राष्‍ट्रपति कोविंद – ‘न्यू इंडिया’ में गरीबी के लिए कोई गुंजाइश नहीं है

दिल्ली: देश के नव-निर्वाचित राष्ट्रपति रामनाथ कोविंद ने 71वें स्वतंत्रता दिवस की पूर्व संध्या पर देश को संबोधित किया. राष्ट्रपति श्री रामनाथ कोविंद का राष्ट्र के नाम यह पहला संबोधन था. अपने संबोधन में राष्ट्रपति रामनाथ कोविंद ने आजादी के इतिहास के संघर्ष को याद करते हुए ‘न्यू इंडिया’ के विजन को देश के नागरिकों के सामने रखा. राष्ट्रपति ने कहा कि 2022 में हमारा देश अपनी आजादी के 75 साल पूरे करेगा, तब तक ‘न्यू इंडिया’ के लिए के लक्ष्यों को प्राप्त करने का हमारा ‘राष्ट्रीय संकल्प’ है.

president kovind no place for poverty in new india राष्ट्रपति के भाषण के मुख्य अंश :

– देश को ‘खुले में शौच से मुक्त’ कराना – हममें से हर एक की जिम्मेदारी है.
– रोजमर्रा की जिंदगी में भ्रष्टाचार समाप्त करना हम सभी की जिम्मेदारी है.
– जीएसटी को अपने हर काम-काज और लेन-देन में शामिल करना तथा टैक्स देने में गर्व महसूस करने की भावना को प्रसारित करना हम सभी की जिम्मेदारी है.
– न्यू इंडिया’ का मतलब हर परिवार के लिए घर, मांग के मुताबिक बिजली, बेहतर सड़कें और संचार के माध्यम, आधुनिक रेल नेटवर्क, तेज और सतत विकास.
– ‘न्यू इंडिया’ एक ऐसा समाज हो जो भविष्य की ओर तेजी से बढ़ने के साथ-साथ, संवेदनशील भी हो
– ‘न्यू इंडिया’ का मतलब है कि हम जहां पर खड़े हैं वहां से आगे जाएं. तभी हम ऐसे ‘न्यू इंडिया’ का निर्माण कर पाएंगे जिस पर हम सब गर्व कर सकें.
– इस ‘न्यू इंडिया’ में हर व्यक्ति की पूरी क्षमता उजागर हो सके और वह समाज और राष्ट्र के लिए अपना योगदान कर सके. ‘न्यू इंडिया’ में गरीबी के लिए कोई गुंजाइश नहीं है.
– नोटबंदी के बाद से देश में ईमानदारी की प्रवृत्ति को बढ़ावा मिला है. ईमानदारी की भावना दिन-प्रतिदिन और मजबूत हो, इसके लिए हमें लगातार प्रयास करते रहना होगा.
– मैं सब्सिडी का त्याग करने वाले ऐसे परिवारों को नमन करता हूं. हमें ऐसे परिवारों से प्रेरणा लेनी चाहिए.

Nari Shiksha ka mahatva Essay in Hindi – नारी शिक्षा का महत्व पर निबंध

नारी के विषयों में हमारे विद्वानों और विचारकों ने अलग अलग विचार प्रस्तुत किए हैं। गोस्वामी तुलसीदान ने नारी के अन्तर्गत बहुत प्रकार के दोषों की गणना की थी। गोस्वामी तुलसीदास द्वारा कहा गया नारी का सद्चरित्र और उज्जवल चरित्र का उदघाटन नहीं करता है, अपितु इससे नारी के दुष्चरित्र पर ही प्रकाश पड़ता है। गोस्वामी तुलसीदास ने साफ साफ कहा था कि नारी में आठ अवगुण सदैव रहते हैं। उसमें साहस, चपलता, झूठापन, माया, भय, अविवेक, अपवित्रता और कठोरता खूब भरी होती है। चाहे कोई भी नारी क्यों न होये-

Nari Shiksha ka mahatva Essay in Hindi - नारी शिक्षा का महत्व पर निबंध साहस, अनृत, चपलता, माया।
भय, अविवेक, असौच, अदाया।।

इसीलिए तुलसीदास ने नारी को पीटने के लिए कहा-

ढोल, गंवार, शुद्र, पशु, नारी।
सकल ताड़ना के अधिकारी।।

अगर तुलसीदास ने मनुस्मृति की उस शिक्षा पर ध्यान दिया होता, तो वे ऐसी कठारे वाणी का प्रयोग न करते। मनु महाराज संसार के सच्चे चिन्तक थे। इसलिए उन्होंने मानवता को सबसे पहले महत्व और स्थान दिया था। नारी को ऋद्धापूर्वक देखते हुए उसे देवी के रूप में मान्यता प्रदान की थी-

