बारिश – देवेंद्र आर्य की भीगी हुई कविता

बारिश

ढंक दो
पानी भींग रहा है बारिश में
ठंड न लग जाए ।

देवेंद्र आर्य की एक भीगी हुई कविता बरस रहे हैं पेड़ हज़ारों पत्तों से
भींग रही है हवा झमाझम खोले केश
छींक न आए ।

निर्वसन नदी तट से दुबकी दुबकी लगती
बादल अपनी ओट में लेके चूम रहा है बांह कसे ।

चोट सह रही हैं पंखुरियां
पड़ पड़ पड़ पड़ बूंदों की
अमजद खां के स्वर महीन संतूरों पर
जाकिर के तबलों की थापें
बारिश है ले रही अलापें बीच बीच में भीमसेन सी

गंध बेचारी भींग न जाए इस बारिश में ।

बहुत दिनों के बाद खेलतीं बैट-बाल
गलियां सड़कों पर उतर आई हैं
तड़ तड़ तड़ तड़ बज उठती बूंदों की ताली

बिजली चमकी
या चमका है सचिन का बल्ला
या गिर गया सरक के पल्ला स्वर्ण कलश से
बोल रही है देह निबोली भीगी भीगी
सिहर उठे मौसम के सपने

ढंक दो ,
यह काला चमकीलापन शब्दों का
खुरच न जाए इस बारिश में ।

* देवेंद्र आर्य

 

योगी राज में कितना बदला उत्तर प्रदेश ? – तारकेश कुमार ओझा

यह विचित्र संयोग रहा कि सात साल बाद विगत मार्च में जब मेरा देश के सबसे बड़े सूबे उत्तर प्रदेश में जाना हुआ तब राज्य में विधानसभा के चुनाव अपने अंतिम चरण में थे, और इस बार जुलाई के प्रथम दिनों में ही फिर प्रदेश जाने का संयोग बना तब देश के दूसरे प्रदेशों की तरह ही यूपी  में भी राष्ट्रपति चुनाव की खासी गहमागहमी चल रही थी। निश्चय ही किसी भी सरकार के काम – काज का आकलन दिनों के आधार पर नहीं किया जा सकता। लेकिन मन में असीम जिज्ञासा यह जानने की रही कि देखें तेज तर्रार मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ के राज में उत्तर प्रदेश कितना बदला है।

yogi uttar pradesh cmनितांत निजी प्रयोजन से पश्चिम बंगाल से उत्तर प्रदेश के प्रतापगढ़ के लिए यात्रा शुरू करते ही रेल रोको आंदोलन के चलते ट्रेन के पूरे छह घंटे विलंब से चलने की पीड़ा दूसरे सैकड़ों यात्रियों के साथ मुझे भी झेलनी पड़ी। प्रतापगढ़ स्टेशन से बाहर निकलते ही मेरी जिज्ञासा जोर मारने लगी। सड़कों की स्थिति परिवर्तन का अहसास करा रही थी। अपने गांव जाते समय कुछ वैकल्पिक मार्गों का पता चला जिससे ग्रामांचलों की दूरियां काफी सीमित हो जाने से लोग राहत की सांस ले रहे थे। बातचीत में कुछ पुलों का जिक्र भी आया जिनकी वजह से ग्रामांचलों में आवागमन सुविधाजनक हो गया था। सबसे बड़ा मसला विधि – व्यवस्था का था। लेकिन इस सवाल पर हर कोई मुस्कान के साथ चुप्पी साध लेता। इसके स्थान पर कुछ कद्दावर भाजपा नेताओं की आपसी कलह की चर्चा शुरू हो जाती। जो मेरे जिले से राज्य सरकार में मंत्री थे। नेताओं के आपसी टकराव की चर्चा लोग चटखारे लेकर कर रहे थे। बिजली के सवाल पर हर किसी से यही सुनने को मिला कि ग्रामांचलों में भी स्थिति कुछ सुधरी है। अनियमित ही सही लेकिन निर्धारित 12 घंटे के बजाय अब लोगों को अधिक बिजली मिल रही है।

दूसरे दिन बस्ती जाने के क्रम में मुझे इस बात से काफी खुशी हुई कि मेरे गंतव्य तक जाने वाला राजमार्ग अमेठी, सुल्तानपुर फैजाबाद व अयोध्या जैसे शहरों से होकर गुजरेगा । राजनैतिक – ऐतिहासिक घटनाओं के चलते मैं जिनकी चर्चा अरसे से सुनता आ रहा हूं। अपने गांव बेलखरनाथ से गंतव्य के लिए निकलते ही गाड़ी दीवानगंज बाजार पहुंची तो बाजार में बेहिसाब जल- जमाव व गंदगी के बीच सड़क के बिखरे अस्थि – पंजर ने अनायास ही मेरे मुंह से सवाल उछाल दिया कि परिवर्तन के बावजूद यह क्यों…। जवाब मिला … यही यहां का चलन है। मेरे यह पूछने पर कि यहां कोई नगरपालिका या पंचायत प्रतिनिधि तो होंगे । क्या उनके संज्ञान में यह सब नहीं है। फीकी मुस्कान के साथ जवाब मिला जब जिला मुख्यालयों में ऐसी ही हालत है तो गांव – जवार की कौन पूछे।

