गुलाम युसूफ- Prerak Prasang

Gulam Yusuf ka Prerak prasang

यूनान में तब गुलाम प्रथा चरम पर थी। एक रईसजादा जो स्वभाव से कृपण भी था एक गुलाम को खरीद लाया, जो अपनी बदसूरती के कारण उसे सस्ते दाम में मिल गया था।

गुलाम युसूफ- Prerak Prasang

जब वह उस गुलाम को लेकर घर पहुंचा तो उसे देख उसकी बीवी आग बबूला हो गई। वह गुलाम एक आंख से काना था, दांत भी दो चार ही थे। पीठ पर कूबड़ निकला हुआ था। चेहरा इतना स्याह था कि बच्चे देखते ही चिल्ली मार बैठें।

गुलाम ने धीरे धीरे घर का सारा कामकाज संभाल लिया। वह बरतन मांजता, बच्चों को कहानियां सुनाता, बाजार के भी काम करता। उस रईस व उसकी बीवी की वह बहुत सेवा किया करता था।

अब तो आलम यह था कि गुलाम के कारण उस रईस के घर लोग इकट्ठा होने लगे। सबकी लालसा रहती कि गुलाम उन्हें मधुर कहानियां सुनाए। लोग उससे डरना तो दूर, उसकी प्रतीक्षा किया करते थे।

गुलाम के किस्सों के चर्चे जब यूनान के बादशाह तक पहुंचे तो एक दिन बादशाह भी उस रईस की हवेली में गया और गुलाम के किस्सों को सुनकर अतिप्रसन्न होकर उसे उपहार देने लगा। तब गुलाम बोला, ‘बादशाह सलामत, मेरा सबसे बढि़या उपहार यही होगा कि आप मेरे किस्से कहानियों को किताब का रूप दे दें, ताकि मैं मरकर भी इन बच्चों से जुड़ा रहूं।’

बादशाह ने उसकी बात मानकर उसके किस्से कहानियों की किताब छपवा दी। इस तरह उस गुलाम युसूफ के किस्सेे घर घर में पढ़े जाने लगे।

मातृभक्ति- Prerak Prasang

बात उन दिनों की है जब देश गुलाम था। संत गुरूदास वंद्योपाध्याय कलकत्ता हाईकोर्ट में न्यायाधीश नियुक्त थे। वह कलकत्ता विश्वविद्यालय के कुलपति भी हुआ करते थे।

मातृभक्ति- Prerak Prasang

एक दिन वह हाईकोर्ट में किसी मुकदमे की सुनवाई कर रहे थे। तभी एक बुढि़या वहां आई जो गुरूदास की धाय थी। उसने गुरूदास को बाल्यावस्था में दूध पिलाया था। कलकत्ता में गंगा स्नान के लिए वह मुद्दतों बाद आई थी। तभी उसे ख्याल आया कि चलो, गुरूदास से ही मिल लिया जाए, बहुत समय हो गया उसे देखे हुए।

वह जैसे तैसे पूछ ताछकर हाईकोर्ट पहुंची थी। चूंकि गंगा स्नान करके आ रही थी, इसलिए वस्त्र गीले ही थे। हाईकोर्ट के द्वार पर पहुंचकर वह चपरासी से विनती करने लगी कि उसे भीतर जाने दे। लेकिन चपरासी तैयार नहीं था।

इत्तफाक से गुरूदास की नजर द्वार पर पड़ी तो वह न्यायाधीश की कुर्सी से तुरंत उठ खडे हुए। वह द्वार की ओर बढ़े तो चपरासी किनारे हट गया। गुरूदास ने उसे वृद्धा को दंडवत किया तो कोर्ट में उपस्थित सभी लोग विस्मय से देखने लगे। वृद्धा ने गुरूदास को उठाकर छाती से लगा लिया और अश्रुधारा बहाती हुई आशीर्वाद देने लगी।

तब गुरूदास ने सबको प्रसन्नतापूर्वक बताया, ‘यह मेरी मां है। बाल्यावस्था में इन्होंने मुझे अपना दूध पिलाया है।’ बाद में गुरूदास उस वृद्धा को घर ले गए और उसका पूर्ण मान-सम्मान किया।