यत्र नार्यस्तु पूज्यन्ते, रमन्ते तत्र देवताः।

अर्थात् जहाँ नारी की पूजा होती है, वहाँ देवगण निवास करते हैं। इसी से प्रभावित होकर कविवर जयशंकर प्रसाद ने कहा था-

नारी! तुम केवल श्रद्धा हो, विश्वास रजत नग पगतल में।
पीयूष स्रोत सी बहा करो, जीवन के सुन्दर समतल में।।

इतना होने पर भी नारी के प्रति अन्याय और शोषण कार्य चलता रहा, जिसे देख करके महान राष्ट्रकवि मैथिलीशरण गुप्त ने कहा-

अबला जीवन हाय तुम्हारी यही कहानी।
आँचल में है दूध और आँखों में पानी।।

नारी के प्रति उपेक्षा का क्या कारण रहा? इसके उत्तर में हम यह कह सकते हैं कि हमने अपने शास्त्र, अपनी संस्कृति सभ्यता आदि को एकदम भुल दिया और अन्धानुकरण से हमने काम लिया। हमने नारी के गुणों को पहचानने की कोशिश नहीं की। हमने यह समझा कि नारी एक परम मित्र और मंत्रणा की प्रतिमूर्ति है। वह पति के लिए दासी के समान सच्ची सेवा करने वाली है। माता के समान जीवन देने वाली अर्थात् रक्षा करने वाली है। रमण करने के लिए पत्नी है। धर्म के अनुकूल कार्य करने वाली है। पृथ्वी के समान क्षमाशील है।

आज के युग में नारी कितनी सुशील और शिष्ट क्यों न हो, अगर वह शिक्षित नहीं है, तो उसका व्यक्तित्व बड़ा नहीं हो सकता है, क्योंकि आज का युग प्राचीन काल को बहुत पीछे छोड़ चुका है। आज नारी पर्दा और लज्जा की दीवारों से बाहर आ चुकी है, वह पर्दा प्रथा से बहुत दूर निकल चुकी है। इसलिए आज इस शिक्षा युग में अगर नारी शिक्षित नहीं है, तो उसका इस युग से कोई तालमेल नहीं हो सकता है। ऐसा न होने से वह महत्वहीन समझी जायेंगी और इस तरह समाज से उपेक्षा का पात्र बन जाएगी। इसलिए आज नारी को शिक्षित करने की तीव्र आश्वयकता को समझकर इस पर ध्यान दिया जा रहा है।

नारी शिक्षा का महत्व निर्विवाद रूप से मान्य है। यह बिना किसी तर्क या विचार विमर्श के ही स्वीकार करने योग्य है, क्योंकि नारी शिक्षा के परिणामस्वरूप ही पुरूष के समान आदर और सम्मान का पात्र समझी जाती है। यह तर्क किया जा सकता है कि प्राचीनकाल में नारी शिक्षित नहीं होती थी। वह गृहस्थी के कार्यों में दक्ष होती हुई पतिपरायण और महान पतिव्रता होती थी। इसी योग्यता के फलस्वरूप वह समाज से प्रतिष्ठित होती हुई देवी के समान श्रद्धा और विश्वास के रूप में देखी जाती थी, लेकिन हमें यह सोचना विचारना चाहिए कि तब के समय में नारी शिक्षा की कोई आश्वयकता न थी। तब नारी नर की अनुगामिनी होती थी। यही उसकी योग्यता थी, जबकि आज की नारी की योग्यता शिक्षित होना है।

आज का युग शिक्षा के प्रचार प्रसार से पूर्ण विज्ञान का युग है। आज अशिक्षित होना एक महान अपराध है। शिक्षा के द्वारा ही पुरूष किसी भी क्षेत्र में जैसे प्रवेश करते हैं, वैसे नारी भी शिक्षा से सम्पन्न होकर जीवन के किसी भी क्षेत्र में प्रवेश करके अपनी योग्यता और प्रतिभा का परिचय दे रही है।

