुतो गृहे रतिः कृशिष्यमध्यापयतः कुतो यशः॥
दुष्ट राजा के राज्य में प्रजा सुखी कैसे रह सकती है ! दुष्ट मित्र से आनंद कैसे मिल सकता है ! दुष्ट पत्नी से घर में सुख कैसे हो सकता है ! तथा दुष्ट – मूर्ख शिष्य को पढ़ाने से यश कैसे मिल सकता है !

शुनः पुच्छमिव व्यर्थं जीवितं विद्यया विना। न गुह्यगोपने शक्तं न च दंशनिवारणे॥
जिस प्रकार कुत्ते की पुंछ से न तो उसके गुप्त अंग छिपते हैं और न वह मच्छरों के काटने से रोक सकती है, इसी प्रकार विद्या से रहित जीवन भी व्यर्थ है । क्योंकि विद्याविहीन मनुष्य मूर्ख होने के कारण न अपनी रक्षा कर सकते है न अपना भरण- पोषण ।

अहिं नृपं च शार्दूलं वराटं बालकं तथा। परश्वानं च मूर्खं च सप्तसुप्तान् बोधयेत्॥
सांप, राजा, शेर, बर्र, बच्चा, दूसरे का कुत्ता तथा मूर्ख इनको सोए से नहीं जगाना चाहिए ।

पृथिव्यां त्रीणी रत्नानि अन्नमापः सुभाषितम् । मूढैः पाषाणखण्डेषु रत्नसंज्ञा विधीयते ॥
अनाज, पानी और सबके साथ मधुर बोलना – ये तीन चीजें ही पृथ्वी के सच्चे रत्न हैं । हीरे जवाहरात आदि पत्थर के टुकड़े ही तो हैं । इन्हें रत्न कहना केवल मूर्खता है ।

 

चाणक्य नीति – कुल (खानदान) पर चाणक्य के अनमोल विचार Chanakya quotes in Hindi

Chanakya Neeti – Kul (Khandan) par Chanakya ke Anmol vichar

वरयेत्कुलजां प्राज्ञो निरूपामपि कन्यकाम्। रूपवतीं न नीचस्य विवाहः सदृशे कुले ॥
बुद्धिमान मनुष्य को चाहिए कि वह रूपवती न होने पर भी कुलीन कन्या से विवाह कर ले, किन्तु नीच कुल की कन्या यदि रूपवती तथा सुशील भी हो, तो उससे विवाह न करे । क्योँकि विवाह समान कुल में ही करनी चाहिए ।

कस्य दोषः कुले नास्ति व्याधिना को न पीडितः। व्यसनं केन न प्राप्तं कस्य सौख्यं निरन्तरम् ॥
किसके कुल में दोष नहीं होता ? रोग किसे दुःखी नहीं करते ? दुःख किसी नहीं मिलता और निरंतर सुखी कौन रहता है अर्थात कुछ न कुछ कमी तो सब जगह है और यह एक कड़वी सच्चाई है ।

आचारः कुलमाख्याति देशमाख्याति भाषणम्। सम्भ्रमः स्नेहमाख्याति वपुराख्याति भोजनम् ॥
आचरण से व्यक्ति के कुल का परिचय मिलता है । बोली से देश का पता लगता है । आदर-सत्कार से प्रेम का तथा शरीर को देखकर व्यक्ति के भोजन का पता चलता है ।

रूपयौवनसम्पन्ना विशालकुलसम्भवाः। विद्याहीना न शोभन्ते निर्गन्धा इव किंशुकाः ॥
रूप और यौवन से सम्पन्न, उच्च कुल में उत्पन्न होकर भी विद्याहीन मनुष्य सुगन्धहीन फूल के समान होते हैं और शोभा नहीं देते |

त्यजेदेकं कुलस्यार्थे ग्रामस्यार्थे कुलं त्यजेत्। ग्रामं जनपदस्यार्थे आत्मार्थे पृथिवीं त्यजेत्॥
व्यक्ति को चाहिए कि कुल के लिए एक व्यक्ति को त्याग दे । ग्राम के लिए कुल को त्याग देना चाहिए । राज्य की रक्षा के लिए ग्राम को तथा आत्मरक्षा के लिए संसार को भी त्याग देना चाहिए ।