जैसा बोल, वैसा मोल- Prerak Prasang

एक राजा अपने अनुचरों के साथ वन विचरण के लिए निकला। मार्ग में उसे तीव्र प्यास लगी। राजा ने देखा कि पास ही एक झोंपड़ी थी, जिसके बाहर पानी से भरा एक मटका रखा था। राजा ने एक अनुचर को उसमें से पानी लाने को कहा।

जैसा बोल, वैसा मोल- Prerak Prasang

राजाज्ञा पाकर अनुचर वहां गया और झोंपड़ी मेें रहने वाले अंधे व्यक्ति से बोला, ‘अरे, ओ अंधे! एक गिलास पानी दे।’

अंधा व्यक्ति बोला, ‘तुझ जैसे सिपाही को मैं पानी नहीं पिलाऊंगा।’ और वह खाली हाथ लौट आया।

राजा ने दूसरे अनुचर को भेजा तो उसने भी वैसा ही व्यवहार किया। ‘तुझ जैसे सेनानायक को मैं पानी नहीं पिलाऊंगा।’ फलतः वह भी खाली हाथ लौट आया।

जब दोनों खाली हाथ लौट आए, तब राजा स्वयं उस अंधे व्यक्ति के पास पहुंचा और विनम्रतापूर्वक प्रणाम कर बोला, ‘महानुभाव, मुझे बड़ी तेज प्यास लगी है, गला सूखा जा रहा है। आपकी बड़ी कृपा होगी, मुझे एक गिलास पानी पिला दें।’

उस अंधे ने राजा को सम्मानपूर्वक अपने निकट बैठाकर कहा, ‘आप जैसे विनयशील लोगों का ही राजा तुल्य सम्मान उचित है। आपके लिए पानी तो क्या शरीर को भी समर्पित कर सकता हूं।’

इतना कहकर उसने राजा को पानी पिलाया। जब राजा तृप्त हो गया तब उसने उस अंधे व्यक्ति से पूछा, ‘महाशय, आपने मुझसे पहले आए उन दोनों को कैसे पहचाना कि उनमें एक सिपाही व एक सेनानायक था और आपने राजा के रूप में मुझे कैसे पहचाना?’

अंधा व्यक्ति बोला, ‘बोलने के तरीके से किसी भी व्यक्ति का स्तर स्वतः ही निर्धारित हो जाता हे कि वह कुलीन है या नीच।’

मां की शिक्षा – Prerak Prasang

बात उन दिनों की है जब अमेरिका में दास प्रथा चरम पर थी। एक धनाढ्य ने बेंगर नामक दास को खरीदा। बेंगर न केवल परिश्रमी था बल्कि गुणवान भी था। वह धनी व्यक्ति बेंगर से पूर्ण रूपेण संतुष्ट था और उस पर विश्वास भी किया करता था।

मां की शिक्षा - Prerak Prasang

एक दिन वह बेंगर को लेकर दासमंडी गया, जहां लोगों का जानवरों की भांति कारोबार होता था। उस धनी ने एक और दास खरीदने की इच्छा जाहिर की तो बेंगर ने एक बूढ़े की ओर इशारा करते हुए कहा, ‘मालिक! उस बूढ़े को खरीद लीजिए।’

बेंगर के साथ उस बूढ़े को खरीदकर धनी घर चला गया। बूढ़े के साथ बेंगर बहुत खुश था। वह उसकी भलीभांति सेवा किया करता था।

एक दिन उस धनी ने बेंगर को उस बूढ़े की सेवा करते देखा तो इसका कारण पूछा। बेंगर ने बताया, ‘मालिक! बूढ़ा मेरा कुछ भी नहीं लगता बल्कि यह मेरा सबसे बड़ा शत्रु है। इसी ने मुझे बचपन में गुलाम के रूप में बेच डाला था। बाद में यह खुद भी पकड़ा गया और दास बन गया। उस दिन मैंने इस बूढ़े को दासमंडी में पहचान लिया था। मैं इसकी सेवा इसलिए करता हूं कि मेरी मां ने मुझे शिक्षा दी थी कि शत्रु यदि निर्वस्त्र हो तो उसे वस्त्र दो, भूखा हो तो रोटी हो, प्यासा हो तो पानी पिलाओ। इसलिए मैं इसकी सेवा करता हूं।’