शिक्षित नारी में आज पुरूष की शक्ति और पुरूष का वही अद्भुत तेज दिखाई पड़ता है। शिक्षित नारी जब घर की चारदीवारी से निकल समाज मे समानाधिकार को प्राप्त कर रही है। वह अपनी प्रतिभा और शक्ति से कहीं कहीं महत्वपूर्ण और प्रभावशाली दिखाई देती है। नारी शिक्षित होने के फलस्वरूप आज समाज के एक से एक ऐसे बड़े उत्तरदायित्व का निर्वाह कर रही है, जो पुरूष भी नहीं कर सकता। शिक्षित नारी आजकल के सभी क्षेत्रों में पदार्पण कर चुकी है। वह एक महान् नेता, समाज सेविका, चिकित्सक, निदेशक, वकील, अध्यापिका, मन्त्री, प्रधानमंत्री आदि महान पदों पर कुशलतापूर्वक कार्य करके अपनी अद्भुत क्षमता को दिखा रही है। महत्वपूर्ण बात यह है कि वह इन पदों की कठिनाइयों का सामना करती हुई भी अपनी प्रतिभा का परिचय देती है और अपनी दिलेरी को दिखा रही है।

शिक्षित नारी में आत्म निर्भरता का गुण उत्पन्न होता है। वह स्वावलम्ब के गुणों से युक्त होकर पुरूष को चुनौती देती है। अपने स्वावलम्बन के गुणों के कारण ही नारी पुरूष की दासी या अधीन नहीं रहती है, अपितु वह पुरूष के समान ही स्वतंत्र और स्वछन्द होती है। शिक्षित होने के कारण ही आज नारी समाज में पूर्णरूप से सुरक्षित है। शिक्षित नारी आज के समाज का अत्याचार नहीं सहती है या आज समाज नारी पर कोई अत्याचार नहीं करता है। शिक्षित नारी के प्रति ब्याज दहेज का कोई शोषण चक्र नहीं चलता है। शिक्षित नारी को आज सती प्रथा का कोई कोप नहीं सहना पड़ता है। शिक्षा के कारण ही आज वह न केवल पुरूष से ही नहीं, अपितु समाज से भी मंडित और समादूत है।

(Nari shiksha ka mahatva nibandh 1000 words)

कांवड़ यात्रा पर किच – किच क्यों ? तारकेश कुमार ओझा

बचपन के दिनों में श्रावण के महीने में  अपने शहर के नजदीक से बहने वाली नदी से जल भर कर प्राचीन शिव मंदिर में बाबा भोलेनाथ का जलाभिषेक किया करता था। कुछ बड़े होने पर शिवधाम के तौर पर जेहन में बस दो ही नाम उभरते थे। मेरे गृहप्रदेश पश्चिम बंगाल का प्रसिद्ध तारकेश्वर और पड़ोसी राज्य में स्थित बाबा वैद्यनाथ धाम। बाबा तारकनाथ की महिमा पर इसी नाम से बनी बांग्ला फिल्म ने मेरे राज्य में हजारों ऐसे लोगों को भी कांवड़ लेकर तारकेश्वर जाने को प्रेरित किया जो तकलीफों का ख्याल कर पहले इससे कतराते थे। बाबा वैद्यनाथ धाम की यात्रा को ज्यादा महत्व इसी कथानक पर बनी फिल्म से मिला जिसमें प्रख्यात फिल्म अभिनेता स्व. सुनील दत्त ने डाकू का यादगार किरदार निभाया था।

Kanvad Yatraहालांकि बाबा बैद्यानाथ धाम जाने का अवसर मुझे कभी नहीं मिल पाया। अलबत्ता एक दशक पहले तक हर सावन में तारकेश्वर तक की कांवड़ यात्रा जरूर कर लेता था। पिछली अंतिम यात्राओं में बाबा तारकनाथ धाम जाने वाले रास्तों पर अनेक बहुराष्ट्रीय कंपनियों के उत्पाद का प्रचार करते बैनरों व पोस्टरों को देख कर मुझे इस बात का आभास हो गया था कि राजनीति और बाजार की पैनी नजर अब कांवड़ यात्रा पर भी पड़ चुकी है।

इसके बाद तो हर साल किसी न किसी बहाने कांवड़ यात्रा पर राजनीतिक विवाद और बयानबाजी सुनी ही जाती रही है। कभी हुड़दंग तो कभी डीजे बजाने को लेकर विवाद का बवंडर हर साल सावन से पहले ही शुरू हो जाता है।