गाड़ी आगे बढ़ी औऱ अमेठी के रास्ते गोरखपुर जाने वाले राजमार्ग की ओर बढ़ने लगी। बेखटके चल रही गाड़ी ने अहसास करा दिया कि उत्तर प्रदेश में भी प्रमुख सड़कों की हालत में काफी सुधार आ गया है। हालांकि इस आधार पर कतई इस निष्कर्ष पर नहीं पहुंचा जा सकता था कि गांव – कस्बों की सड़कें सचमुच गड्ढा मुक्त हो पाई है या नहीं। अनेक गांव – कस्बों व जिला मुख्यालयों से होते हुए हम अपने गंतव्य की ओर बढ़ रहे थे। हालांकि मेरे अंदर सबसे ज्यादा कौतूहल परिवर्तन की सरकार में पुलिस तत्परता का अनुभव करने की थी। क्योंकि कानून – व्यवस्था में सुधार के  हर सवाल पर स्थानीय निवासी फीकी मुस्कान के साथ चुप्पी साध लेते थे।

अयोध्या से आगे बढ़ते ही बस्ती जिले के प्रवेश द्वार पर एक हादसे के चलते राजमार्ग पर बेहिसाब जाम लग गया था। ट्रक ने सेना के एंबुलेंस को ठोकर मार दी थी। हादसे में किसी की मौत तो नहीं हुई थी। लेकिन हादसे के चलते वाहनों का आगे बढ़ पाना मुश्किल हो रहा था। बढ़ते उमस के बीच इस परिस्थिति ने मेरी बेचैनी बढ़ानी शुरू कर दी। तभी लगा शायद इसी बहाने पुलिसिया तत्परता से दो – चार होने का मौका मिल जाए। अपेक्षा के अनुरूप ही थोड़ी देर में सायरन बजाते पुलिस के दो वाहन मौके की ओर जाते दिखाई दिए। कुछ देर में जाम खुल जाने से मैने राहत की सांस ली। वापसी यात्रा में निकट संबंधी के यहां भुपियामऊ गया, तो वहां निर्माणाधीन विशाल पुल ने मुझे फिर  कभी गांव से नजर आने वाले इस इलाके में  परिवर्तन का आभास कराया। भले ही इसकी नींव बहुत पहले रखी गई हो।

वापसी की ट्रेन हमें इलाहाबाद से पकड़नी थी। देर शाम तकरीबन साढ़े आठ बजे हमें प्रतापगढ़ से मनवर संगम एक्सप्रेस मिली। रवाना होते ही ट्रेन की बढ़िया स्पीड ने इस रुट पर कच्छप गति से चलने वाली ट्रेनों की मेरी पुरानी अवधारणा को गलत साबित कर दिया। लेकिन जल्दी ही ट्रेन पुरानी स्थिति में लौट आई और जगह – जगह रुकने लगी। फाफामऊ स्टेशन पर यह ट्रेन देर तक रुकी रही। जिसके चलते असंख्य यात्रियों को रेलवे लाइन पार करने का जोखिम उठाते हुए पहले जाने वाली दूसरी ट्रेनों में चढ़ना पड़ा। इलाहाबाद से हमें आनंदविहार – सांतरागाछी साप्ताहिक सुपर फास्ट ट्रेन पकड़ना था। लेकिन यह ट्रेन धीरे – धीरे पांच घंटे विलंबित हो गई। जिससे यात्रा की शुरूआत की तरह ही मेरी वापसी यात्रा का सगुन भी बिगड़ चुका था। ट्रेन के आने के बाबत रेल महकमे की भारी लापरवाही झेलता हुआ मैं परिवार सहित तड़के इस ट्रेन में सवार होकर अपने शहर को लौट सका।

  • तारकेश कुमार ओझा

उप-संपादक, दैनिक जागरण, खड़गपुर, पश्चिम बंगाल।

कार्टून क्या लोग पुतले बना के जलाएंगे “मुहम्मद” का अगर आप लोगों को समझ न आई तो

पढ़ाई के दिनों में दोस्तों के साथ बाहर घूमने गया था वहीं क्लियोपेट्रा की एक मूर्ति मुझे पसंद आई तो तो उसे ख़रीद कर घर ले आया.. उस मूर्ति को मैंने बाहरी कमरे में सजाया.. कुछ दिनों बाद मस्जिद के इमाम की हमारे घर दावत हुई.. इमाम साहब आये और खाना खाते वक़्त उनका सारा ध्यान उस मूर्ति पर था..

मुझे वो जानते थे कि मैं कितने खुले विचारों वाला हूँ.. मूर्ति को देखकर वो कहना तो बहुत कुछ चाहते थे मगर ज़्यादा कुछ कह न पाए.. अंत मे सिर्फ़ मुझ से इतना कहा कि “घर मे मूर्ति नहीं रखनी चाहिए ताबिश साहब.. ये बहुत बड़ा गुनाह है”

मैंने उनकी बात को सुन कर अनसुना कर दिया.. मगर इमाम साहब ने बाहर जा कर अपना काम कर दिया..

