योगी राज में कितना बदला उत्तर प्रदेश ? – तारकेश कुमार ओझा

यह विचित्र संयोग रहा कि सात साल बाद विगत मार्च में जब मेरा देश के सबसे बड़े सूबे उत्तर प्रदेश में जाना हुआ तब राज्य में विधानसभा के चुनाव अपने अंतिम चरण में थे, और इस बार जुलाई के प्रथम दिनों में ही फिर प्रदेश जाने का संयोग बना तब देश के दूसरे प्रदेशों की तरह ही यूपी  में भी राष्ट्रपति चुनाव की खासी गहमागहमी चल रही थी। निश्चय ही किसी भी सरकार के काम – काज का आकलन दिनों के आधार पर नहीं किया जा सकता। लेकिन मन में असीम जिज्ञासा यह जानने की रही कि देखें तेज तर्रार मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ के राज में उत्तर प्रदेश कितना बदला है।

yogi uttar pradesh cmनितांत निजी प्रयोजन से पश्चिम बंगाल से उत्तर प्रदेश के प्रतापगढ़ के लिए यात्रा शुरू करते ही रेल रोको आंदोलन के चलते ट्रेन के पूरे छह घंटे विलंब से चलने की पीड़ा दूसरे सैकड़ों यात्रियों के साथ मुझे भी झेलनी पड़ी। प्रतापगढ़ स्टेशन से बाहर निकलते ही मेरी जिज्ञासा जोर मारने लगी। सड़कों की स्थिति परिवर्तन का अहसास करा रही थी। अपने गांव जाते समय कुछ वैकल्पिक मार्गों का पता चला जिससे ग्रामांचलों की दूरियां काफी सीमित हो जाने से लोग राहत की सांस ले रहे थे। बातचीत में कुछ पुलों का जिक्र भी आया जिनकी वजह से ग्रामांचलों में आवागमन सुविधाजनक हो गया था। सबसे बड़ा मसला विधि – व्यवस्था का था। लेकिन इस सवाल पर हर कोई मुस्कान के साथ चुप्पी साध लेता। इसके स्थान पर कुछ कद्दावर भाजपा नेताओं की आपसी कलह की चर्चा शुरू हो जाती। जो मेरे जिले से राज्य सरकार में मंत्री थे। नेताओं के आपसी टकराव की चर्चा लोग चटखारे लेकर कर रहे थे। बिजली के सवाल पर हर किसी से यही सुनने को मिला कि ग्रामांचलों में भी स्थिति कुछ सुधरी है। अनियमित ही सही लेकिन निर्धारित 12 घंटे के बजाय अब लोगों को अधिक बिजली मिल रही है।

दूसरे दिन बस्ती जाने के क्रम में मुझे इस बात से काफी खुशी हुई कि मेरे गंतव्य तक जाने वाला राजमार्ग अमेठी, सुल्तानपुर फैजाबाद व अयोध्या जैसे शहरों से होकर गुजरेगा । राजनैतिक – ऐतिहासिक घटनाओं के चलते मैं जिनकी चर्चा अरसे से सुनता आ रहा हूं। अपने गांव बेलखरनाथ से गंतव्य के लिए निकलते ही गाड़ी दीवानगंज बाजार पहुंची तो बाजार में बेहिसाब जल- जमाव व गंदगी के बीच सड़क के बिखरे अस्थि – पंजर ने अनायास ही मेरे मुंह से सवाल उछाल दिया कि परिवर्तन के बावजूद यह क्यों…। जवाब मिला … यही यहां का चलन है। मेरे यह पूछने पर कि यहां कोई नगरपालिका या पंचायत प्रतिनिधि तो होंगे । क्या उनके संज्ञान में यह सब नहीं है। फीकी मुस्कान के साथ जवाब मिला जब जिला मुख्यालयों में ऐसी ही हालत है तो गांव – जवार की कौन पूछे।

गाड़ी आगे बढ़ी औऱ अमेठी के रास्ते गोरखपुर जाने वाले राजमार्ग की ओर बढ़ने लगी। बेखटके चल रही गाड़ी ने अहसास करा दिया कि उत्तर प्रदेश में भी प्रमुख सड़कों की हालत में काफी सुधार आ गया है। हालांकि इस आधार पर कतई इस निष्कर्ष पर नहीं पहुंचा जा सकता था कि गांव – कस्बों की सड़कें सचमुच गड्ढा मुक्त हो पाई है या नहीं। अनेक गांव – कस्बों व जिला मुख्यालयों से होते हुए हम अपने गंतव्य की ओर बढ़ रहे थे। हालांकि मेरे अंदर सबसे ज्यादा कौतूहल परिवर्तन की सरकार में पुलिस तत्परता का अनुभव करने की थी। क्योंकि कानून – व्यवस्था में सुधार के  हर सवाल पर स्थानीय निवासी फीकी मुस्कान के साथ चुप्पी साध लेते थे।

अयोध्या से आगे बढ़ते ही बस्ती जिले के प्रवेश द्वार पर एक हादसे के चलते राजमार्ग पर बेहिसाब जाम लग गया था। ट्रक ने सेना के एंबुलेंस को ठोकर मार दी थी। हादसे में किसी की मौत तो नहीं हुई थी। लेकिन हादसे के चलते वाहनों का आगे बढ़ पाना मुश्किल हो रहा था। बढ़ते उमस के बीच इस परिस्थिति ने मेरी बेचैनी बढ़ानी शुरू कर दी। तभी लगा शायद इसी बहाने पुलिसिया तत्परता से दो – चार होने का मौका मिल जाए। अपेक्षा के अनुरूप ही थोड़ी देर में सायरन बजाते पुलिस के दो वाहन मौके की ओर जाते दिखाई दिए। कुछ देर में जाम खुल जाने से मैने राहत की सांस ली। वापसी यात्रा में निकट संबंधी के यहां भुपियामऊ गया, तो वहां निर्माणाधीन विशाल पुल ने मुझे फिर  कभी गांव से नजर आने वाले इस इलाके में  परिवर्तन का आभास कराया। भले ही इसकी नींव बहुत पहले रखी गई हो।

वापसी की ट्रेन हमें इलाहाबाद से पकड़नी थी। देर शाम तकरीबन साढ़े आठ बजे हमें प्रतापगढ़ से मनवर संगम एक्सप्रेस मिली। रवाना होते ही ट्रेन की बढ़िया स्पीड ने इस रुट पर कच्छप गति से चलने वाली ट्रेनों की मेरी पुरानी अवधारणा को गलत साबित कर दिया। लेकिन जल्दी ही ट्रेन पुरानी स्थिति में लौट आई और जगह – जगह रुकने लगी। फाफामऊ स्टेशन पर यह ट्रेन देर तक रुकी रही। जिसके चलते असंख्य यात्रियों को रेलवे लाइन पार करने का जोखिम उठाते हुए पहले जाने वाली दूसरी ट्रेनों में चढ़ना पड़ा। इलाहाबाद से हमें आनंदविहार – सांतरागाछी साप्ताहिक सुपर फास्ट ट्रेन पकड़ना था। लेकिन यह ट्रेन धीरे – धीरे पांच घंटे विलंबित हो गई। जिससे यात्रा की शुरूआत की तरह ही मेरी वापसी यात्रा का सगुन भी बिगड़ चुका था। ट्रेन के आने के बाबत रेल महकमे की भारी लापरवाही झेलता हुआ मैं परिवार सहित तड़के इस ट्रेन में सवार होकर अपने शहर को लौट सका।

  • तारकेश कुमार ओझा

उप-संपादक, दैनिक जागरण, खड़गपुर, पश्चिम बंगाल।

कोई क्यूँ नहीं सुन रहा इन 300 पाकिस्तानी हिन्दुओं की आवाज़..