निस्संदेह कांवड़ यात्रा में अगंभीर किस्म के भक्तों के अस्तित्व से इन्कार नहीं किया जा सकता जो महज मौज – मजे के लिए ऐसी यात्राएं करते हों। लेकिन विगत वर्ष संसद में एक माननीय का यह कथन कि केवल बेरोजगार लोग कांवड़ यात्रा करते हैं , मुझे काफी उद्वेलित किया। क्योंकि कांवड़ यात्रा का मेरा लंबा अनुभव रहा है। बचपन से लेकर युवावस्था तक मैने  बाबा तारकनाथ धाम की कांवड़  यात्रा पर निकलने वाले भक्तों में अधिकांश को श्रद्धा व भक्ति से ओत – प्रोत पाया है। मेरा निजी अनुभव है कि सावन की कांवड़ यात्रा छोटे – बड़े औऱ अमीर – गरीब के भेद को मिटाने का कार्य बखूबी करती आई है।

पिछले अनुभवों के आधार पर कह सकता हूं कि कांवड़ यात्रा में मैने अनेक धनकुबेरों को देखा जो शायद ही कभी अपने पैर जमीन पर रखते हों। लेकिन वे भी श्रद्धापूर्वक बोल बम के जयकारे के साथ भगवान शिव के जलाभिषेक को जा रहे हैं। रास्ते में संन्यासी की तरह दूसरों के साथ मिल – बैठ कर कुछ भी खा – पी रहे हैं या अन्यान्य कांवड़ियों के साथ रास्ते में बनने वाले अस्थायी शिविरों में आराम कर रहे हैं।

बेशक कांवड़ यात्रा में ज्यादा तादाद गरीब  और निम्न मध्य वर्गीय लोगों की ही होती थी जिनकी जिंदगी में तीर्थ या सैर – सपाटे के लिए कोई स्थान नहीं है। यह कांवड़ यात्रा उन्हें श्रद्धा – भक्ति के साथ संक्षिप्त तीर्थयात्रा का आभास कराती थी। पूरे रास्ते मानो कांवड़िये का भगवान शिव से मौन संवाद चल रहा हो। क्योंकि हर भक्त के होठों पर बुदबुदाहट साफ नजर आती थी। कांवड़ यात्रा पर विवाद य़ा राजनीति के लिए तब कोई स्थान ही नहीं था। बाबा धाम को जाने वाले रास्तों पर जो कुछ अस्थायी कैंप बनते थे उन्हें असीम श्रद्धा – भक्ति व समर्पण वाले भक्त आयोजित करते थे। जिनके लिए कांवड़ियों की सेवा – सुश्रुषा से बड़ा पुण्य अर्जन का कोई माध्यम नहीं हो सकता था। जो मिट्टी और कीचड़ से सने कांवड़ियों के पैरों को सहलाने को आतुर रहते थे। ताकि वे थोड़े सुस्ता कर आगे बढ़ सके।

शिविरों के सामने रास्ते पर ही वे हाथों में चाय – शिंकजी का गिलास थामे खड़े रहते । जिससे कोई कांवड़िया संकोच के चलते इसे स्वीकार करने से वंचित न रह जाए। घने अंधकार में आयोजक रोशनी का प्रबंध करते जिससे कांवड़ियों को रास्ता देखने में किसी प्रकार की परेशानी न हो। राजनैतिक लाभ की मंशा में किसी से ऐसी उम्मीद नहीं की जा सकती । हर शिविर के पास एक दानबॉक्स रखा होता था। जिसने श्रद्धापूर्वक कुछ डाल दिया तो डाल दिया ।

तब सोचा भी नहीं जा सकता था कि यह धार्मिक यात्रा कभी राजनैतिक वाद – विवाद का हथियार बन जाएगी।

बारिश – देवेंद्र आर्य की भीगी हुई कविता

बारिश

ढंक दो
पानी भींग रहा है बारिश में
ठंड न लग जाए ।

देवेंद्र आर्य की एक भीगी हुई कविता बरस रहे हैं पेड़ हज़ारों पत्तों से
भींग रही है हवा झमाझम खोले केश
छींक न आए ।

निर्वसन नदी तट से दुबकी दुबकी लगती
बादल अपनी ओट में लेके चूम रहा है बांह कसे ।

चोट सह रही हैं पंखुरियां
पड़ पड़ पड़ पड़ बूंदों की
अमजद खां के स्वर महीन संतूरों पर
जाकिर के तबलों की थापें
बारिश है ले रही अलापें बीच बीच में भीमसेन सी

गंध बेचारी भींग न जाए इस बारिश में ।

बहुत दिनों के बाद खेलतीं बैट-बाल
गलियां सड़कों पर उतर आई हैं
तड़ तड़ तड़ तड़ बज उठती बूंदों की ताली

बिजली चमकी
या चमका है सचिन का बल्ला
या गिर गया सरक के पल्ला स्वर्ण कलश से
बोल रही है देह निबोली भीगी भीगी
सिहर उठे मौसम के सपने