मोहल्ले के कुछ “कट्टर” मज़हबी लड़कों से मेरे घर मे उस मूर्ति का ज़िक्र कर दिया.. एक लड़का जो मेरा दोस्त था किसी बहाने से मेरे घर आया.. बाहरी कमरे में बैठा.. और फिर क्लियोपेट्रा की मूर्ति देखकर मुस्कुराया..

मुझे दीन समझाने लगा..गर्मा गरम बहस हुई.. अंत मे मुझे धमकी दी उसने कि “बाहर मिलो तुंम्हारी गर्दन रेत दूंगा मैं”..

मगर बात चूंकि मोहल्ले की थी इसलिए मैं भी उस से नहीं डरा.. मैं रोज़ उसके सामने से निकलता और कहता “आओ रेतो मेरी गर्दन”.. धीरे धीरे मामला रफ़ा दफ़ा हो गया.

लोग अब कहते तो कुछ न थे मगर हमारा मूर्ति रखना किसी को फूटी आंख नहीं भा रहा था

कुछ दिनों बाद खानदान में बातें होने लगी.

कुछ औरतें जो “मसाला मार” के इधर की बात उधर करती थीं, उन्होंने ख़ानदान में ये कहा कि “ताबिश के घर वाले तो मूर्ति पूजा करने लगे हैं और ये लोग छिप कर मूर्ति को दूध पिलाते हैं”.. ये मामला उस समय उड़ाया गया जब “गणेश जी के दूध” पीने वाला प्रकरण हुवा था.

खानदान के लोग बहाने बहाने से हमारे बाहरी कमरे में जाने लगे और बाहर जाकर लोगों को कन्फर्म करने लगे कि हां “मूर्ति रखी है, इसलिए पूजा होती है”

ये इतना बवाल खानदान भर में और मुहल्ले भर में सिर्फ़ इसलिए हो रहा था क्यूंकि मेरे बाहरी कमरे में क्लियोपेट्रा की बड़ी सी मूर्ति सजी थी.

मामला बढ़ता ही जा रहा था और अंत मे मेरी दादी की बहन आईं और उन्होंने ख़ूब उल्टा सीधा कहा.. कहा कि तुम लोग एक मूर्ति के लिए सब से पंगा ले रहे हो. जाने लोग क्या क्या बात बना रहे हैं..

और अंत मे तंग आ कर पापा ने उस मूर्ति को तोड़ दिया.. फिर सारे मोमिन ख़ुश हो गए और मुहल्ले और खानदान में फिर से हम लोग “मुसलमान” माने जाने लगे

बहुत लोगों को शायद ये कुछ बड़ी घटना न लगे. इस बात का गवाह मेरा पूरा घर है. एक प्लास्टर ओफ़ पेरिस की बनी क्लियोपेट्रा की मूर्ति और मोमिनो का इस्लाम.

मेरे घर मे एक मूर्ति से सबका ईमान ख़तरे में आ गया था और आख़िर मिल जुल के सबने उसे तुड़वा दिया

सोचिये.. बंगाल में जो दंगा हुवा है पैग़म्बर के अपमान को लेकर वो तो कुछ भी नहीं है.

जब एक घर में रखी सिर्फ एक मूर्ति को लोगों ने अपना ‘इस्लाम” बना लिया और पीछे पड़ गए थे हम लोगों के.. ये आलिम, मौलाना जो भी चाहे करवा लें भीड़ से..

इसीलिए ये लोग गुट और अपना अपना मोहल्ला बना कर रहते हैं और उस गुट और मोहल्ले पर पूरा कब्ज़ा “धार्मिक लीडर” का होता है. खासकर मुस्लिम मोहल्ले.. और उसे भेदना सब के बस की बात नहीं है.. इनका “साम्राज्य” इनके मोहल्लों और भीड़ में बहुत मजबूती से फैला होता है..

इसलिए इस पर क्या विरोध करूँ मैं? क्या कहूँ? ये तो रोज़ की बात है.. इसलिए मैं अब मूल सुधारने की अपील करता हूँ सबसे

ये बिमारी इतनी ज़्यादा गहरी है कि बहुत कम लोगों को इसका अंदाज़ा है.

ये क्यूँ मूर्ति देखकर भड़क जाते हैं?

ये “पैगम्बर” के कार्टून पर बवाल करना उसी मानसिकता का हिस्सा है.. कार्टून छोडिये, एक इंग्लिश मूवी में एक एक्टर ने “मुहम्मद” का अभिनय कर दिया था तो उसका गला काटने का फतवा जाने कितने आलिमों ने जारी कर दिया था.

वहां कोई कार्टून नहीं था.. उसे भी ये मारने पर उतर आये..

कोई भी मूवी ऐसी नहीं बन सकती है जिसमे “मुहम्मद” को दिखाया जा सके.. पूरी दुनिया में किसी की हिम्मत नहीं है जो ऐसा कर सके.