अभी हाल ही में पाकिस्तानी गायक अदनान सामी को भारतीय नागरिकता मिल गयी है और इसी के साथ राजनीति भी गर्म हो गयी है. शिवसेना ने सरकार की नीतियों पर सवाल उठाते हुए कहा कि अदनान सामी को जब नागरिकता मिल सकती है  तो पाकिस्तान के उन पाकिस्तानी हिन्दुओं को क्यों नहीं जो भारत आ कर बसना चाहते हैं! यह सरकार के दोहरे चरित्र को दर्शाता है .

pakistani hindus

उधर पाकिस्तान में हुए अत्याचारों से पीडित होकर भारत आए पाकिस्तानी हिन्दुओं ने कहा, ‘भारत सरकार को अदनान सामी से ही इतना प्रेम क्यों है? हमें भारत की नागरिकता क्यों नहीं मिल रही जबकि अदनान सामी को इतनी आसानी से भारतीय नागरिकता दे दी गयी . इसके बावजूद कि वह एक मुस्लिम हैं और हम हिन्दू .

300 से अधिक हिन्दू पठानकोट और जालंधर के आस पास रह रहे हैं! इनमें से एक फलक चंन्द के मुताबिक, मैं 1998 में भारत आया और यहाँ शादी की. 2005 में मेरा वीज़ा एक्सपायर हो गया जिसके एक्सटेंशन की अर्जी हमने दे रखी है . परन्तु न हमें हमारी अर्जी पर कोई जवाब मिला और न ही हमें भारतीय नागरिकता देने पर सरकार कोई फैसला लेना चाहती है . अदनान सामी को नागरिकता देने में सरकार ने जितनी तेज़ी दिखाई है अगर हमपर भी इतना ध्यान दिया जाता तो आज इतने सालों से हमें भारत में भटकना नहीं पड़ता .

अब देखना यह है कि चुनाव से पहले बड़े-बड़े वादे करने वाले नेता मंत्री एवं हिंदुत्व का मोर्चा उठाये धर्म के ठेकेदार इन लोगों की कब मदद करने पहुँचते हैं .

गौरतलब हो कि जनवरी 2015 में भाजपा सरकार में 4000 पाकिस्तानी हिन्दुओं और सिखों को भारत की नागरिकता दी थी परन्तु इसके बावजूद बहुत से ऐसे रिफ्यूजी, जिन्होंने पाकिस्तान छोड़ दिया है, भारत की नागरिकता मिलने की आस में भारत में अस्थायी रूप से रह रहे हैं .

पढ़ें कैसे निर्भया कांड के नाबालिग को ले कर सोशल मीडिया पर फैलाया जा रहा झूठ

देश के सबसे शर्मनाक घटनाओं में से एक निर्भया रेप कांड (जिसमें दिल्ली में चलती बस में एक लड़की का सामूहिक बलात्कार 6 लोगों ने किया था) में एक नाबालिग को ले कर काफी बयानबाज़ी हुई ! सभी अभियुक्तों में से उसने सबसे अधिक बर्बरता दिखाई थी परन्तु नाबालिग होने की वजह से उसे सिर्फ तीन साल की सजा हुई और हाल ही में उसे आज़ाद कर दिए गया जिसके बाद दिल्ली सरकार ने जुवेनाइल सेटलमेंट प्रक्रिया के तहत उसे 10, 000 रूपए और एक सिलाई मशीन दी थी!

परन्तु इन सब के बीच यह बात बड़े धड़ल्ले से सोशल मीडिया से माध्यम से सामने आ रही थी कि रेप करने वाला एक मुस्लमान युवक है जिसका नाम अफरोज है! उस युवक की तस्वीर के साथ अनाप शनाप बयानबाज़ी फेसबुक पर कुछ धार्मिक उन्मादियों द्वारा की जा रही है!

‘निर्भया का कातिल अफरोज’ शीर्षक के साथ फेसबुक पर शेयर की जा रही पोस्ट में लिखा गया है

‘ये कानून और टीम केजरीवाल के लिए अभी बच्चा है और इसको ये सुधारेंगे…4 हफ्ते तक और इस दरिंदे के छूटने तक राज्यसभा में कांग्रेस ने जुवेनाइल बिल पास नहीं होने दिया और इसके छूटते ही कांग्रेस ने शांति से इस बिल को पास होने दिया. अफरोज को छूटने के बाद केजरीवाल सरकार सिलाई मशीन देने वाली है और अफरोज को लेडीज टेलर बनायेगी. अब राष्ट्रवादियों क्या ये भी बताना पड़ेगा की (कि) कौन सी सरकार निर्भया के (की) मौत पर मोमबत्ती जला रहा थी और आज कौन उसके कातिल को बचा रही है।’  भ्रामक खबर फैला रही प्रोफाइल का लिंक

सोशल मीडिया पर फैलाया जा रहा झूठ
सोशल मीडिया पर फैलाया जा रहा झूठ

तस्वीर में जिस शख्स को दर्शाया गया है वह वास्तव में विनय शर्मा है न की अफरोज ! विनय एक बालिग है जो की एक जिम इंस्ट्रक्टर रह चूका है , इस केस में उसे सजा मिल चुकी है और वो जेल में है!

vinay

CNN और इंडियाटाइम्स की रिपोर्ट (proof)  में यह साफ़ लिखा है कि तस्वीर में दिखने वाला यह शख्स विनय है न कि अफ़रोज़! फिर भी सोशल मीडिया पर लोग धड़ल्ले से इस बात को मान कर धर्म विशेष के खिलाफ टिप्पणी किये जा रहे हैं जो की कही से भी तर्कसंगत नहीं है!

परन्तु उसकी फोटो के साथ कुछ धर्म के ठेकेदार अपनी मन मर्ज़ी से जो चाहे लिख कर समाज में धर्म विशेष के प्रति द्वेष तो फैला ही रहे हैं साथ में केजरीवाल सरकार को भी निशाने पर ले लिया है!

यह भी पढ़ें – क्या निर्भया को सच में मिल पाया न्याय?