इतना सुनकर वह धनाढ्य व्यक्ति बड़ा प्रसन्न हुआ और उसने उसी दिन से बेंगर को स्वतंत्र कर दिया।

खुदीराम बोस- Khudiram Bose Ka Prerak Prasang

Khudiram Bose Ka Prerak Prasang

कटघरे में खड़े युवक को फांसी की सजा सुनाकर न्यायाधीश कार्नडेप्ट ने युवक पर दृष्टि डाली तो आश्चर्यचकित रह गए। जिस युवक को फांसी की सजा सुनाई थी, वह खिलखिलाकर हंस रहा था।

न्यायाधीश ने सोचा कि शायद इसने सुना नहीं है, इसलिए वह फिर बोले, ‘सुना तुमने! पुलिस इंस्पेक्टर सांडर्स पर बम फैंकने के अपराध में तुम्हें फांसी की सजा दी गई है।’

वह युवक मुस्कराते हुए बोला, ‘बस, इतनी सी सजा! जनाब! हम भारतीय मौत से नहीं डरते। यह तो मेरे लिए गर्व की बात है कि मातृभूमि की सेवा करने का मुझे मौका मिला है। इसके लिए आप धन्यवाद के पात्र हैं।’khudiram bose

उसकी बात सुनकर न्यायाधीश असमंजस में पड़ गया। उसने नम्र लहजे में कहा, ‘यदि तुम चाहो तो हाईकोर्ट में अपील कर सकते हो। तुम्हें सात दिन का समय दिया जाता है।’

वह युवक तिलमिलाकर बोला, ‘मैंने जीवन में भीख मांगना नहीं सीखा है। यदि आपकी मेहरबानी है तो आप मुझे मात्र पांच मिनट का समय दें ताकि मैं अपने दोस्तों को यह बता सकूं कि बम कैसे बनाया जाता है।’

उसका इतना कहना था कि न्यायाधीश झल्लाकर अपनी कुर्सी छोड़कर चला गया। अंततः 11 अगस्त 1908 को वह युवक हंसते हंसते फांसी की फंदे पर लटक गया। वह युवक अन्य कोई नहीं महान क्रांतिकारी व देशभक्त खुदीराम बोस था।

कर्तव्यनिष्ठता- Master Suryadev ka Prerak Prasang

Master Suryadev ka Prerak Prasang

मास्टर सूर्यदेव न केवल निर्भीक बल्कि आदर्शवादी भी थे। उन दिनों उनकी नियुक्ति बंगाल के किसी स्कूल में थी। स्कूल में वार्षिक परीक्षा चल रही थी। जिस परीक्षा भवन में उन्हें नियुक्त किया गया था, उसी भवन में उस स्कूल के प्रधानाचार्य का पुत्र भी परीक्षा दे रहा था।

surya senयह संयोग ही था उन्होंने प्रधानाचार्य के पुत्र को नकल करते हुए पकड़ लिया तथा परीक्षा देने से वंचित कर दिया।

परीक्षाफल निकला तो वह लड़का अनुत्तीर्ण हो गया। दूसरे दिन जब सूर्यसेन स्कूल में पहुंचे तो प्रधानाचार्य ने उन्हें अपने कक्ष में बुलाया। वह जानकर अन्य सभी शिक्षक कानाफूसी करने लगे कि अब सूर्यसेन का पत्ता साफ हुआ समझो।

इधर जब सूर्यसेन प्रधानाचार्य के कक्ष में पहुंचे तो उन्होंने आशा के विपरीत उनका न केवल सम्मान किया बल्कि स्नेहवश बोलेष् ‘मुझे गर्व है कि मेरे इस स्कूल में आप जैसा कर्तव्यनिष्ठ व आदर्शवादी शिक्षक भी है, जिसने मेरे पुत्र को भी दंडित करने में कोताही नहीं बरती। नकल करते पकड़े जाने के बावजूद यदि आप उसे उत्तीर्ण कर देते तो मैं आपको अवष्य ही नौकरी से बर्खास्त कर देता।’

‘यदि आप मुझे अपने पुत्र को उत्तीर्ण करने के लिए विवश करते तो मैं स्वयं ही इस्तीफा दे देता जो इस समय मेरी जेब में पड़ा है।’