सोचिये.. और ऐसा क्यूँ है इसको बहुत कम लोग जानते हैं.. और जो जानते भी हैं वो कभी आगे नहीं आते हैं इसे सुधारने के लिए

इरान में शिया मुहम्मद साहब, अली इत्यादि की तस्वीरें रखते हैं.. यहाँ भी रखते हैं.. इमामबाड़ों में भी ये तस्वीरें देखने को मिल जाती हैं.. और ये भी एक बड़ी वजह है जिसलिए “सऊदी वाले” मुसलमान शियों को मुसलमान नहीं मानते हैं और उनके मारे जाने को “सही” ठहराते हैं.. शियों से दुश्मनी की एक सबसे बड़ी वजह ये भी है

ये बिमारी बहुत बहुत गहरी है.. और ये बिमारी बढ़ी ही इसलिए क्यूंकि सारी दुनिया ने इसे “स्वीकार” कर लिया.

ये “आक्रामक” बने रहे और लोग इसे स्वीकार करते रहे.. इन्होने कहा कि हमारे देश में आओ तो सर से चादर लपेट के आओ और लोगों ने मान लिया.. इन्होने कहा कि अपने प्रोडक्ट बनाओ तो उसमे “हलाल” लिखो.. कंपनी ने पैसे के लालच में लिखना शुरू कर दिया.

जबकि कंपनियों न ये नहीं सोचा कि एक प्रोडक्ट को “हलाल” बना देने पर दूसरा अपने प्रोडक्ट आप “हराम” साबित हो जाता है.. ये अंदर अंदर खुश होते रहे ये देख कर की तुम तो “हराम” खाते हो.. और इसे “नफ़रत” से देखते रहे.. देश और बड़ी बड़ी कंपनियां पैसो के लिए, सेक्युलर बनने के लिए, फ़ालतू का भाईचारा दिखाने के लिए इनकी बातें मानती गयीं.. और इनकी डिमांड बढती ही गयी.. पचास से अधिक देश इन्होने “इस्लामिक” बना लिए और हम इन्हें ख़ुशी ख़ुशी सब करते देते गए.. और एक छोटा सा “इस्राईल” भी इनसे लड़ता है तो उसे हम क्रूर कहते रहे

अगर आप मुसलमान हैं और आपको मेरी बात बुरी लग रही है जो जान लीजिये कि आप पूरी तरह से अरबी “दादागिरी” की गिरफ़्त में हैं.. ये सब धर्म नहीं है.. ये राजनीति है और शुद्ध राजनीति.. अरबों का “इस्लाम”, धर्म नहीं है.. मस्जिदों में “इस्राईल” को बद्दुवा देना “धर्म” नहीं है.. ग्यारह साल के बच्चे को “एक कार्टून” के लिए दोष देना और उस वजह से पचासों लोगों की दुकाने जला देना “धर्म” नहीं है.. ये “राजनैतिक दादागिरी” है.. और आपके धर्म का ढांचा कुछ नहीं अब सिर्फ “राजनीति” है.. बस गड़बड़ ये हुवा कि आपकी इस “दादागिरी” को लोगों ने अब तक सहा है.. तो आपको ये अपने धर्म का हिस्सा लगने लगा है

इसे मज़हब कहते हैं आप? शर्म नहीं आती है आपको ख़ुद को मुसलमान कहते हुवे? बाग्लादेश में आपने कितने “ब्लोगेर” बच्चों को मार दिया, पाकिस्तान में “ब्लासफेमी” के नाम पर कितनो को मार दिया.. और यहाँ चूँकि आपका बस नहीं चल रहा है तो आप दुकाने जला के काम चला ले रहे हैं

ये “धर्म” है कि सारी दुनिया आपसे डरे? ये धर्म है कि वहां लोग चैन से जी न पायें जहाँ आप बहुसंख्यक हो जाएँ? इस ख़ूंखार मानसिकता को “मज़हब” कहते हुवे आपकी ज़बान नहीं जलती है? दादागिरी और मज़हब में फर्क समझिये.. जल्दी समझिये क्यूंकि दुनिया का भरोसा और सब्र अब टूट रहा है.. कार्टून क्या लोग पुतले बना के जलाएंगे “मुहम्मद” का अगर आप लोगों को समझ न आई तो


यह पोस्ट ताबिश सिद्दीकी की वाल से ली गयी है

इतिहास क्या है ? गड़े मुर्दे उखाड़ना ! – राजेन्द्र रंजन चतुर्वेदी

इतिहास क्या है ? गड़े मुर्दे उखाड़ना ।
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मैं भी इंटरमीडियेट में इतिहास का विद्यार्थी था ।

जब मैंने इतिहास विषय लिया ,

तब मेरे दूसरे-दूसरे विषयों का विकल्प चुनने वाले सहपाठी

मुझसे कहते थे कि >> इतिहास क्या है ? गड़े मुर्दे उखाड़ना ।

आज सोचता हूं कि वे कितना सच कहते थे !

मैं देख रहा हूं कि विद्वान लोग इतिहास के सत्य को

लोक की आस्था से बड़ा सत्य समझ रहे हैं !