एकेनापि सुवर्ण पुष्पितेन सुगन्धिता। वसितं तद्वनं सर्वं सुपुत्रेण कुलं यथा॥
जिस प्रकार वन में सुन्दर खिले हुए फूलोंवाला एक ही वृक्ष अपनी सुगन्ध से सारे वन को सुगन्धित कर देते है उसी प्रकार एक ही सुपुत्र सारे कुल का नाम ऊंचा कर देता है |

एकेन शुष्कवृक्षेण दह्यमानेन वह्निना। दह्यते तद्वनं सर्वं कुपुत्रेण कुलं यथा॥
जिस प्रकार एक ही सूखे वृक्ष में आग लगने पर सारा वन जल जाता है इसी प्रकार एक ही कुपुत्र सारे कुल को बदनाम कर देता है |

एकेनापि सुपुत्रेण विद्यायुक्ते च साधुना। आह्लादितं कुलं सर्वं यथा चन्द्रेण शर्वरी॥
जिस प्रकार अकेला चन्द्रमा रात की शोभा बढ़ा देता है, ठीक उसी प्रकार एक ही विद्वान -सज्जन पुत्र कुल को आह्लादित करता है ।

किं जातैर्बहुभिः पुत्रैः शोकसन्तापकारकैः। वरमेकः कुलावल्भबो यत्र विश्राम्यते कुलम्॥
शौक और सन्ताप उत्पन करने वाले अनेक पुत्रों के पैदा होने से क्या लाभ कुल को सहारा देनेवाले एक ही पुत्र श्रेठ है, जिसके सहारे सारा कुल विश्राम करता है ।

साधुम्यस्ते निवर्तन्ते पुत्रः मित्राणि बान्धवाः। ये च तैः सह गन्तारस्तद्धर्मात्सुकृतं कुलम्॥
संसार के अधिकतर पुत्र,मित्र और भाई साधु-महात्माओं, विद्वानों आदि की संगति से दूर रहते हैं । जो लोग सत्संगति करते हैं, वे अपने कुल को पवित्र कर देते हैं ।

एकोऽपि गुणवान् पुत्रो निर्गुणैश्च शतैर्वरः। एकश्चन्द्रस्तमो हन्ति न च ताराः सहस्रशः॥
जिस प्रकार एक चाँद ही रात्रि के अन्धकार को दूर करता है, असंख्य तारे मिलकर भी रात्रि के गहन अन्धकार को दूर नहीं कर सकते, उसी प्रकार एक गुणी पुत्र ही अपने कुल का नाम रोशन करता है, उसे ऊंचा उठता है । सैकड़ों निकम्मे पुत्र मिलकर भी कुल की प्रतिष्ठा को ऊंचा नहीं उठा सकते ।

कुग्रामवासः कुलहीन सेवा कुभोजन क्रोधमुखी च भार्या। पुत्रश्च मूर्खो विधवा च कन्या विनाग्निमेते प्रदहन्ति कायम्॥
दुष्टों के गाँव में रहना, कुलहीन की सेवा, कुभोजन, कर्कशा पत्नी, मुर्ख पुत्र तथा विधवा पुत्री ये सब व्यक्ति को बिना आग के जला डालते हैं ।

अभ्यासाद्धार्यते विद्या कुलं शीलेन धार्यते। गुणेन ज्ञायते त्वार्य कोपो नेत्रेण गम्यते॥
अभ्यास से विद्या का, शील-स्वभाव से कुल का, गुणों से श्रेष्टता का तथा आँखों से क्रोध का पता लग जाता है ।

गुणो भूषयते रूपं शीलं भूषयते कुलम्। सिद्धिर्भूषयते विद्यां भोगो भूषयते धनम्॥
गुण रूप कि शोभा बढ़ाते हैं, शील – स्वभाव कुल की शोभा बढ़ाता है, सिद्धि विद्या की शोभा बढ़ाती है और भोग करना धन की शोभा बढ़ाता है ।