ढंक दो ,
यह काला चमकीलापन शब्दों का
खुरच न जाए इस बारिश में ।

* देवेंद्र आर्य

 

योगी राज में कितना बदला उत्तर प्रदेश ? – तारकेश कुमार ओझा

यह विचित्र संयोग रहा कि सात साल बाद विगत मार्च में जब मेरा देश के सबसे बड़े सूबे उत्तर प्रदेश में जाना हुआ तब राज्य में विधानसभा के चुनाव अपने अंतिम चरण में थे, और इस बार जुलाई के प्रथम दिनों में ही फिर प्रदेश जाने का संयोग बना तब देश के दूसरे प्रदेशों की तरह ही यूपी  में भी राष्ट्रपति चुनाव की खासी गहमागहमी चल रही थी। निश्चय ही किसी भी सरकार के काम – काज का आकलन दिनों के आधार पर नहीं किया जा सकता। लेकिन मन में असीम जिज्ञासा यह जानने की रही कि देखें तेज तर्रार मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ के राज में उत्तर प्रदेश कितना बदला है।

yogi uttar pradesh cmनितांत निजी प्रयोजन से पश्चिम बंगाल से उत्तर प्रदेश के प्रतापगढ़ के लिए यात्रा शुरू करते ही रेल रोको आंदोलन के चलते ट्रेन के पूरे छह घंटे विलंब से चलने की पीड़ा दूसरे सैकड़ों यात्रियों के साथ मुझे भी झेलनी पड़ी। प्रतापगढ़ स्टेशन से बाहर निकलते ही मेरी जिज्ञासा जोर मारने लगी। सड़कों की स्थिति परिवर्तन का अहसास करा रही थी। अपने गांव जाते समय कुछ वैकल्पिक मार्गों का पता चला जिससे ग्रामांचलों की दूरियां काफी सीमित हो जाने से लोग राहत की सांस ले रहे थे। बातचीत में कुछ पुलों का जिक्र भी आया जिनकी वजह से ग्रामांचलों में आवागमन सुविधाजनक हो गया था। सबसे बड़ा मसला विधि – व्यवस्था का था। लेकिन इस सवाल पर हर कोई मुस्कान के साथ चुप्पी साध लेता। इसके स्थान पर कुछ कद्दावर भाजपा नेताओं की आपसी कलह की चर्चा शुरू हो जाती। जो मेरे जिले से राज्य सरकार में मंत्री थे। नेताओं के आपसी टकराव की चर्चा लोग चटखारे लेकर कर रहे थे। बिजली के सवाल पर हर किसी से यही सुनने को मिला कि ग्रामांचलों में भी स्थिति कुछ सुधरी है। अनियमित ही सही लेकिन निर्धारित 12 घंटे के बजाय अब लोगों को अधिक बिजली मिल रही है।

दूसरे दिन बस्ती जाने के क्रम में मुझे इस बात से काफी खुशी हुई कि मेरे गंतव्य तक जाने वाला राजमार्ग अमेठी, सुल्तानपुर फैजाबाद व अयोध्या जैसे शहरों से होकर गुजरेगा । राजनैतिक – ऐतिहासिक घटनाओं के चलते मैं जिनकी चर्चा अरसे से सुनता आ रहा हूं। अपने गांव बेलखरनाथ से गंतव्य के लिए निकलते ही गाड़ी दीवानगंज बाजार पहुंची तो बाजार में बेहिसाब जल- जमाव व गंदगी के बीच सड़क के बिखरे अस्थि – पंजर ने अनायास ही मेरे मुंह से सवाल उछाल दिया कि परिवर्तन के बावजूद यह क्यों…। जवाब मिला … यही यहां का चलन है। मेरे यह पूछने पर कि यहां कोई नगरपालिका या पंचायत प्रतिनिधि तो होंगे । क्या उनके संज्ञान में यह सब नहीं है। फीकी मुस्कान के साथ जवाब मिला जब जिला मुख्यालयों में ऐसी ही हालत है तो गांव – जवार की कौन पूछे।

गाड़ी आगे बढ़ी औऱ अमेठी के रास्ते गोरखपुर जाने वाले राजमार्ग की ओर बढ़ने लगी। बेखटके चल रही गाड़ी ने अहसास करा दिया कि उत्तर प्रदेश में भी प्रमुख सड़कों की हालत में काफी सुधार आ गया है। हालांकि इस आधार पर कतई इस निष्कर्ष पर नहीं पहुंचा जा सकता था कि गांव – कस्बों की सड़कें सचमुच गड्ढा मुक्त हो पाई है या नहीं। अनेक गांव – कस्बों व जिला मुख्यालयों से होते हुए हम अपने गंतव्य की ओर बढ़ रहे थे। हालांकि मेरे अंदर सबसे ज्यादा कौतूहल परिवर्तन की सरकार में पुलिस तत्परता का अनुभव करने की थी। क्योंकि कानून – व्यवस्था में सुधार के  हर सवाल पर स्थानीय निवासी फीकी मुस्कान के साथ चुप्पी साध लेते थे।