लोकजीवन के क्रमविकास को जानना अत्यन्त आवश्यक है
और इसके लिये हमें इतिहास का महत्त्व जानना होगा किन्तु

इतिहास का सच तो किताबों में है ,
गड़े मुर्दे उखाड़ना जैसा ,

उसमें भी इतने मत-मतान्तर हैं कि पूरा मायाजाल है ,
जिसमें से कोई निर्विवाद सच लेकर निकल पाना लगभग असंभव सा ही है ।

और लोक-आस्था का सत्य
लोकजीवन में जीवित है!

सिक्यूलर तो मैं भी हूं क्योंकि
लोकवार्ता सिक्यूलर है ।

किन्तु ऐसे सिक्यूलर का क्या करूं
जो सामान्यजन,समष्टिजन ,
सर्वजन और जीवन की अविच्छिन्न-परंपरा की अनदेखी करता हो ?

राजेन्द्र रंजन चतुर्वेदी

FBVARTA – हिन्दीवार्ता के इस पन्ने पर हम फेसबुक की दुनिया में लिखे जा रहे ऐसे उत्तम लेखों और रचनाओं से आपको रूबरू करवा रहे हैं जो आम पाठकों तक कई बार नहीं पहुँच पाते बावजूद इसके कि इन लेखों और रचनाओं के लेखकों के राजनीतिक, सामाजिक और साहित्यिक सरोकार बहुत उम्दा स्तर के हैं.

गांधी इस देश में सबसे सॉफ्ट टारगेट हैं – देवेन्द्र आर्य

गांधी इस देश में सबसे मुलायम लक्ष्य हैं (सॉफ्ट टारगेट)। इतिहास की बात जाने दें तो अभी हाल में गांधी के तीन नए आलोचक उभरे हैं – एक पूर्वन्यायाधीश, एक भगवा साध्वी और एक लेखिका। काटजू साहब ने फिलहाल अपनी कोई वैचारिकी घोषित नहीं की है। परन्तु साध्वी और अरुंधती राय की वैचारिक प्रतिबद्धता न केवल स्पष्ट है बल्कि परस्पर विरोधी भी। गांधी इसके पहले एक साथ साम्प्रदायिक शक्तियों और वामपन्थियों के निशाने पर रहे हैं।अम्बेडकर, सुभाष, भगत सिंह, जिन्ना के भी निशाने पर रहे हैं। देश के बाहर भी वे उपनिवेशवादी, साम्राज्यवादी शक्तियों-सत्ताओं के निशाने पर रहे हैं। आश्चर्य है कि गोली मार देने और बार-बार तर्पण करने के बाद भी वे जनमानस में बचे हुए हैं। आखिर कैसे? आखिर क्यों?

ताजा सन्दर्भ बुकर सम्मान प्राप्त अंग्रेजी की लेखिका अरुंधती राय द्वारा गोरखपुर फिल्म फेस्टिवल के उद्घाटन पर दिया गया बयान है कि गांधी देश के पहले कारपोरेट एन.जी.ओ. थे। यानी गांधी पूंजीपतियों के प्रतिनिधि थे।

सात्र के लिए नोबल पुरस्कार आलू का बोरा रहा होगा, अरुंधती के लिए नहीं है। पचास हजार पाउण्ड के बुकर पुरस्कार से प्रतिष्ठित अरुंधती जी इतना तो स्वीकार करेंगी ही कि बुकर पुरस्कार किसी धर्मनिरपेक्ष,जनवादी, प्रगतिशील व्यक्ति या संस्था द्वारा दिया जाने वाला पुरस्कार नहीं है जिसका उद्देश्य शोषित-पीड़ित जनता के आर्थिक-सामाजिक संघर्ष में शिरकत करना हो। समझ पाना कठिन है कि कारपोरेट एजेण्ट, पूंजीपतियों के दलाल,साम्राज्यवादी ताकतों के हाथ का खिलौना, गांधी को इनके सबसे बड़े पुरस्कार ‘नोबल’ के योग्य आज तक क्यों नहीं समझा गया, मलाला से लगायत ओबामा तक नोबल के योग्य हैं, गांधी नहीं। गांधी इन्हीं शोषक शक्तियों के अपुरस्कृत एजेण्ट हैं, बिना सम्मान, पुरस्कार और अनुदान के।

गांधी दिखते क्या हैं, और भीतर से क्या हैं, यह गुत्थी सुलझती ही नही है। वे बार-बार विवादास्पद हो जाते हैं। उनकी सबसे बड़ी देन, व्यक्तिगत जीवन की पारदर्शिता और अहिंसा को हथियार के रूप में इस्तेमाल करने की तकनीकी विकसित करने की रही है। अपनी आत्मकथा ‘सत्य के प्रयोग’ में उन्होंने मरणासन्न पिता को नज़र अन्दाज़ कर कामांध गांधी का पत्नी के कमरे में होने का वर्णन किया है। कितने सेलीब्रिटीजों का जीवन इतना पारदर्शी है? कम से कम हिन्दुस्तान में।