निर्गुणस्य हतं रूपं दुःशीलस्य हतं कुलम्। असिद्धस्य हता विद्या अभोगस्य हतं धनम्॥
गुणहीन का रूप, दुराचारी का कुल तथा अयोग्य व्यक्ति की विद्या नष्ट हो जाती है । धन का भोग न करने से धन भी नष्ट हो जाता है ।

किं कुलेन विशालेन विद्याहीने च देहिनाम्। दुष्कुलं चापि विदुषी देवैरपि हि पूज्यते॥
विद्याहीन होने पर विशाल कुल का क्या करना? विद्वान नीच कुल का भी हो, तो देवताओं द्वारा भी पूजा जाता है ।

 

चाणक्य नीति – दरिद्रता पर चाणक्य के अनमोल विचार Chanakya quotes in Hindi

Chanakya Neeti – daridrata par Chanakya ke Anmol vichar

उद्योगे नास्ति दारिद्रयं जपतो नास्ति पातकम्। मौनेन कलहो नास्ति जागृतस्य च न भयम्॥
उद्यम से दरिद्रता तथा जप से पाप दूर होता है । मौन रहने से कलह और जागते रहने से भय नहीं होता ।

अपुत्रस्य गृहं शून्यं दिशः शून्यास्त्वबान्धवाः। मूर्खस्य हृदयं शून्यं सर्वशून्यं दरिद्रता॥
पुत्रहीन के लिए घर सुना हो जाता है, जिसके भाई न हों उसके लिए दिशाएं सूनी हो जाती हैं, मूर्ख का हृदय सूना होता है, किन्तु निर्धन के लिए सब कुछ सूना हो जाता है ।

दारिद्रयनाशनं दानं शीलं दुर्गतिनाशनम्। अज्ञानतानाशिनी प्रज्ञा भावना भयनाशिनी॥
दान दरिद्रता को नष्ट कर देता है । शील स्वभाव से दुःखों का नाश होता है । बुद्धि अज्ञान को नष्ट कर देती है तथा भावना से भय का नाश हो जाता है ।

अत्यन्तलेपः कटुता च वाणी दरिद्रता च स्वजनेषु वैरम्। नीच प्रसङ्गः कुलहीनसेवा चिह्नानि देहे नरकस्थितानाम्॥
अत्यन्त क्रोध, कटु वाणी, दरिद्रता, स्वजनों से वैर, नीच लोगों का साथ, कुलहीन की सेवा – नरक की आत्माओं के यही लक्षण होते हैं ।

दरिद्रता धीरयता विराजते कुवस्त्रता स्वच्छतया विराजते। कदन्नता चोष्णतया विराजते कुरूपता शीलतया विराजते॥
धीरज से दरिद्रता भी सुन्दर लगती है, साफ रहने पर मामूली वस्त्र भी अच्छे लगते हैं, गर्म किये जाने पर बासी भोजन भी सुन्दर जान परता है और शील – स्वभाव से कुरूपता भी सुन्दर लगती है ।

प्रियवाक्यप्रदानेन सर्वे तुष्यन्ति मानवाः । तस्मात् तदेव वक्तव्यं वचने का दरिद्रता ॥
मधुर वचन बोलना, दान के समान है । इससे सभी मनुष्यों को आनन्द मिलता है । अतः मधुर ही बोलना चाहिए । बोलने में कैसी गरीबी !