अयोध्या से आगे बढ़ते ही बस्ती जिले के प्रवेश द्वार पर एक हादसे के चलते राजमार्ग पर बेहिसाब जाम लग गया था। ट्रक ने सेना के एंबुलेंस को ठोकर मार दी थी। हादसे में किसी की मौत तो नहीं हुई थी। लेकिन हादसे के चलते वाहनों का आगे बढ़ पाना मुश्किल हो रहा था। बढ़ते उमस के बीच इस परिस्थिति ने मेरी बेचैनी बढ़ानी शुरू कर दी। तभी लगा शायद इसी बहाने पुलिसिया तत्परता से दो – चार होने का मौका मिल जाए। अपेक्षा के अनुरूप ही थोड़ी देर में सायरन बजाते पुलिस के दो वाहन मौके की ओर जाते दिखाई दिए। कुछ देर में जाम खुल जाने से मैने राहत की सांस ली। वापसी यात्रा में निकट संबंधी के यहां भुपियामऊ गया, तो वहां निर्माणाधीन विशाल पुल ने मुझे फिर  कभी गांव से नजर आने वाले इस इलाके में  परिवर्तन का आभास कराया। भले ही इसकी नींव बहुत पहले रखी गई हो।

वापसी की ट्रेन हमें इलाहाबाद से पकड़नी थी। देर शाम तकरीबन साढ़े आठ बजे हमें प्रतापगढ़ से मनवर संगम एक्सप्रेस मिली। रवाना होते ही ट्रेन की बढ़िया स्पीड ने इस रुट पर कच्छप गति से चलने वाली ट्रेनों की मेरी पुरानी अवधारणा को गलत साबित कर दिया। लेकिन जल्दी ही ट्रेन पुरानी स्थिति में लौट आई और जगह – जगह रुकने लगी। फाफामऊ स्टेशन पर यह ट्रेन देर तक रुकी रही। जिसके चलते असंख्य यात्रियों को रेलवे लाइन पार करने का जोखिम उठाते हुए पहले जाने वाली दूसरी ट्रेनों में चढ़ना पड़ा। इलाहाबाद से हमें आनंदविहार – सांतरागाछी साप्ताहिक सुपर फास्ट ट्रेन पकड़ना था। लेकिन यह ट्रेन धीरे – धीरे पांच घंटे विलंबित हो गई। जिससे यात्रा की शुरूआत की तरह ही मेरी वापसी यात्रा का सगुन भी बिगड़ चुका था। ट्रेन के आने के बाबत रेल महकमे की भारी लापरवाही झेलता हुआ मैं परिवार सहित तड़के इस ट्रेन में सवार होकर अपने शहर को लौट सका।

  • तारकेश कुमार ओझा

उप-संपादक, दैनिक जागरण, खड़गपुर, पश्चिम बंगाल।

इतिहास क्या है ? गड़े मुर्दे उखाड़ना ! – राजेन्द्र रंजन चतुर्वेदी

इतिहास क्या है ? गड़े मुर्दे उखाड़ना ।
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मैं भी इंटरमीडियेट में इतिहास का विद्यार्थी था ।

जब मैंने इतिहास विषय लिया ,

तब मेरे दूसरे-दूसरे विषयों का विकल्प चुनने वाले सहपाठी

मुझसे कहते थे कि >> इतिहास क्या है ? गड़े मुर्दे उखाड़ना ।

आज सोचता हूं कि वे कितना सच कहते थे !

मैं देख रहा हूं कि विद्वान लोग इतिहास के सत्य को

लोक की आस्था से बड़ा सत्य समझ रहे हैं !

लोकजीवन के क्रमविकास को जानना अत्यन्त आवश्यक है
और इसके लिये हमें इतिहास का महत्त्व जानना होगा किन्तु

इतिहास का सच तो किताबों में है ,
गड़े मुर्दे उखाड़ना जैसा ,

उसमें भी इतने मत-मतान्तर हैं कि पूरा मायाजाल है ,
जिसमें से कोई निर्विवाद सच लेकर निकल पाना लगभग असंभव सा ही है ।

और लोक-आस्था का सत्य
लोकजीवन में जीवित है!