जैसे धर्म का अफीम निरीह व्यक्ति की आत्मा का संबल है वैसे ही अहिंसा आम आदमी का संबल है। सुरक्षा-शस्त्र है।
पीड़ित-प्रताड़ित होकर भी जीवन से विमुख न होने देने में ये दोनों आमजन को सहारा देते हैं। केन्द्रित होती जा रही आर्थिक शक्तियों के विकेन्द्रीकरण की थीसिस गांधी ने ‘हिन्द स्वराज’ में दी है। जिन 20 प्रतिशत कारपोरेट
लोगों के हाथों में 80 प्रतिशत समान्य जन की आर्थिक आजादी गिरवी है, उनसे मुक्त होने की राह ग्राम स्वराज के रूप में गांधी ने दिखाई थी जिसे ‘जंगल में वापसी’ प्रचारित किया गया। कारपोरेट के विरुद्ध कुटीर उद्योग का हथियार खड़ा करके भी गांधी कारपोरेट के एजेण्ट ही माने जा रहे हैं।

अरुंधती द्वारा गांधी के सन्दर्भ में ‘कारपोरेट’और ‘बनिया, इन दो शब्दों का पर्यायवाची के रूप में एक साथ प्रयोग करने का निहितार्थ क्या है, खासकर तब जब गांधी जाति से बनिया थे। अंग्रेजी का नहीं मालूम, मगर हिन्दी पट्टी में बनिया के लिए एक लोकगीत है–‘हमके सज्जो चीज बनियवा हंसि हंसि बेसी तउले ला।’ लोक में बनिया परचूनिए के अर्थ में प्रचारित है, उद्योगपति के रूप में नहीं। कारपोरेट को बनिया में रिड्यूस करना ताकि बनिया जाति चमकदार रूप से घृणित साबित हो सके, कहाँ की समझदारी है। समकालीन आर्थिक-सामाजिक खतरों के मूल्यांकन के क्रम में कारपोरेट और जाति (बनिया,अर्थ विस्तार के साथ सवर्ण) के गठबन्धन की चर्चा लेखिका ने की है।

‘जाति’का प्रत्यय दो तीन दशक पहले तक वामपन्थ के लिए, वर्ग संघर्ष के लिए एक भटकाव का फैक्टर था। गांधी की निगाह में अम्बेडकर स्वतन्त्रता संग्राम को तोड़ने के लिए जितने दोषी थे, उतने ही दोषी वामपन्थियों के लिए भी, वर्ग-संघर्ष को नुकसान पहुँचाने की समझ के कारण थे। परन्तु यह पहले की बात है। वैसे ही जैसे ज्योति बसु को प्रधानमन्त्री बनने की हरी झण्डी न दिखाने का निर्णय पहले की बात है। अभी की बात यह है कि वामपन्थ के लिए कारपोरेट और जाति का गठजोड़ महत्त्वपूर्ण हो गया है।

मनुस्मृति की स्थापनाओं के समर्थक परन्तु अंग्रेजों और मैकाले की शिक्षा नीति के विरोधी गांधी, वामपन्थ के लिए कारपोरेट एजेण्ट हैं। मनुस्मृति के विरोधी परन्तु अंग्रेजों के आगमन और मैकाले की शिक्षा नीति को वरदान मानने वाले दलित चिन्तकों को वामपन्थी देशप्रेमी-हमसफर मानते हैं। वामपन्थ की एक स्वीकारोक्ति यह भी है कि गांधी की स्वतन्त्रता संग्राम में जनसामान्य को भागीदार बनाने में महती भूमिका रही है। यानी उपनिवेशवाद, साम्राज्यवाद के विरुद्ध उन्होंने स्वयं संघर्ष किया और जनता को भी गोलबन्द किया। अब वही गांधी इनके एजेण्ट भी हैं, यह कैसे? पूछा जा सकता है कि क्या यह सम्भव नहीं कि दुनिया में लगातार बढ़ रही हिंसा, असहिष्णुता, पर्यावरणीय चेतावनियों और औद्योगिक केन्द्रीकरण के विरुद्ध अहिंसा, प्रेम, प्रकृति संवर्धन तथा विनिर्माण विकेन्द्रण की गांधी की थीसिस को वैचारिक रूप से भोथरा और अविश्वसनीय बनाने के षड्यन्त्र में कहीं काटजू, साध्वी और अरुंधती जैसे लोग जाने या अनजाने स्वयं एजेण्ट के रूप में तो काम नहीं कर रहे हैं?

क्या क्या न हुआ देश में गांधी तेरे रहते
क्या होता अगर देश में गांधी नहीं रहते।

सार्वकालिक और महादेशीय मेधाओं पर हड़बड़ी में दो टूक बयान देना अधैर्य का ही सूचक है। गांधी हों या मार्क्स या अम्बेडकर इन्हें बार-बार पढ़के समझने, व्याख्यायित करने तथा इनकी शिक्षाओं से अपना मार्ग प्रशस्त करने की ज़रूरत है। आज जब मुख्य ख़तरा विकास के नाम पर साम्प्रदायिक शक्तियों की पुर्नस्थापना और पूंजी संकेन्द्रण के गठजोड़ का है, साम्प्रदायिकता के विरुद्ध अपनी जान गंवाने वाले और देशी सामर्थ्य के आधार पर लम्बवत की जगह क्षैतिज विकास के प्रवक्ता गांधी को विवादास्पद बनाना, संघर्ष की सम्भावनाओं को दिग्भ्रमित करना है। जनता की दुश्मन ताकतों का हाथ मजबूत करना है। एक अच्छा निर्णय काफी दिनों बाद वामपन्थियों ने दिल्ली चुनाव में ‘आप’ का समर्थन करके लिया था। इस एकजुटता की प्रासंगिकता अभी खत्म नहीं हुई है। अन्यथा तो भगत सिंह पर भी भगवावादियों ने कब्जा जमाना शुरू ही कर दिया है। तब ऐसे में आपके आईकॉन क्या रह जायेंगे?