 

चाणक्य नीति – ज्ञान पर चाणक्य के अनमोल विचार Chanakya quotes in Hindi

Chanakya Neeti – Gyan par Chanakya ke Anmol vichar

कोकिलानां स्वरो रूपं नारी रूपं पतिव्रतम्। विद्या रूपं कुरूपाणां क्षमा रूपं तपस्विनाम्॥
कोयलों का रूप उनका स्वर है । पतिव्रता होना ही स्त्रियों की सुन्दरता है। कुरूप लोगों का ज्ञान ही उनका रूप है तथा तपस्वियों का क्षमा- भाव ही उनका रूप है ।

अनभ्यासे विषं शास्त्रमजीर्णे भोजनं विषम्। दरिद्रस्य विषं गोष्ठी वृद्धस्य तरुणी विषम्॥
जिस प्रकार बढ़िया-से बढ़िया भोजन बदहजमी में लाभ करने के स्थान में हानि पहुँचता है और विष का काम करता है, उसी प्रकार निरन्तर अभ्यास न रखने से शास्त्रज्ञान भी मनुष्य के लिए घातक विष के समान हो जाता है ।

दारिद्रयनाशनं दानं शीलं दुर्गतिनाशनम्। अज्ञानतानाशिनी प्रज्ञा भावना भयनाशिनी॥
दान दरिद्रता को नष्ट कर देता है । शील स्वभाव से दुःखों का नाश होता है । बुद्धि अज्ञान को नष्ट कर देती है तथा भावना से भय का नाश हो जाता है ।

नास्ति कामसमो व्याधिर्नास्ति मोहसमो रिपुः। नास्ति कोप समो वह्नि र्नास्ति ज्ञानात्परं सुखम्॥
काम के समान व्याधि नहीं है, मोह-अज्ञान के समान कोई शत्रु नहीं है, क्रोध के समान कोई आग नहीं है तथा ज्ञान के समान कोई सुख नहीं है ।

तृणं ब्रह्मविद स्वर्गं तृणं शूरस्य जीवनम्। जिमाक्षस्य तृणं नारी निःस्पृहस्य तृणं जगत्॥
ब्रह्मज्ञानी को स्वर्ग, वीर को अपना जीवन, संयमी को अपना स्त्री तथा निस्पृह को सारा संसार तिनके के समान लगता है।

श्रुत्वा धर्म विजानाति श्रुत्वा त्यजति दुर्मतिम्। श्रुत्वा ज्ञानमवाप्नोति श्रुत्वा मोक्षमवाप्नुयात्॥
सुनकर ही मनुष्य को अपने धर्म का ज्ञान होता है, सुनकर ही वह दुर्बुद्धि का त्याग करता है । सुनकर ही उसे ज्ञान प्राप्त होता है और सुनकर ही मोक्ष मिलता है ।

दातृत्वं प्रियवक्तृत्वं धीरत्वमुचितज्ञता। अभ्यासेन न लभ्यन्ते चत्वारः सहजा गुणाः॥
दान देने की आदत, प्रिय बोलना, धीरज तथा उचित-अनुचित का ज्ञान – ये चार व्यक्ति के सहज गुण हैं ; जो अभ्यास से नहीं आते ।

सत्यं माता पिता ज्ञानं धर्मो भ्राता दया सखा। शान्तिः पत्नी क्षमा पुत्रः षडेते मम बान्धवाः॥
सत्य मेरी माता है, ज्ञान पिता है, भाई धर्म है, दया मित्र है, शान्ति पत्नी है तथा क्षमा पुत्र है, ये छः ही मेरी सगे- सम्बन्धी हैं ।

देहाभिमानगलिते ज्ञानेन परमात्मनः। यत्र यत्र मनो याति तत्र तत्र समाधयः॥
परमात्मा का ज्ञान हो जाने पर देह का अभिमान गल जाता है । तब मन जहां भी जाता है, उसे वहीं समाधि लग जाती है ।

जले तैलं खले गुह्यं पात्रे दानं मनागपि । प्राज्ञे शास्त्रं स्वयं याति विस्तारे वस्तुशक्तितः॥
जल में तेल, दुष्ट से कही गई बात, योग्य व्यक्ति को दिया गया दान तथा बुद्धिमान को दिया ज्ञान थोड़ा सा होने पर भी अपने- आप विस्तार प्राप्त कर लेते हैं ।