सिक्यूलर तो मैं भी हूं क्योंकि
लोकवार्ता सिक्यूलर है ।

किन्तु ऐसे सिक्यूलर का क्या करूं
जो सामान्यजन,समष्टिजन ,
सर्वजन और जीवन की अविच्छिन्न-परंपरा की अनदेखी करता हो ?

राजेन्द्र रंजन चतुर्वेदी

FBVARTA – हिन्दीवार्ता के इस पन्ने पर हम फेसबुक की दुनिया में लिखे जा रहे ऐसे उत्तम लेखों और रचनाओं से आपको रूबरू करवा रहे हैं जो आम पाठकों तक कई बार नहीं पहुँच पाते बावजूद इसके कि इन लेखों और रचनाओं के लेखकों के राजनीतिक, सामाजिक और साहित्यिक सरोकार बहुत उम्दा स्तर के हैं.

सुनो जोगी, मैं तुम्हें माँ की तरह याद करती हूँ – संध्या नवोदिता

सुनो जोगी
मैं तुम्हें माँ की तरह याद करती हूँ

माँ जो गई सितारों में
और तुम हुए जैसे धरती का सितारा
क्या कहूँ कि एक ऐसी तुम्हारी बस्ती है इस जमीन की
जहाँ कोई घोड़ा, तांगा, जहाज नहीं जाता
कोई रेल नहीं जाती तुम तक
कोई पगडण्डी, कोई शाहराह

सिर्फ एक विराट व्याकुलता है
जो सीधे तुम्हारे नगर को जाती है
तुम्हारा घर निगाहों की ज़द में नहीं
पर मेरा हृदय वहीं छूट गया है

खुशियों का शहर एक स्वप्न हुआ
और तुम हुए स्वप्न के सारथी
जाने कहाँ गुम हुए
कि मेरा शानदार जीवन रथ ठहर गया

सुनो जोगी
वो सात समुद्र तट मिलकर पुकारते हैं
ऊंचे स्वर में तुम्हारा नाम
सुवर्णरेखा के मैंगरूवों में तुम्हारी छाया आज भी दीखती है
तुम अब भी तैर रहे हो उड़ीसा के बैकवाटर में

धरती की वो अंतिम सात पनीली दीवारें
रेत पर उगते, गायब होते सुर्ख फूल
तुम्हारे हाथों से बिखरी ज़िन्दा सीपियाँ
तुम्हारी खुशी का उन्मत्त जवाब देते ज्वार

मेरा आसमान तुम्हारी लाखों चहलकदमियों का गवाह है

सुनो जोगी
माना कि अंतिम यात्रा पूर्ण हुई
पर ऐसे कोई किसी को नहीं भूलता
हम तो मृतकों तक को हर बरसी पर
धरती पे ले आते हैं जिमाने

सुनो जोगी
याद एक ज़िन्दा शगल है
और मैं तुम्हें माँ की तरह अथाह बेचैनी से सुमिरती हूँ।

–संध्या नवोदिता

वे नफरत के व्यापारी हैं – Mahesh Katare Sugam

वे नफरत के व्यापारी हैं साज़िश के पापड़ बेलेंगे
वे जितनी गोली दागेंगे हम उतने नाटक खेलेंगे

हैं दिल में बेहद डरे हुए काले कानूनों के निर्माता
वे जितना हमको रोकेंगे हम उतने ज़्यादा फैलेंगे

उनके हाथों में बन्दूकें उनकी फितरत में हिंसा है
हम कब तक चुप रह पाएंगे हम कब तक उनको झेलेंगे

अब गोलबन्द होना होगा करना होगा प्रतिरोध हमें
जो ताकत हमने दी उनको वो ताकत वापस ले लेंगे

हम ऐसे ही चुपचाप रहे तो नंगे होकर नाचेंगे
”सुगम”सोच लो ज़ुल्मों के वे डंड यहीं पर पेलेंगे

जीवन को वरदान बना दो – आशीष श्रीवास्तव की कविता

।।जीवन को वरदान बना दो।।

CEREBRAL PALSI AFFECTED CHILDमस्तिष्क पक्षाघात से जूझ रहा हूँ
छोटा-सा सवाल पूछ रहा हूं ?