मास्टर सूर्यसेन का जवाब सुनकर प्रधानाचार्य बहुत खुश हुए और उनकी दृष्टि में सूर्यसेन की इज्जत दोगुनी हो गई।

गलती का अहसास करो- Hajrat Ali ka Prerak Prasang

Hajrat Ali ka Prerak Prasang

हजरत अली का एक अति विश्वसनीय नौकर था। एक दिन किसी बात पर रूष्ट होकर वह नौकरी से त्यागपत्र देकर चला गया। कुछ दिन तो हजरत अली को उस नौकर का अभाव खलता रहा। लेकिन ऊपर वाले की मर्जी जान वह पुनः सामान्य हो गए।

hazrat aliएक दिन वह नमाज अता फरमाने गए तो उनके पीछे पीछे वह नौकर भी तलवार लेकर चल पड़ा और मौका तलाश कर उन पर वार कर दिया। उसके वार से हजरत अली लहूलुहान हो गए।

कुछ लोग दौड़कर आए और उनकी तीमारदारी करने लगे। अन्य कुछ लोगों ने भागदौड़ करके उस नौकर को भी पकड़ लिया और उसे हजरत अली के सामने पेश किया।

तभी हजरत अली ने पीने के लिए पानी मांगा। लोग दौड़कर शरबत ले आए। जब उन्होंने हजरत अली को खिदमत में शरबत से भरा गिलास पेश किया तो वे बोले, ‘अरे भाई, यह शरबत मुझे नहीं इस नौकर को पिलाओ। आप लोग देख नहीं रहे कि कितना हांफ रहा है।’

एक व्यक्ति ने शरबत का गिलास उस नौकर की ओर बढ़ाया तो उसकी आंखों से आंसू निकल पड़े। हजरत अली बोले, ‘रोते क्यों हों? गलती तो इंसान से हो ही जाती है। लो, शरबत पी लो।’

वह आगे बोले, ‘जो शख्स गलती करके उसका अहसास कर लेता है और भविष्य में गलती न करने का निर्णय कर लेता है, वह जीवन में बुलंदियों को छूता है।’

पानी रे पानी- Chanakya ka Prerak Prasang

Chanakya ka Prerak prasang

चंद्रगुप्त मौर्य का महामंत्री चाणक्य प्रतिभावान तो था, लेकिन बदसूरत भी था। एक बार चंद्रगुप्त ने उससे मजाक किया, ‘महामंत्री जी कितना अच्छा होता कि आप प्रतिभावान होने के साथ साथ सुन्दर ही होते?’

प्रत्युत्तर चाणक्य के स्थान पर महारानी ने दिया। बोलीं, ‘महाराज रूप chanakyaतो मात्र मृगतृष्णा है। वस्तुतः किसी भी व्यक्ति का सम्मान उसके रूप के कारण नहीं बल्कि उसकी प्रतिभा के कारण ही किया जाता है।’

‘महारानी आप तो रूप की प्रतिमूर्ति हैं। क्या कोई ऐसा भी उदाहरण है कि गुण के आगे रूप का कोई महत्व न हो?’ चंद्रगुप्त ने पूछा।

इस बार चाणक्य बोला, ‘महाराज! आप एक ही बात करते हैं, ऐसे तो अनेक उदाहरण हैं। लीजिए आप पहले शीतल जल पीजिए।’ चाणक्य ने चंद्रगुप्त की ओर दो गिलास क्रमशः बढ़ा दिए।

फिर उसने पूछा, ‘महाराज! आपको कौन से गिलास का पानी अच्छा लगा? पहले गिलास में स्वर्ण कलश का पानी था और दूसरे गिलास में मिट्टी से निर्मित मटके का।’

चंद्रगुप्त बोला, ‘मुझे तो मिट्टी से निर्मित मटके का पानी शीतल व सुस्वादु लगा। उसे पीने से मैं तृप्त हो गया। लेकिन स्वर्ण कलश का पानी पीने योग्य भी नहीं था। लेकिन विवश ता थी कि मुझे वही पानी पीने को दिया गया। अतः न चाहते हुए भी मुझे पीना पड़ा।’

महारानी ने मुस्कराते हुए कहा, ‘महाराज! प्रधानमंत्री जी ने बुद्धि कौशल से आपके प्रश्न का उत्तर दे दिया है। स्वर्णनिर्मित कलश देखने में तो सुन्दर लगता है लेकिन उसका जल पीने योग्य नहीं होता। दूसरी ओर मिट्टी से बना मटका देखने में भले सुंदर न लगे लेकिन उसका पानी शीतल व सुस्वादु होता है। अब आप ही निर्णय करें कि सुन्दरता व प्रतिभा में से कौन बड़ा है?’