आम आदमी पार्टी भी निशाने पर 

सोशल मीडिया पर यह झूठ फैलाया जा रहा है कि धर्म विशेष को आकर्षित करने के लिए केजरीवाल सरकार इस अभियुक्त को 10,000 रूपए और सिलाई मशीन देने के साथ उसे लेडीज टेलर बनाएगी!

आम आदमी पार्टी या आप सरकार की ओर से कभी नहीं कहा गया कि वह ‘अफ़रोज़’ को लेडीज़ टेलर बनाएगी। यह एक बीमार दिमाग़ की उपज से ज़्यादा और कुछ नहीं। अभी जो जुवेनाइल जस्टिस ऐक्ट लागू है, उसके तहत सरकार का फ़र्ज़ बनता है कि वह हर जुवेनाइल के पुनर्वास की व्यवस्था करे। यदि बीजेपी की सरकार अभी दिल्ली में होती तो उसे भी यह व्यवस्था करनी पड़ती।

सोशल मीडिया पर तेज़ी से फ़ैल रहे इस झूठ को रोकने के लिए फिलहाल हमारा समाज कुछ कर पाने में असमर्थ है परन्तु हम यह अपील करते हैं कि किसी भी तथ्य पर यकीन करने से पहले उसे सत्यापित ज़रूर करें वर्ना वह दिन दूर नहीं जब भारत धर्म और जाति के नाम पर टुकड़ो में बंट जाएगा और ये धर्म के ठेकेदार अपनी रोटी सेकने के अलावा कुछ और नहीं कर पाएंगे

हम सभी को यह बात नहीं भूलनी चाहिए कि रेप करने वाले रेपिस्ट होते हैं उनको किसी धर्म से जोड़कर देखना बेवकूफी है! 6 में से 5 रेपिस्ट हिन्दू थे और एक मुसलमान परन्तु इसका ये मतलब बिलकुल नहीं कि हम रेप करने वाले को उसके धर्म के चश्मे से देखें!

नेशनल हेराल्ड केस में अरविन्द केजरीवाल की चुप्पी से उठते सवाल

देश की राजनीति में इस समय भ्रष्टाचार के दो ही मुद्दे गरमाए हुए हैं – पहला, डीडीसीए में अरुण जेटली के अध्यक्ष काल में हुआ कथित घोटाला और दूसरा, नेशनल हेराल्ड केस में सोनिया गांधी और राहुल गांधी पर कसता कानूनी शिकंजा !

जहां अरुण जेटली ने अपने ऊपर लगे आरोपों का जोरदार खंडन किया है और इस मामले को जोर-शोर से उठाने वाले अरविन्द केजरीवाल पर मानहानि का कानूनी दवा भी थोक दिया है वहीँ दूसरी और कांग्रेस पार्टी सोनिया और राहुल गांधी के ऊपर नेशनल हेराल्ड केस को राजनीति से प्रेरित बता कर आखिर तक न्याय की लड़ाई लड़ने का दम भरती आ रही है।

Arvind Kejriwal National Herald नेशनल हेराल्ड अरविन्द केजरीवाल चुप्पी सवालइस देश में घोटाले होना, घोटाले के आरोप लगना और उस पर राजनीति होना कोई नई बात नहीं है न ही इस में कोई आश्चर्य करने वाली बात है।  आश्चर्य की बात कोई अगर है तो वह है नेशनल हेराल्ड केस में अरविन्द केजरीवाल की रहस्यमय  चुप्पी !! जहां अरुण जेटली के डीडीसीए वाले कथित घोटाले पर चीख चीख कर उन्होंने अपना गला बैठा लिया है, यहां तक कि दिल्ली विधान सभा का एक विशेष सत्र बुला कर उस में अरुण जेटली और प्रधान मंत्री को जी भर कर कोसा, प्रधान मंत्री नरेंद्र मोदी के इस्तीफे की मांग भी कर डाली, सीबीआई पर इल्जाम लगा डाले।

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वहीँ अरविन्द केजरीवाल ने नेशनल हेराल्ड समाचार पत्र  की करोड़ों रुपये की सम्पत्ति को कथित रूप से अवैधानिक और पिछले दरवाजे से हड़पने के आरोप सोनिया गांधी और राहुल गांधी पर लगने के बावजूद इस मामले में कुछ बोलना जरूरी नहीं समझा।

अब यह तो सभी को पता है कि बेचारे अन्ना हज़ारे के भ्रष्टाचार विरोध के आंदोलन का राजनीतिक फायदा तो सबसे ज्यादा अरविन्द केजरीवाल को ही मिला और अन्ना बेचारे रालेगण सिद्धि वापस जा बैठे।  लेकिन मात्र ४ साल में भ्रष्टाचार के विरोध में चलने वाले एक एनजीओ के संयोजक से दिल्ली के मुख्यमंत्री की कुर्सी तक का सफर अरविन्द केजरीवाल ने आंधी-तूफ़ान की तेजी से आसानी से तय कर लिया।  और इस बीच देश-विदेश में उन्होंने अपनी छवि एकमात्र ऐसे नेता की बनाने का भरसक प्रयास भी किया जो भ्रष्टाचार के सफाये और स्वच्छ राजनीति के लिए अपनी जान लगाए हुए है।

जनता ने काफी हद उनकी इस छवि को स्वीकार भी किया लेकिन पिछले कुछ समय से उनकी कथनी और करनी में फर्क साफ़ नजर आ रहा है।

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पहले अपनी आप आदमी पार्टी से अपने पुराने साथियों योगेन्द्र यादव और प्रशांत भूषण को बाहर का रास्ता दिखा कर पार्टी के आतंरिक लोकतंत्र का गला घोटा और अब सारा विरोध सिर्फ बीजेपी और नरेंद्र मोदी पर केंद्रित होते जाने से ऐसा लग रहा है कि उनके विरोधियों के इस दावे में दम है कि अरविन्द केजरीवाल की आम आदमी पार्टी कांग्रेस की ही टीम B से ज्यादा कुछ नहीं है।

तो क्या नेहरू ने ठुकराई थी युनाइटेड नेशन्स (UN) की स्थाई सदस्यता? पढ़ें पूरा सच.

nehru jiआजकल एक नया ट्रेंड चला है इतिहास को नए सिरे से परिभाषित करने का, या यूँ कहें कि नए सिरे से लिखने का।  हर तरफ ऐसे आर्टिकल्स की बाढ़ आई हुई है जो गांधी और नेहरू के व्यक्तित्व से लेकर उनकी नीतियों, राजनीतिक जीवन और उनके द्वारा चलाये गए सामाजिक आन्दोलनों की आलोचना करने में जुटे हैं।  इनमें से कुछ के पीछे दिए गए तर्क काफी वजनदार भी नजर आते हैं!

