बल्ली सिंह चीमा की ग़ज़ल में नैनीताल

बल्ली सिंह चीमा बड़े पर्वत पे पानी से भरा इक थाल रक्खा है।
बड़ा -सा फ़रिज बना कर नाम नैनीताल रक्खा है।

बड़े सुंदर हैं ये बाजार नैनीताल के दोनों,
इधर तल्ली उधर का नाम मल्लीताल रक्खा है।

गुलामों की तरह निचली सड़क भी साथ है चलती,
मगर ऊँची सड़क का नाम उसने “माल ” रक्खा है।

अमीरी-शौक है ये मयकशी और वो भी किश्ती में,
मेरे जैसे फकीरों ने भी इसको पाल रक्खा है।

उधर वो सब नशीली धूप का आनन्द लेते हैं,
इधर ठंडी सड़क की ठंड ने कर बेहाल रक्खा है।

डिनर या लंच कह कर जाने क्या-क्या खाते रहते हो,
मगर “बल्ली” ने इनका नाम रोटी-दाल रक्खा है।

– बल्ली सिंह चीमा

जन्म: 02 सितंबर 1952
जन्म स्थान चीमाखुर्द गाँव,चभाल तहसील, अमृतसर ज़िला, पंजाब, भारत
कुछ प्रमुख कृतियाँ : तय करो किस ओर हो, (कविता-संग्रह) ख़ामोशी के ख़िलाफ़, (कविता-संग्रह) ज़मीन से उठती आवाज़, (कविता-संग्रह),
विविध कविता कोश सम्मान 2011 सहित अनेक प्रतिष्ठित सम्मान और पुरस्कार से सम्मानित

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हमेशा छुप नहीं सकती जिसे औक़ात कहते हैं – इमरान ख़ान की एक ग़ज़ल

मुझे जीवन की राहों में हुई है मात कहते हैं,
मैं कल तक तो उजाला था, मुझे अब रात कहते हैं।हमेशा छुप नहीं सकती जिसे औक़ात कहते हैं - इमरान ख़ान की एक ग़ज़ल

वो कल तक जो मुहाफ़िज़ थे, दुआ-गो थे मेरी खातिर,

मेरा दिल जिनसे ज़्यादा दुख सके वो बात कहते हैं।

मेरे अंदाज़ को शाही बताते थे, वही देखो,
ज़रा सा वक़्त क्या बदला मुझे बदज़ात कहते हैं।

न हो मायूस ऐसे हम बदल जायेंगे जल्दी ही,
मेरे टूटे हुए दिल से मेरे हालात कहते हैं।

ज़बाँ के साथ ही अक्सर ये बाहर आ ही जाती है,
हमेशा छुप नहीं सकती जिसे औक़ात कहते हैं।

– इमरान खान

मेरे अल्लाह खतरे में तेरे भगवान खतरे में

ग़ज़ल

mere allah khatare mein tere bhagvan khatre mein poem by mahesh katare sugamहमारी हर समय रहने लगी है जान खतरे में
कभी दीवाली खतरे में कभी रमज़ान खतरे में

किसी के ऐतराज़ों में उलझकर रह गयी श्रद्धा
कहीं पर हव्य खतरे में कहीं लोबान खतरे में

ज़रा सी बात पर पड़ते दिखाई देने लगते हैं
मेरे अल्लाह खतरे में तेरे भगवान खतरे में

नहीं महफूज़ दिखती है यहां इंसान की हस्ती
यहां है शान खतरे में वहां सम्मान खतरे में

घिरे रहते हमेशा ही यहां पर खौफ के बादल
सियासत की वज़ह से आ गया इंसान खतरे में

सुगम अब फूलने ,फलने के पहले सूख जाते हैं
दुआएं सख्त खतरे में सभी वरदान खतरे में

(महेश कटारे सुगम )

महेश कटारे सुगम Mahesh Katare sugam

महेश कटारे सुगम हिंदी और बुंदेली कविता का एक मशहूर नाम हैं।  उनके फेसबुक पेज के लिए यहाँ से जाएँ  https://www.facebook.com/maheshkatare.sugam

मेरी दो ग़ज़लें

नदिया मुहब्बतों की उमड़ती है मेरी माँ

इमरान ख़ान

नदिया मुहब्बतों की उमड़ती है मेरी माँ,
लेकर मुझे जहान में आई है मेरी माँ।

दुनिया के वास्ते भले शोला हूँ आग हूँ,
माँ के लिए पर आज भी नन्हा चराग हूँ।

मुझको हथेलियों में छुपाती है मेरी माँ,
लेकर मुझे जहान में आई है मेरी माँ।

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बस अब के बाद न होगा कोई कलाम मेरा

बस अब के बाद न होगा कोई कलाम मेरा,
ऐ मेरे दोस्तों यारों तुम्हें सलाम मेरा।

वो नूर मेरी निगाहों का खो गया कब का,
नहीं रहा वो मेरा गैर हो गया कब का।

यकीन जिस पे मुझे खुद से भी ज़ियादा था,
उसी के साथ जियूं और मरूं इरादा था।

मगर इरादा बिखर ही गया तमाम मेरा,
बस अब के बाद न होगा कोई कलाम मेरा।

~ इमरान ख़ान