देवेन्द्र आर्य

FBVARTA – हिन्दीवार्ता के इस पन्ने पर हम फेसबुक की दुनिया में लिखे जा रहे ऐसे उत्तम लेखों और रचनाओं से आपको रूबरू करवा रहे हैं जो आम पाठकों तक कई बार नहीं पहुँच पाते बावजूद इसके कि इन लेखों और रचनाओं के लेखकों के राजनीतिक, सामाजिक और साहित्यिक सरोकार बहुत उम्दा स्तर के हैं.

क्या वजह है कि आज तक आतंकवाद ख़त्म न हो सका? – ताबिश सिद्दीक़ी

मुसलमान भाईयों.. क्या आपने ग़ौर किया कि “गऊ हत्या” के मामले में भीड़ का कितना भी साथ देने वाले लोग सामने आ जाएं मगर उनमें से भी बहुत कम लोग ऐसे मिलेंगे जो ये कहते मिलें आपको कि “ये जो मार रहे हैं भीड़ बनकर ये हिन्दू नहीं हैं”.. कितनी तेज़ी से इस समाज ने स्वीकारा है कि ये “उन्ही” के लोग हैं जो “धार्मिक उन्माद और नफरत से ग्रस्त हैं”.. बहुत हैं जो इन्हें बचाने में लगे हैं मगर उसके बावजूद वो ये नहीं कह रहे हैं कि ये “हमारा धर्म मानने वाले लोग नहीं हैं

इन लोगों ने समस्या पहचान ली है फ़ौरन.. भले मोदी जी की कथनी करनी पर लाख सवाल उठाएं हम मगर उन्होंने ये तो स्वीकारा है कि ये लोग “गऊ रक्षक” ही हैं जो हिंसक हो गए हैं.. उन्होंने ये नहीं कहा कि जनाब ये “नेपाल” की चाल है और ये तो हमारे धर्म के लोग ही नहीं हैं

मुसलमान भाईयों.. आपने कभी ग़ौर किया कि आपके आलिमों और उलेमाओं का रटा रटाया जुमला क्या होता है आतंकवादियों के बारे में? वो कहेंगे “ये मुस्लिम हैं ही नहीं”.. वो कहेंगे “ये यहूदी हैं”.. वो कहेंगे “ये अमेरिका की चाल है”.. आपके आलिम और आप कभी ये ना स्वीकारेंगे कि “ये हैं तो मुसलमान ही मगर हां ये हिंसक हो चुके हैं”

समस्या को पहचान लेना समस्या को हल करने के दिशा में पहला और कारगर क़दम होता है.. मुस्लिम समाज समस्या तो जानता है मगर मुँह फेर लेता है..क्या वजह है कि आज तक आतंकवाद ख़त्म न हो सका? यही सबसे बड़ी वजह है.. क्यूंकि जब आप स्वीकारेंगे ही नहीं कि आतंकवादी मुस्लिम हैं तो फिर इसे हल कौन करेगा आख़िर? जब ISIS यहूदी संगठन है फिर तो अब मुसलमानो की कोई ज़िम्मेदारी ही न बनी उस पर.. जब इस तरह मुह फेरा जाएगा तो फिर समस्या की “जड़” कहाँ है उस तक भला कैसे कोई जाएगा?

हिन्दू समाज ने कितनी तेज़ी से इस समस्या को पहचाना है.. कैसे दुत्कार रहे हैं ये लोग अपने ही लोगों को.. आपके समाज से कोई रवीश जैसा इस तरह से अपने ही समाज के ख़िलाफ़ खड़ा हो जाये और कहे कि समस्या “हमारा धार्मिक उन्माद” ही है तो क्या आप उसका साथ देंगे? आप उसे तारिक़ फ़तेह बना देते हैं और उसकी बेटी कितने लोगों के साथ सोती है या तारिक़ फ़तेह दारू पीता है ये कहकर आप उसे दुत्कार देते हैं

ये बात बहुत ज़रूरी था कहना क्यूंकि ये जो लोग आपके साथ हाथों में काली पट्टी बांध कर आये हैं ये आपके धर्म के लोग नहीं हैं.. इनके अपने और इनके समाज के सैकड़ों लोग आपके ही “धार्मिक आतंकवाद” का शिकार हो चुके हैं मगर आपके यहाँ सिर्फ कुछ मासूम मारे गए और ये लोग तुरंत भारी संख्या में आपके साथ खड़े हो गए और आपके विरोध को सफ़ल बनाया.. ये किस तरह की शिक्षा है इनकी जो आपकी शिक्षा से एकदम अलग है.. ये क्या है इनके मूल में जो इंसाफ़ के हक़ में बोलने के अपने समाज और सरकार से टक्कर लेने पर इन्हें मजबूर कर देता है?