बहरहाल इन सभी लेखों और रिपोर्टों से इतना तो हुआ है कि एक बहुत बड़े वर्ग को भारत के इतिहास को पढने समझने का एक मौका मिला है।  इन्हीं लेखों की कड़ी में आपने इंटरनेट पर शायद पढ़ा होगा कि प्रधान मंत्री रहते हुए नेहरू ने भारत को युनाइटेड नेशन्स (UN) में मिल रही स्थाई सदस्यता (permanent membership) का प्रस्ताव ठुकरा दिया था और इसके लिए उन्होंने भारत (India) के बजाए चीन (China) को स्थाई सदस्यता दिए जाने के प्रस्ताव का समर्थन किया था! आइये देखते हैं कि इस बात में कितनी सच्चाई है !

प्रचलित अख़बार ‘द हिंदू’ लिखता है – 28 सितंबर 1955 को दिए गये अपने भाषण में नेहरू ने यह स्पष्ट किया कि भारत को कभी भी औपचारिक या अनौपचारिक रूप से युनाइटेड नेशन्स की स्थाई सदस्यता देने का आमंत्रण नही मिला है।  लोकसभा में J. N Parekh द्वारा पूछे गये सवाल के जवाब में पंडित जी ने यह स्पष्ट किया था। (प्रमाण-Nehru on UN seat | The Hindu)

तब नेहरू ने कहा था- “युनाइटेड नेशन्स के सिक्युरिटी काउन्सिल की सदस्यता UN चार्टर के अनुसार तय होती है, उस चार्टर में बदलाव किए बिना किसी भी देश को स्थाई सदस्यता नही दी जा सकती है।  फिर भारत को स्थाई सदस्यता मिलने का सवाल ही पैदा नही होता!  हालाँकि हमारी नीति हर उस देश को युनाइटेड नेशन्स की स्थाई सदस्यता देने का समर्थन करती है जो इसके योग्य है!”

पर क्या नेहरू के स्पष्टीकरण पर विश्वास किया सकता है? 

अमेरिकी अख़बार वॉशिंग्टन पोस्ट (लिंक) में एक लेख में यह कहा गया है कि अमेरिका ने भारत को 1955 में स्थाई सीट के लिए युनाइटेड नेशन्स में प्रस्ताव दिया था पर ये बात सोचने वाली है कि क्या सिर्फ़ अमेरिका के समर्थन कर देने भर से भारत को स्थाई सदस्यता मिल जाती?

गौर देने वाली बात है कि प्रचलित लेखक  S. Gopal द्वारा लिखित किताब Javaharlal Nehru  के अध्याय  2, पृष्ठ 248 पर लिखा है – “He (Jawaharlal Nehru) rejected the Soviet offer to propose India as the sixth permanent member of the Security Council and insisted that priority be given to China’s admission to the United Nations” (यहाँ नेहरू पर आरोप है कि सोवियत रूस द्वारा भारत को UNSC की छठी सीट देने की पेशकश की गयी थी जिसे नेहरू ने ठुकरा दिया था )

लेकिन IIT मुंबई के प्रोफ़ेसर मकरंद सहस्रबुद्धे के अनुसार जब तक आप नेहरू को झूठा घोषित नहीं कर देते, आपको यह मानना होगा कि भारत को स्थायी सदस्यता की पेशकश नहीं की गयी थी।  यह बस एक मिथ्या अफवाह मात्र है जो उस समय भी चर्चा में थी जब नेहरू प्रधान मंत्री थे।  तब उस समय नेहरू ने स्वयं इस बात का खंडन किया था।  

नेहरू सही थे या गलत?

चलिए थोड़ी देर के लिए यह मान भी लेते हैं कि नेहरू को स्थाई सदस्यता की पेशकश की गयी थी और उन्होंने UNSC की स्थायी सदस्यता ठुकरा दी थी तो इस पूरे घटनाक्रम के वास्तविक उदेश्य और परिणाम क्या हो सकते थे?

UNSC की स्थाई सदस्यता ठुकराने के परिणाम 

  • भारत रूस संबंधो में मजबूती
  • भारत की पंचशील समझौते में निष्ठा उजागर होती
  • अमेरिका को यह इशारा मिला कि भारत अमेरिका द्वारा पाकिस्तान को दी जाने वाले सहयोग से खुश नही है
  • उसके छठी सीट के लिए जगह

UNSC की स्थाई सदस्यता स्वीकार करने के परिणाम 

  • रूस और चीन से संबंधों में खटास
  • भारत अमेरिका का पिछलग्गू बन जाता जो हमारी तत्कालीन तटस्थता की नीति के खिलाफ था
  • भारत को वैसे भी सदस्यता नही मिलती क्यूकि रूस इस प्रस्ताव के खिलाफ वीटो करता

अंतरराष्ट्रीय राजनीति के फेर में उस समय फँसना भारत के लिए घातक हो सकता था .  और वैसे भी भारत अभी अभी आज़ाद हुआ था और इतना सशक्त भी नही था कि  UNSC का स्थाई सदस्य बन पाए।

पर चीन तो 1945 से ही UNSC का स्थाई सदस्य था..

कुछ लोगो का मानना है कि चीन तो 1945 से ही UNSC का स्थाई सदस्य था और ये घटना 1955 के आस पास की है फिर अमेरिका या अन्य देशों द्वारा चीन और भारत में से किसी एक का चुनाव करने का प्रश्न ही कहाँ उठता है?

ये जानना ज़रूरी है कि जिस चीन को स्थाई सदस्यता 1945 से ही मिली हुई है उसे रिपब्लिक ऑफ चीन कहा जाता था (जो अब ताइवान है) जबकि समाजवादी क्रांति के बाद पीपल्स रिपब्लिक ऑफ चाइना का गठन हुआ जिसकी स्थाई सदस्यता देने के समय भारत का नाम भी आगे आया था।

तो आख़िर क्या है सच्चाई

तथ्यो को गौर से देखने पर यह स्पष्ट हो जाता है कि अमेरिका ने UNSC (United Nations Security Council) की स्थाई सदस्यता भारत को देने की पेशकश तो की थी पर यह महज एक अंतरराष्ट्रीय राजनीतिक चाल मात्र थी। हालाँकि भारत को स्थाई सदस्यता मिलने की कोई संभावना नहीं थी पर नेहरू पर ये आरोप तो लगेगा ही कि उन्होने एक अदूरदर्शी कदम उठाया और भारत को अंतर्राष्ट्रीय मंच पर मजबूती देने वाला एक बहुमूल्य अवसर गँवा दिया।

एक और बात उभर कर सामने आती है और वो ये कि भारत ने उस समय चीन और रूस से दुश्मनी ना मोल ले कर अपने बजट का बड़े हिस्से का प्रयोग युद्ध एवं हथियारों के बजाए भारतवासियों की शिक्षा, इंफ़्रास्ट्रक्चर एवं मूलभूत समस्याओं से निपटने में किया और शायद उसी सूझबूझ की वजह से आज भारत उन राष्ट्रों के मुकाबले कहीं अधिक विकसित और प्रगतिशील है जिन्हें भारत के साथ ही आजादी मिली थी।