नेपालियन की सूझबूझ- Napoleon ka Prerak Prasang

Napoleon ka Prerak Prasang

फ्रांस में अतिवृष्टि के कारण एक नदी में बाढ़ आ गई। शाम का समय था। एक किशोर नदी के किनारे किनारे चलता हुआ अपने गांव की ओर जा रहा था।

एकाएक उसकी दृष्टि नदी पर बने बांध की ओर गई। उसने देखा कि बांध में मामूली छेद होने से पानी रिस रहा था।

napoleonवह सोचने लगा, यदि इसी तरह पानी बहता रहा तो कुछ समय पश्चात पूरा गांव ही जलमग्न हो जाएगा। उसने मिट्टी से उस छेद को भर दिया लेकिन पानी का बहना तब भी बंद नहीं हुआ, बल्कि छेद और बड़ा होता जा रहा था।

फिर उसने सोचा कि जब तक गांव जाकर सूचना दूंगा तक तक तो यह बांध टूट भी सकता है। यही सोचकर वह उस छेदवाले स्थान पर कमर सटाकर लेट गया और सारी रात इसी तरह लेटा रहा।

उधर घर न पहुंचने पर उसके माता-पिता को चिंता होने लगी। रात जैसे तैसे काटकर वह भोर में ही नदी किनारे की ओर चल पड़े। उस लड़के ने अपने माता पिता को निकट बुलाकर कहा कि आप लोग गांव में जाकर पानी रोकने की व्यवस्था करने के लिए लोगों से कहें। उसके माता-पिता ने गांव में जाकर पानी रोकने की व्यवस्था करवाई।

फ्रांस की सरकार ने उस बालक को उसके साहस, देशभक्ति व वीरता के लिए सम्मानित किया। उस देशभक्त बालक का नाम था नेपोलियन, जो बाद में फ्रांस का शासक बना।

चाणक्य की सीख- Acharya Chanakya ka Prerak Prasang

Acharya Chanakya ka Prerak Prasang

सम्राट चंद्रगुप्त की सुदृढ़ शासन व्यवस्था का प्रमुख आधार उसका महामंत्री चाणक्य था। शासन व्यवस्था पर उनका पूरा अंकुश था। एक दिन एक विदेशी चाणक्य से मिलने पहुंचा। शाम का वक्त था। चाणक्य बड़ी तल्लीनता से दीपक की रोषनी में कुछ लिख रहे थे। वह विदेशी उनके पास जाकर खड़ा हो गया। लेकिन चाणक्य कार्य में इतने तल्लीन थे कि उन्हें उसके आने का पता ही नहीं चला।

chanakyaजब कार्य समाप्त हुआ तो उन्होंने ऊपर की ओर देखा और उस सज्जन को देखकर अभिवादन किया और आने का कारण पूछा। तब वह बोला, ‘मैं तो आपकी प्रशंसा सुनकर आपसे मिलने चला आया।’

चाणक्य ने जलता दीपक बुझा दिया और एक अन्य दीपक जला दिया। उस सज्जन ने इसका कारण पूछा तो चाणक्य बोले, ‘तब मैं शासन संबंधी कार्य कर रहा था। वह दीपक राजकोश के धन से प्रज्ज्वलित था। लेकिन अब मैं एक मित्र से मिल रहा हूं और यह मेरा निजी मामला है। अतः मैंने अपने तेल वाले दीपक को जला लिया। यदि मैं ही सरकारी धन का अपव्यय करने लग जाऊंगा तो अन्य लोग भी ऐसा ही करेंगे और राज्य में अव्यवस्था फैलते देर नहीं लगेगी।’

चाणक्य की सारपूर्ण बात सुनकर वह विदेशी आश्चर्यचकित रह गया