दाने तपसि शौर्ये च विज्ञाने विनये नये । विस्मयो न हि कर्तव्यो बहुरत्ना वसुन्धरा॥
मानव-मात्र में कभी भी अहंकार की भावना नहीं रहनी चाहिए बल्कि मानव को दान, तप, शूरता, विद्वता, शुशीलता और नीतिनिपुर्णता का कभी अहंकार नहीं करना चाहिए । यह अहंकार ही मानव मात्र के दुःख का कारण बनता है और उसे ले डूबता है ।

प्रस्तावसदृशं वाक्यं प्रभावसदृशं प्रियम् । आत्मशक्तिसमं कोपं यो जानाति स पण्डितः॥
किसी सभा में कब क्या बोलना चाहिए, किससे प्रेम करना चाहिए तथा कहां पर कितना क्रोध करना चाहिए जो इन सब बातों को जानता है, उसे पण्डित अर्थात ज्ञानी व्यक्ति कहा जाता है ।

यस्य चित्तं द्रवीभूतं कृपया सर्वजन्तुषु । तस्य ज्ञानेन मोक्षेण किं जटा भसमलेपनैः॥
जिस मनुष्य का हृदय सभी प्राणियों के लिए दया से द्रवीभूत हो जाता है, उसे ज्ञान, मोक्ष, जता, भष्म – लेपन आदि से क्या लेना ।

एकमेवाक्षरं यस्तु गुरुः शिष्यं प्रबोधयेत् । पृथिव्यां नास्ति तद्द्रव्यं यद् दत्त्वा चाऽनृणी भवेत् ॥
जो गुरु शिष्य को एक अक्षर का भी ज्ञान करता है, उसके ऋण से मुक्त होने के लिए, उसे देने योग्य पृथ्वी में कोई पदार्थ नहीं है ।

दानेन पाणिर्न तु कङ्कणेन स्नानेन शुद्धिर्न तु चन्दनेन । मानेन तृप्तिर्न तु भोजनेन ज्ञानेन मुक्तिर्न तु मण्डनेन॥
दान से ही हाथों की सुन्दरता है, न कि कंगन पहनने से, शरीर स्नान से ही शुद्ध होता है न कि चन्दन का लेप लगाने से, तृप्ति मान से होता है, न कि भोजन से, मोक्ष ज्ञान से मिलता है, न कि श्रृंगार से ।

चाणक्य नीति – कार्य पर चाणक्य के अनमोल विचार Chanakya quotes in Hindi

Chanakya Neeti – Karya par Chanakya ke Anmol vichar

प्रभूतं कार्यमपि वा तत्परः प्रकर्तुमिच्छति। सर्वारम्भेण तत्कार्यं सिंहादेकं प्रचक्षते॥
छोटा हो या बड़ा, जो भी काम करना चाहें, उसे अपनी पूरी शक्ति लगाकर करें, यह गुण हमें शेर से सीखना चाहिए

इन्द्रियाणि च संयम्य बकवत्पण्डितो नरः। देशकालः बलं ज्ञात्वा सर्वकार्याणि साधयेत्॥
बगुले के समान इंद्रियों को वश में करके देश, काल एवं बल को जानकर विद्वान अपना कार्य सफल करें ।

कश्चित् कस्यचिन्मित्रं, न कश्चित् कस्यचित् रिपु:। अर्थतस्तु निबध्यन्ते, मित्राणि रिपवस्तथा ॥
न कोई किसी का मित्र है और न ही शत्रु, कार्यवश ही लोग मित्र और शत्रु बनते हैं ।

जानीयात्प्रेषणेभृत्यान् बान्धवान्व्यसनाऽऽगमे। मित्रं याऽऽपत्तिकालेषु भार्यां च विभवक्षये ॥
किसी महत्वपूर्ण कार्य पर भेज़ते समय सेवक की पहचान होती है । दुःख के समय में बन्धु-बान्धवों की, विपत्ति के समय मित्र की तथा धन नष्ट हो जाने पर पत्नी की परीक्षा होती है ।