भारत और पाकिस्तान एक ही समय पर आज़ाद हुए! भारत ने तटस्थता की नीति अपनाई पर पाकिस्तान अमेरिका का पिछलग्गू देश बन कर रह गया! आज नेहरू की उन्हीं विकासोन्मुख नीतियों की बदौलत भारत पाकिस्तान को हर मोर्चे पर मात देता नजर आता है। 

हाँ, ये बात दीगर है कि नेहरू के शांति और पंचशील के सिद्धांतों पर चल कर चीन पर भरोसा करना भारत के लिए अंतत: भारी पड़ा। 1962 के चीनी आक्रमण ने नेहरू को एक सदमा और भारत को महत्वपूर्ण सामरिक और विदेशनीति का सबक दिया। लेकिन यह उसी सदमे और 1962 की हार से मिले सबक का फल था कि 1965 में हमने पाकिस्तान को करारा जवाब दिया।

दोस्तों, आप अपनी राय या सवालो को कमेंट्स के माध्यम से उजागर कर सकते हैं !

Title- Is it true that Jawahar Lal Nehru Rejected United Nations security council permanent seat for India?

गाँधीजी की 5 गलतियाँ जिनका खामियाज़ा भारत आज भी भुगत रहा है

why i hated gandhi, why gandhi was wrong in hindi, kyu main gandhi se nafrat karta thaमहात्मा गांधी जिन्हें भारत का राष्ट्रपिता भी कहा जाता है, ने पूरे विश्व को अहिंसा और शांति का सन्देश दिया! पर गलतियाँ उनसे भी हुईं. भारी गलतियाँ, जिनका खामियाज़ा देश आज भी भुगत रहा है!

1. गांधीजी की हठधर्मिता – गांधीजी हठी थे, उनकी ‘माय वे ऑर हाईवे’ वाले सिद्धांत ने काफी क्षति पहुचाई ! गांधीजी ने काफी बड़े और प्रभावी आंदोलन किये पर आदर्शो एवं सिद्धांतों के नाम पर उन्हें खुद ही ख़त्म कर दिए ! मोटे तौर पर गांधी जी की नीति ये थी- “मुझे फर्क नहीं पड़ता कि आप कितने बड़े नेता हैं या आपने कितने ही अच्छे काम किये हैं जबतक आप मेरे विचारों से सहमत नहीं, आपको मेरा समर्थन नहीं मिलेगा”

उदाहरण के तौर पर 1927 में गांधीजी ने घोषणा की कि मेरे बाद सी. राजगोपालाचारी को पार्टी की कमान सौंप दी जाये । पर 1942 में क्रिप्स कमीशन पर वैचारिक मतभेदों के बाद गांधीजी ने उन्हें कांग्रेस से निकाल दिया और ये कहा कि राजगोपालाचारी नहीं बल्कि नेहरू मेरे उत्तराधिकारी होंगे। (और सिर्फ गांधी के उत्तराधिकारी होने का मतलब प्रधानमंत्री? प्रधानमंत्री का पद क्या गांधीजी की जागीर थी?) सिर्फ अपने आदर्शो को थोपने की वजह से उन्होंने नेताजी को पार्टी छोड़ने पर मजबूर कर दिया क्यूंकि गांधी जी और उनके समर्थक, जैसे जवाहरलाल नेहरू, सुभाष चन्द्र बोस के विरोध पर हद से ज्यादा उतारू हो गए थे।  सैद्धांतिक मतभेदों की वजह बहुतो को गाँधी के कोपभाजन का शिकार बनना पड़ा । यह गांधीजी की एक अहिंसक तानाशाही छवि को दर्शाता है ।

सायंस और टेक्नोलॉजी को लेकर भी गांधीजी के विचार भी काफी अजीब थे। विदेश में पढाई के बावजूद उन्हें ये शैतानी लगता था । उन्होंने अपनी पत्नी कस्तूरबा गांधी को मरने दिया जबकि एक इंजेक्शन लगा देने भर से उनकी जान बच सकती थी । गांधीजी के आदर्शो के मुताबिक ये हिंसक था । (पढ़ें – Freedom at midnight)

2. भगत सिंह की फांसी – गांधीजी चाहते तो ये फांसी रोक सकते थे पर कई लोगों का यह मानना है कि गांधीजी ने भगत सिंह के केस पर कभी गंभीरता दिखाई ही नहीं। हालांकि भारत के वायसरॉय को लिखे पत्र में गांधी जी ने लिखा था “Execution is an irretrievable act. If you think there is the slightest chance of error of judgment, I would urge you to suspend for further review an act that is beyond recall” (मृत्युदण्ड एक असाध्य क्रिया है, यदि इसमें कही से भी कोई भी गुंजाईश है तो मैं आपसे विनती करता हूँ की कृपया इस फैसले को पुनः समीक्षा तक निलंबित किया जाये)

अवश्य पढ़ें –भारत को आजादी गांधी की अहिंसा और सत्याग्रह से मिली या भगत सिंह की कुर्बानी से?

यदि गांधीजी चाहते तो फांसी के खिलाफ आंदोलन कर सकते थे या फिर उनलोगो का साथ दे सकते थे जो भगत सिंह और उनके साथियों के फांसी के विरोध में शांतिपूर्ण आंदोलन कर रहे थे पर उन्होंने सिर्फ पत्र लिखने और विनती करने के अलावा कुछ नहीं किया।

प्रसिद्द लेखक A.G Noorani अपनी किताब थे “ट्रायल ऑफ़ भगत सिंह(Trail of Bhagat Singh)” के चौदहवें अध्याय में लिखते हैं “गांधी के प्रयास आधे अधूरे थे, उन्होंने कभी दिल से प्रयास किया ही नहीं! जब जेल में भगत सिंह और उनके साथी भूख हड़ताल पर थे, गांधीजी ने उनसे मिलने या उन्हें देखने तक की जहमत नहीं उठाई ! और तो और लार्ड इरविन को लिखे पत्र अपने मैं गांधी जी ने फांसी के फैसले को रद्द करने के बजाये उसे सिर्फ कुछ समय तक टालने का आग्रह किया था।”

3. अहिंसा का ढोंग- 1906 में गांधी जी ने ज़ुलु साम्राज्य के खिलाफ हुए युद्ध में अंग्रेजो को सहयोग दिया ! उनका ये मानना था की इस युद्ध में ब्रिटिश को सहयोग देकर वो उनका भरोसा जीत लेंगे। उन्होंने भारतीय सैनिको को ब्रिटिश सेना में भर्ती करने में ईस्ट इंडिया कंपनी को सहयोग दिया।