ये क्या है इनके भीतर जो “हिन्दू राष्ट्र” का सब्ज़बाग़ दिखाने के बाद भी कोई इन्हें भ्रामित नहीं कर पाता है और ये उनके ख़िलाफ़ खड़े हो जाते हैं जबकि “शरीया” के ख़्वाब देखने वालों के प्रति आप मौन रहते हैं और मूक समर्थन दे देते हैं? क्या है ये.. ये सैकड़ों और लाखों लोग जो न नमाज़ पढ़ें और न रोज़ा रखें उन्हें आपके यहाँ मारे जा रहे मासूमों की फ़िक़्र आपके मदरसों के पांच वक़्त नमाज़ी आलिमों से भी ज़्यादा है?

ये किस तरह की शिक्षा है इनकी.. ये किस सोच के लोग हैं जो समस्या तुरंत पहचान गए और लड़ने को खड़े हो गए.. ये किस तरह के लोग हैं जो बिना “शांति” के धर्म को अपनाए इतनी शांति और इंसाफ की बात करते हैं? ये क्या पढ़ते हैं अपने घरों में जो आप इनके अगल बगल रहने के बावजूद आज तक नहीं पढ़ पाए?

सोचिये थोड़ा इस पर और आपको समझ आये तो मुझे भी समझाइये.. क्यूंकि अब समस्या आपको भी पहचाननी है.. वक़्त आ चुका है

~ताबिश

FBVARTA – हिन्दीवार्ता के इस पन्ने पर हम फेसबुक की दुनिया में लिखे जा रहे ऐसे उत्तम लेखों और रचनाओं से आपको रूबरू करवा रहे हैं जो आम पाठकों तक कई बार नहीं पहुँच पाते बावजूद इसके कि इन लेखों और रचनाओं के लेखकों के राजनीतिक, सामाजिक और साहित्यिक सरोकार बहुत उम्दा स्तर के हैं.

सुनो जोगी, मैं तुम्हें माँ की तरह याद करती हूँ – संध्या नवोदिता

सुनो जोगी
मैं तुम्हें माँ की तरह याद करती हूँ

माँ जो गई सितारों में
और तुम हुए जैसे धरती का सितारा
क्या कहूँ कि एक ऐसी तुम्हारी बस्ती है इस जमीन की
जहाँ कोई घोड़ा, तांगा, जहाज नहीं जाता
कोई रेल नहीं जाती तुम तक
कोई पगडण्डी, कोई शाहराह

सिर्फ एक विराट व्याकुलता है
जो सीधे तुम्हारे नगर को जाती है
तुम्हारा घर निगाहों की ज़द में नहीं
पर मेरा हृदय वहीं छूट गया है

खुशियों का शहर एक स्वप्न हुआ
और तुम हुए स्वप्न के सारथी
जाने कहाँ गुम हुए
कि मेरा शानदार जीवन रथ ठहर गया

सुनो जोगी
वो सात समुद्र तट मिलकर पुकारते हैं
ऊंचे स्वर में तुम्हारा नाम
सुवर्णरेखा के मैंगरूवों में तुम्हारी छाया आज भी दीखती है
तुम अब भी तैर रहे हो उड़ीसा के बैकवाटर में

धरती की वो अंतिम सात पनीली दीवारें
रेत पर उगते, गायब होते सुर्ख फूल
तुम्हारे हाथों से बिखरी ज़िन्दा सीपियाँ
तुम्हारी खुशी का उन्मत्त जवाब देते ज्वार

मेरा आसमान तुम्हारी लाखों चहलकदमियों का गवाह है

सुनो जोगी
माना कि अंतिम यात्रा पूर्ण हुई
पर ऐसे कोई किसी को नहीं भूलता
हम तो मृतकों तक को हर बरसी पर
धरती पे ले आते हैं जिमाने

सुनो जोगी
याद एक ज़िन्दा शगल है
और मैं तुम्हें माँ की तरह अथाह बेचैनी से सुमिरती हूँ।

–संध्या नवोदिता

वे नफरत के व्यापारी हैं – Mahesh Katare Sugam

वे नफरत के व्यापारी हैं साज़िश के पापड़ बेलेंगे
वे जितनी गोली दागेंगे हम उतने नाटक खेलेंगे

हैं दिल में बेहद डरे हुए काले कानूनों के निर्माता
वे जितना हमको रोकेंगे हम उतने ज़्यादा फैलेंगे

उनके हाथों में बन्दूकें उनकी फितरत में हिंसा है
हम कब तक चुप रह पाएंगे हम कब तक उनको झेलेंगे

अब गोलबन्द होना होगा करना होगा प्रतिरोध हमें
जो ताकत हमने दी उनको वो ताकत वापस ले लेंगे

हम ऐसे ही चुपचाप रहे तो नंगे होकर नाचेंगे
”सुगम”सोच लो ज़ुल्मों के वे डंड यहीं पर पेलेंगे