आतुरे व्यसने प्राप्ते दुर्भिक्षे शत्रुसण्कटे। राजद्वारे श्मशाने च यात्तिष्ठति स बान्धवः ॥
जब कोई बीमार होने पर, असमय शत्रु से घिर जाने पर, राजकार्य में सहायक रूप में तथा मृत्यु पर श्मशान भूमि में ले जाने वाला व्यक्ति सच्चा मित्र और बन्धु है ।

परोक्षे कार्यहन्तारं प्रत्यक्षे प्रियवादिनम्। वर्जयेत्तादृशं मित्रं विषकुम्भं पयोमुखम् ॥
पीठ पीछे काम बिगाड़नेवाले था सामने प्रिय बोलने वाले ऐसे मित्र को मुंह पर दूध रखे हुए विष के घड़े के समान त्याग देना चाहिए ।

मनसा चिन्तितं कार्यं वाचा नैव प्रकाशयेत्। मन्त्रेण रक्षयेद् गूढं कार्य चापि नियोजयेत् ॥
मन में सोचे हुए कार्य को मुंह से बाहर नहीं निकालना चाहिए । मन्त्र के समान गुप्त रखकर उसकी रक्षा करनी चाहिए । गुप्त रखकर ही उस काम को करना भी चाहिए ।

तादृशी जायते बुद्धिर्व्यवसायोऽपि तादृशः। सहायास्तादृशा एव यादृशी भवितव्यता॥
मनुष्य जैसा भाग्य लेकर आता है उसकी बुद्धि भी उसी समान बन जाती है, कार्य – व्यापार भी उसी अनुरूप मिलता है । उसके सहयोगी, संगी – साथी भी उसके भाग्य के अनुरूप ही होते हैं । सारा क्रियाकलाप भाग्यनुसार ही संचालित होता है ।

सुश्रान्तोऽपि वहेद् भारं शीतोष्णं न पश्यति। सन्तुष्टश्चरतो नित्यं त्रीणि शिक्षेच्च गर्दभात्॥
विद्वान व्यक्ति को चाहिए की वे गधे से तीन गुण सीखें| जिस प्रकार अत्यधिक थका होने पर भी वह बोझ ढोता रहता है, उसी प्रकार बुद्धिमान व्यक्ति को भी आलस्य न करके अपने लक्ष्य की प्राप्ति और सिद्धि के लिए सदैव प्रयत्न करते रहना चाहिए । कार्य सिद्धि में ऋतुओं के सर्द और गर्म होने का भी चिंता नहीं करना चाहिए और जिस प्रकार गधा संतुष्ट होकर जहां – तहां चर लेता है, उसी प्रकार बुद्धिमान व्यक्ति को भी सदा सन्तोष रखकर कर्म में प्रवृत रहना चाहिए ।

 

चाणक्य नीति – विष पर चाणक्य के अनमोल विचार Chanakya quotes in Hindi

Chanakya Neeti – Vish par Chanakya ke Anmol vichar

परोक्षे कार्यहन्तारं प्रत्यक्षे प्रियवादिनम्। वर्जयेत्तादृशं मित्रं विषकुम्भं पयोमुखम् ॥
पीठ पीछे काम बिगाड़नेवाले था सामने प्रिय बोलने वाले ऐसे मित्र को मुंह पर दूध रखे हुए विष के घड़े के समान त्याग देना चाहिए ।

अनभ्यासे विषं शास्त्रमजीर्णे भोजनं विषम्। दरिद्रस्य विषं गोष्ठी वृद्धस्य तरुणी विषम्॥
जिस प्रकार बढ़िया-से बढ़िया भोजन बदहजमी में लाभ करने के स्थान में हानि पहुँचता है और विष का काम करता है, उसी प्रकार निरन्तर अभ्यास न रखने से शास्त्रज्ञान भी मनुष्य के लिए घातक विष के समान हो जाता है ।

अजीर्णे भेषजं वारि जीर्णे तद् बलप्रदम्। भोजने चामृतं वारि भोजनान्तें विषप्रदम्॥
भोजन न पचने पर जल औषधि के समान होता है । भोजन करते समय जल अमृत है तथा भोजन के बाद विष का काम करता है ।