क्यों नहीं हो सकता मुझपे खर्च
वैज्ञानिक क्यों नहीं करते रिसर्च।

रोबोट में तो डाल रहे संवेदना
समझ नहीं रहा कोई मेरी वेदना।

क्यों रहूं मैं किसी पर निर्भर
मैं भी होना चाहता हूं आत्मनिर्भर।

अंतरिक्ष के रहस्य जानना चाहता हूं
मैं भी इंसान होना चाहता हूं ।

कई रोगों का तो मिटा दिया धब्बा
मैं थामे हूं अब भी दवाईयों का डब्बा।

क्या कमाल नहीं, तुमने दिखला दिए
आविष्कारों से उजियारे ला दिए।

देखना बुझे न विश्वास के दीये
मैं भी खुशियां के जलाऊं दीये।

अरे क्यों आपस में लड़ते हो
किससे होड़कर जलते हो।

लड़ना ही है तो निःशक्तता से लड़ो
सच्चे इंसान बन आगे बढ़ो।

बस एक ही सवाल मुझे है सालता
कब दूर होगी दुनिया से विकलांगता।

जीवन को वरदान बना दो
मुझको भी हंसना सिखा दो।

हे महान वैज्ञानिक! तुम सुन लो मेरी बात
इस धरा से समाप्त कर दो मस्तिष्क पक्षाघात

उचित इलाज के अभाव में हो न किसी पे आघात
इस दुनिया से दूर भगा दो मस्तिष्क पक्षाघात

मस्तिष्क पक्षाघात यानी सेरेब्रल पाल्सी : ऐसे बच्चे जो जन्म के समय नहीं रोते या जिन्हें पर्याप्त ऑक्सीजन नहीं मिल पाती, वे बहुविकलांगता का शिकार होकर बाकी की जिंदगी रेंगते हुए अथवा दूसरे के सहारे जीने को विवश होते हैं। इन बच्चों की आयु कम होती है, लेकिन इनकी संख्या कहीं अधिक है।

– आशीष श्रीवास्तव
पटकथा लेखक, मध्यप्रदेश

भारत दक्षिण अफ्रीका मैच में विजय माल्या को देख दर्शकों ने लगाए चोर चोर के नारे

लंदन: आज भगोड़े उद्योगपति विजय माल्या को अपनी करतूतों के लिए शर्मसार होना पड़ा. भारतीय बैंकों की ९००० करोड़ से भी ज्यादा रकम डकार कर भारत से भागकर ब्रिटैन में रह रहे शराब कारोबारी विजय माल्या को आज का दिन कभी नहीं भूलेगा. भारत और दक्षिण अफ्रीका के बीच चैंपियंस ट्रॉफी का मैच देखने आये विजय माल्या को दर्शकों की जबरदस्त हूटिंग का सामना करना पड़ा. भारतीय मूल के दर्शकों जम कर “चोर-चोर” के नारे लगाए और विजय माल्या मुंह छिपा कर वहां से निकलने के अलावा कुछ नहीं कर पाए.

vijay mallya booed in india south africa match chor thiefआज जब दक्षिण अफ्रीका के खिलाफ आईसीसी चैंपियंस ट्रॉफी मैच देखने के लिये ओवल स्टेडियम में पहुंचे तो भारतीय प्रशंसकों ने उनकी जमकर हूटिंग की. दरअसल ऐसा नहीं लगता कि विराट माल्या अपने ऊपर लगे भगोड़े और क़र्ज़ नहीं देने के आरोपों से विचलित हैं. माल्या ने विराट कोहली के ‘चैरिटी डिनर’ में पहुंचकर तब भारतीय क्रिकेट टीम को परेशानी में डाल दिया था लेकिन आज जब वह स्टेडियम में पहुंचे तो उन्हें खुद शर्मसार होना पड़ा.

आज के मैच के दौरान काली पैंट और आसमानी रंग का ब्‍लेजर पहने माल्या जैसे ही स्टेडियम में आये तब कुछ भारतीय दर्शकों ने ‘चोर-चोर’ चिल्लाना शुरू कर दिया. एक प्रशंसक ने माल्या का वीडियो बनाना शुरू कर दिया जबकि एक अन्य जोर से चिल्लाया, ‘वो देखो चोर जा रहा है अंदर. चोर-चोर.’

विजय माल्या भारत के मशहूर और विवादों में रहने वाले व्यापारी रहे हैं. भारत सरकार माल्या के प्रत्‍यर्पण के लिये प्रयास कर रही है. विभिन्न बैंकों से माल्या ने लगभग 9000 करोड़ रुपये का ऋण लिया है जिसका भुगतान नहीं किया गया है. यूबी ग्रुप का यह पूर्व प्रमुख पिछले साल देश छोड़कर भाग गया था. माल्या आरसीबी के मालिक थे.