1920 की बात है जब गांधीजी के ही नेतृत्व में देशव्यापी असहयोग आंदोलन चरम पर था पर चौरा चौरी में कुछ उग्र लोगों ने एक पुलिस थाने को जला देने से आहृत होकर गांधीजी ने आंदोलन वापस ले लिया। बड़ी अजीब बात है न, अंग्रेजो के लिए विश्वयुद्ध में भारतीय सैनिक मर रहे थे तो कोई अहिंसा नहीं, पर जब देश की आजादी के लिए हिंसा की बात आती है तो गांधीजी को अहिंसा याद आजाती है।

हकीकत तो ये थी की गांधीजी अंग्रेजो के नज़र में वफादार बने रहना चाहते थे और इसके लिए वो कुछ भी कर सकते थे ! देश आजाद कराने के लिए वो कभी पूर्णतः समर्पित हुए ही नहीं। इतिहास गवाह है की आज़ादी मांगने से नहीं मिलती, छीननी पड़ती है, इसकी कीमत देशभक्तों को अपने खून से चुकानी पड़ती है जो गांधीजी ने नहीं बल्कि उन लोगोँ चुकाई जिन्हें आज भारत के इतिहास के पन्नो पर पर्याप्त जगह तक नसीब न हुई।

3.1 असहयोग आंदोलन – गांधीजी के अहिंसा से जुड़े बेतुके तर्क का एक नमूना यह भी है. इस आंदोलन को एक अभूतपूर्व सफलता मिल रही थी पर चौरा चौरी कांड के बाद अचानक गांधी जी ने आंदोलन वापस ले लिया! वजह- गांधीजी के आदर्श!!

सिर्फ अपने अहिंसा के आदर्शों की रक्षा करने के लिए आपने एक देशव्यापी आंदोलन को वापस ले लिया! रास्ते और भी थे, आप चाहते तो अपने लोगो से शांतिपूर्ण प्रदर्शन की अपील कर सकते थे ! पर आंदोलन वापस लेना क्या सही था?

आंदोलन के बाद 19 लोगों को मृत्युदंड की सजा सुनाई गयी. 6 की मृत्यु पुलिस कस्टडी में हुई एवं 110 लोगो को आजीवन कारावास की सजा मिली! और ये सारी गिरफ्तारियां और फैसले सिर्फ संदेह और झूठे गवाहों के आधार पर हुए। क्या ये देशवासियो के साथ अन्याय नहीं था, क्या फांसी देना हिंसक नहीं था पर आपके आदर्श इन सब से कही बढ़ कर थे! आपने आंदोलन वापस लेकर अंग्रेजो को द्वितीय विश्वयुद्ध में सहयोग का आश्वाशन दिया।

4. भारत का विभाजन – गांधीजी की ये सबसे बड़ी भूल थी जिसे आज पूरा भारत भुगत रहा है। द्वितीय विश्वयुद्ध से 1942 के आंदोलन को अगर वापस न लिया गया होता तो न ही मुस्लिम लीग का निर्माण होता और न देश की मांग होती। 1942 में आंदोलन ने ये साफ़ कर दिया था की भारतीय अब और नहीं सहेंगे! इसे भांपते हुए इंग्लिश शासन ने अपना अंतिम दांव खेला, उन्होंने कहा की विश्व युद्ध में भारत हमारा सहयोग करे और हम बदले में उसे आज़ाद कर देंगे।

गांधी ने , अपनी आदत के अनुसार घुटने टेक दिए और अंग्रेजो को विश्वयुद्ध की समाप्ति तक का वक्त दिया जबकि आज़ादी हमें उससे पहले ही मिल सकती थी। इस बीच मुस्लिम लीग काफी तेज़ी से बढ़ा और उन्होंने अंग्रेजो से संधि की कि हम आपको सैनिक देंगे आप हमारी अलग राष्ट्र की मांग पर विचार करें। जाते जाते देश को विभाजित करने का सुनहरा मौका अंग्रेज कैसे छोड़ सकते थे।

उस समय कांग्रेस के नेताओं का कहना था विभाजन टाला नहीं जा सकता और उन्होंने विभाजन पर सहमति दे दी पर यदि गांधीजी अपनी बात पर अड़ जाते तो भी इस विभाजन को रोका जा सकता था!ऐसी ही समस्या अमेरिका की आज़ादी के वक़्त अब्राहम लिंकन के सामने थी पर देश के टुकड़े करने के बजाए उन्होंने एक लम्बी और हिंसक लड़ाई लड़ी तब जा कर अमेरिका आज यूनाइटेड स्टेट्स ऑफ़ अमेरिका बना!

अरे मैं तो भूल ही गया था की गांधीजी को अहिंसा की पड़ी थी। पर विभाजन होने के बाद भी हमने जानें गवाई हैं। चाहे बांग्लादेश का निर्माण हो जा फिर ३ बार हुए भारत पाक युद्ध, हिंसा जारी है।

गांधीजी ये बात बार बार भूलते रहे कि आजादी की कीमत चुकानी पड़ती है। वह इंतज़ार करते रहे कि अंग्रेज उन्हें भारत की आज़ादी थाली में परोस कर देंगे। पर परोसने से पहले ही अंग्रेजो ने इसके टुकड़े टुकड़े कर दिए। गलत समय पर गलत लोगों के साथ गलत आदर्शों का अनुसरण गांधीजी के साथ साथ हम सबको महंगा पड़ गया।

5. गांधीजी की विवादित सेक्स लाइफ- सत्य के साथ अपने प्रयोग के लिए गांधीजी अपने कमरे में कुँवारी लड़कियों के साथ नग्न सोते थे !सरदार पटेल ने इस बारे में गांधीजी को पत्र लिख कर उनके इस प्रयोग को भयंकर भूल बताते हुए इसे रोकने को कहा था!

ब्रह्मचर्य के ये प्रयोग भी गाँधी की उसी हठधर्मिता और अतिवाद का परिणाम थे। जहाँ वे अपने को अपनी नजर में विजयी घोषित देखने के लिए स्त्री का वस्तु की भाँति प्रयोग करते रहे। साफ़ शब्दों में कहें तो युवतियों के साथ नग्न होकर सोने का परीक्षण करना ताकि अपनी ब्रह्मचर्य के लक्ष्य की पूर्णता जाँची -परखी जा सके।

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इन सारी ग़लतियो के बावजूद गाँधीजी का भारत की स्वतंत्रता में एक अहम योगदान रहा जिसे हम नज़रअंदाज कतई नही कर सकते!

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भारत को आजादी गांधी की अहिंसा और सत्याग्रह से मिली या भगत सिंह की कुर्बानी से?

तलवारों की धारों पर जग की आजादी पलती है, इतिहास उधर चल देता है जिस और जवानी चलती है

2 अक्टूबर को भारत में हर बार की तरह गांधी जयंती मनाई जाएगी। लेकिन इस बार गांधी जयंती पर एक बहस बहुत जोरों पर है – क्या भारत को आजादी महात्मा गांधी की अहिंसा और सत्याग्रह से मिली या भगत सिंह जैसे शहीदों की कुर्बानी से? जैसा कि किसी भी बहस में होता है इस बहस के पक्ष-विपक्ष में भी लोगों के अपने-अपने तर्क हैं। जहां युवा पीढ़ी शहीदों जैसे भगत सिंह, चन्द्र शेखर आजाद, खुदीराम बोस, सुभाष चन्द्र बोस, राम प्रसाद बिस्मिल आदि द्वारा छेड़े गए हिंसक संघर्ष को भारत की आजादी का श्रेय देना चाहती है वहीँ कुछ लोगों का मत है कि महात्मा गांधी के नेतृत्व में कांगेस के लम्बे विरोध का परिणामस्वरुप अंग्रेजों को भारत से अपना बोरिया-बिस्तर समेट कर जाना पड़ा।

gandhi bhagat singh India independenceथॉमस जैफर्सन ने कहा था – “स्वतंत्रता के पेड़ को समय समय पर तानाशाहों के खून से सींचा जाना जरूरी है” . मतलब यह कि अगर कोई कौम आजाद रहना चाहती है तो उसे आजादी के बदले में अपने खून की कुर्बानी देने के लिए तैयार रहना चाहिए। भारत की स्वाधीनता की लड़ाई में भी यही बात उभर कर सामने आती है। जब तक अंग्रेजों का विरोध केवल धरने-प्रदर्शनों और सत्याग्रहों तक सीमित रहा, ऐसा कभी नहीं लगा कि अंग्रेज भारत को स्वतंत्रता देने को लेकर तैयार थे। लेकिन 1920 के बाद बढ़ते हिंसक विरोध और सशत्र हमलों ने उन्हें अपना रुख बदलने पर मजबूर कर दिया।

सच तो यह है कि 1947 में तत्कालीन ब्रिटिश प्रधान मंत्री एटली से जब पुछा गया कि भारत को मिली आजादी में गांधी जी और उनके भारत छोड़ो आंदोलन का कितना योगदान था तो एटली ने हलके से मुस्कुरा कर कहा – “नगण्य”। सच्चाई तो यह है जर्मनी के साथ द्वितीय विश्वयुद्ध में उलझने के दौरान वित्तीय खस्ता हालत, सामरिक कमजोरी, आजाद हिन्द फ़ौज का आक्रमण और सबसे बढ़कर अमेरिका का सभी उपनिवेशों को मुक्ति देने का दबाव – इन सभी कारणों से अंग्रेजों को भारत छोड़ कर जाने का फैसला लेने पर मजबूर होना पड़ा। नेवी में हुए विद्रोह को भी अंग्रेजों के भारत से पलायन का एक मुख्य कारण माना जाता है।

आखिर अमेरिका को आजादी जार्ज वाशिंगटन की सेना के विरोध ने दिलाई या अमेरिका किसी टेबल पर हुई वार्ता से आजाद हुआ, रूस में ज़ार के निरंकुश शासन से मुक्ति बोल्शेविकों की क्रांति और रक्तपात मिली, हो ची मिन्ह ने फ्रांसीसियों को गुलदस्ते दे कर तो नहीं भगाया था? यहाँ तक कि बांग्लादेश को आजादी हजारों लोगों की शहादत के बाद ही मिल पाई थी.

सच्चाई तो यह है कि सन 1930 तक कांगेस तो भारत को मात्र डोमिनियन स्टेटस के मिल जाने की ही मांग से संतुष्ट थी वहीँ HRA आदि (भगत सिंह जैसे क्रांतिकारियों द्वारा संचालित गरम विचार धारा वाले समूहों ) द्वारा पूर्ण स्वाधीनता की मांग हो रही थी. क्रांतिकारियों की बढ़ती लोकप्रियता से घबरा कर मात्र छह महीने में कांग्रेस को अपनी मांग बदल कर सिर्फ डोमिनियन से पूर्ण स्वतंत्रता की मांग करनी पड़ी। अगर भारत वासी गांधी जी के अहिंसा और सत्याग्रह के भरोसे बैठे होते तो आज भी भारत में अंग्रेजों के खिलाफ अनशन चल रहे होते और आज भी भारत में ब्रिटिश शासन ही होता।

यह कहना कि गांधी जी के अहिंसावादी आन्दोलनों और स्वदेशी आन्दोलनों के चलते अंग्रेजों को भारत में राज करना बड़ा खर्चीला और घटे का सौदा लगने लगा, सिवाय एक ग़लतफ़हमी के और कुछ नहीं है।

महात्मा गांधी की निष्ठां और स्वाधीनता प्राप्ति के लिए उनके प्रयासों की ईमानदारी पर सवाल उठाना इस लेख का उद्देश्य नहीं है किन्तु सच्चाई यही है कि भारत को मिली आजादी की इबारत हमारे शहीदों के खून से लिखी गई थी। आखिर ऐसे ही तो नहीं कहा गया है कि “तलवारों की धारों पर जग की आजादी पलती है, इतिहास उधर चल देता है जिस और जवानी चलती है।”

ऐसे 5 भयानक युद्ध जिन्होंने भारत का इतिहास बदल कर रख दिया। खासकर पांचवें के बारे में आपने सुना भी न होगा

कहा जाता है कि शान्ति तलवार की धार पर उतर कर आती है और संसार का इतिहास और कुछ नहीं बल्कि युद्धों की गाथा है। वैसे तो भारत भूमि पर प्राचीन काल से आज तक अनेकों युद्ध लड़े गए लेकिन कुछ युद्ध या लड़ाइयां ऐसी हुई जिन्होंने आने वाले समय पर अपनी गहरी राजनीतिक छाप छोड़ी।  इस पोस्ट में आज आप पढ़ेंगे ऐसे 5 भयानक युद्ध जिन्होंने भारत का इतिहास बदल कर रख दिया:

कलिंग का युद्ध (261 ईसा पूर्व) – अशोक और कलिंग की सेना

ईरान से लेकर बर्मा तक फैले विशाल मौर्य साम्राज्य के सम्राट अशोक और स्वतन्त्रता प्रिय छोटी सी रियासत कलिंग (वर्तमान उड़ीसा) के बीच हुआ यह युद्ध अपनी आक्रामकता एवं भीषण नरसंहार के लिए प्रसिद्ध है। उपलब्ध जानकारी के आधार पर कलिंग की और से 60000 सिपाही की सेना लड़ाई के मैदान में थी, वहीँ मौर्य सेना में 1 लाख से अधिक सिपाही थे। साथ ही कलिंग आत्मसम्मान के इस युद्ध में आहुति देने के लिए हजारों की तादाद में सामान्य सशस्त्र नागरिक भी युद्ध में तैनात थे।

इस युद्ध में महा-नरसंहार हुआ, लगभग समस्त कलिंग सेना नेस्तनाबूद हुई और मौर्य सेना को भी विजय की भारी कीमत चुकानी पड़ी। युद्ध की विभीषिका देख कर सम्राट अशोक के ह्रदय-परिवर्तन के बाद बौद्ध धर्म स्वीकार कर लेने और भविष्य में युद्ध नहीं करने की प्रतिज्ञा विश्व-विदित है। लेकिन इस प्रतिज्ञा और भारत के सबसे शक्तिशाली सम्राट के बौद्ध धर्म ग्रहण कर अहिंसा के पथ पर चले जाने का प्रभाव भारत के इतिहास पर हमेशा के लिए लिखा गया। बौद्ध धर्म का प्रभाव बढ़ता गया और फिर एक समय संसार के सबसे आक्रामक साम्राज्य के अधिकाँश राजा अहिंसा पथ पर चल पड़े। परिणाम यह हुआ कि सैन्य बल में कम होते हुए भी विदेशी हमलावर अपनी आक्रमक रणनीति के बल पर यहां के राजाओं को परास्त करने में सफल रहे।

तराइन की दूसरी लड़ाई (1192) – पृथ्वीराज चौहान और मुहम्मद गौरी

सन 1191 तक भारत मुख्य रूप से हिन्दू राजपूत राजाओं के अनेक साम्राज्यों में बंटा हुआ था। इससे पहले कुछ पश्चिमी हमलावर यहाँ आये जरूर लेकिन वो भारत के पश्चिमी भू-भाग तक लूट-पाट करने तक सीमित रहे और वापस लौट गए।

सन 1191 में पहली बार अफगानिस्तान के गौर प्रान्त के मुहम्मद गौरी ने भारत पर आक्रमण किया। उसका मुकाबला दिल्ली के उत्तर-पश्चिम में स्थित तराइन के के मैदान में राजा पृथ्वीराज चौहान से हुआ। गौरी की हार हुई लेकिन अगले वर्ष वह फिर और ज्यादा तैयारी और सेना के साथ वापस लौटा।

सन 1192 के इस तराइन के युद्ध में अपनी आक्रामक घुड़सेना और रणनीति से उसने चौहान की भारी-भरकम सेना को हरा दिया।

पृथिवीराज चौहान इस लड़ाई में मारा गया। इस युद्ध के बाद भारत में राजपूत राजाओं के राज का धीरे-धीरे अंत हो गया।

भारत के इतिहास पर इस युद्ध से ज्यादा राजनीतिक-सामाजिक प्रभाव किसी और युद्ध का नहीं पड़ा। भारत में इस्लामिक शासन की शुरुआत इसी युद्ध से मानी जा सकती है।

पानीपत का युद्ध (1526) – बाबर और इब्राहिम लोदी

उस समय दिल्ली पर लोदी सल्तनत के इब्राहिम लोदी का राज था। दिल्ली के पास स्थित पानीपत में काबुल के शासक बाबर और इब्राहिम लोदी की सेनाओं के बीच भयंकर युद्ध हुआ। लोदी की सेना संख्या में अधिक और ज्यादा शक्तिशाली थी किन्तु उस समय के सामरिक हथियारों से कहीं उन्नत हथियार – अपनी 24 तोपों – के दम पर बाबर ने लोदी की सेना को हरा दिया और इस लड़ाई में इब्राहिम लोदी की मौत हुई। इस प्रकार संसार के सबसे शक्तिशाली और लम्बे समय तक चलने वाले साम्राज्यों में से एक – मुग़ल शासन – की भारत में स्थापना हुई।

मुग़ल शासन ने भारत के राजनीतिक, आर्थिक एवं सामजिक इतिहास को हमेशा के लिए बदल कर रख दिया। आज जो भारत, विशेषकर उत्तर भारत, का ताना – बाना है, उसकी नींव मुग़ल शासन की स्थापना के साथ ही रख दी गई थी।

प्लासी का युद्ध (1757) – लार्ड क्लाइव और नवाब सिराजुद्दौला

प्लासी की लड़ाई ने भारत में अंग्रेजों के पांव मजबूती से जमा दिए। लार्ड क्लाइव के नेतृत्व में ब्रिटिश ईस्ट इंडिया कंपनी की सेना ने नवाब सिराजुद्दौला की सेना को प्लासी की लड़ाई में पूरी तरह से तहस-नहस कर के बंगाल में ब्रिटिश शासन स्थापित कर दिया।

उस समय भारत में फ्रांसीसियों और अंग्रेजों के बीच व्यापारिक और भविष्य के सामरिक आधिपत्य को लेकर संघर्ष चल रहा था। सिराज-उद -दौला फ्रांसीसियों के समर्थन में था। सन 1756 में उसने अंग्रेजों के कलकत्ता स्थित व्यापार केंद्र पर हमला कर वहां मौजूद ब्रिटिश फ़ौज का नर-संहार कर दिया था।

प्लासी की लड़ाई में में मीर जाफर ने सिराजुद्दौला से गद्दारी कर ब्रिटिश फौजों का साथ दिया। इस लड़ाई के बाद कुछ समय बंगाल की कमान मीर जफ़र के हाथ रही किन्तु अंग्रेजों को चस्का लग चूका था और जल्दी ही उन्होंने वहां का शासन अपने हाथ में लेकर खुद ही बंगाल में राज करना आरम्भ कर दिया। यहाँ से कमाई हुई दौलत के बल उन्होंने अपनी सेना को और मजबूत किया और धीरे धीरे पूरे भारत में अपने साम्राज्य की स्थापना कर डाली।

कोहिमा का युद्ध (1944) – इंग्लैंड (ब्रिटेन) और जापान

कोहिमा भारत में बर्मा की सीमा के निकट नागालैंड में स्थित है। कोहिमा का यह युद्ध इतिहास में “पूरब के स्टालिनग्राद‘ के नाम से प्रसिद्ध है। यहां पर मिली पराजय द्वितीय विश्व-युद्ध के दौरान जापानी फौजों को मिलने वाली सबसे महत्वपूर्ण शिकस्त थी जिसने भारतीय उपमहाद्वीप और संभवतया सारे संसार में जापानियों को बढ़ने से रोक दिया।

बर्मा पर जापानियों का आधिपत्य था जिन्होंने भारत में आधिपत्य की महत्वाकांक्षी योजना बनाई ताकि यहाँ सम्पदा का इस्तेमाल युद्ध में किया जा सके और अंग्रेजों की ताकत को कमजोर किया जा सके क्यूंकि अंग्रेज भी उस समय सेना और संसाधनों के लिए भारत पर ही निर्भर थे।

खैर, इस भयानक युद्ध में जापानियों की हार हुई और भारत का इतिहास नए सिरे से लिखते-लिखते रह गया। यदि भारत या इसके बड़े भू-भाग पर जापानी अपना कब्ज़ा ज़माने में कामयाब हो जाते तो यह मित्र देशों के लिए बड़ा सामरिक नुक्सान होता। साथ ही भारत का इतिहास भी हमेशा के लिए बदल जाता क्यूंकि संभव है कि मात्र तीन वर्ष बाद भारत को मिलने वाली स्वतंत्रता जापानी शासन के तले संभव न हो पाती।