कहा जाता है कि शान्ति तलवार की धार पर उतर कर आती है और संसार का इतिहास और कुछ नहीं बल्कि युद्धों की गाथा है। वैसे तो भारत भूमि पर प्राचीन काल से आज तक अनेकों युद्ध लड़े गए लेकिन कुछ युद्ध या लड़ाइयां ऐसी हुई जिन्होंने आने वाले समय पर अपनी गहरी राजनीतिक छाप छोड़ी।  इस पोस्ट में आज आप पढ़ेंगे ऐसे 5 भयानक युद्ध जिन्होंने भारत का इतिहास बदल कर रख दिया:

कलिंग का युद्ध (261 ईसा पूर्व) – अशोक और कलिंग की सेना

ईरान से लेकर बर्मा तक फैले विशाल मौर्य साम्राज्य के सम्राट अशोक और स्वतन्त्रता प्रिय छोटी सी रियासत कलिंग (वर्तमान उड़ीसा) के बीच हुआ यह युद्ध अपनी आक्रामकता एवं भीषण नरसंहार के लिए प्रसिद्ध है। उपलब्ध जानकारी के आधार पर कलिंग की और से 60000 सिपाही की सेना लड़ाई के मैदान में थी, वहीँ मौर्य सेना में 1 लाख से अधिक सिपाही थे। साथ ही कलिंग आत्मसम्मान के इस युद्ध में आहुति देने के लिए हजारों की तादाद में सामान्य सशस्त्र नागरिक भी युद्ध में तैनात थे।

इस युद्ध में महा-नरसंहार हुआ, लगभग समस्त कलिंग सेना नेस्तनाबूद हुई और मौर्य सेना को भी विजय की भारी कीमत चुकानी पड़ी। युद्ध की विभीषिका देख कर सम्राट अशोक के ह्रदय-परिवर्तन के बाद बौद्ध धर्म स्वीकार कर लेने और भविष्य में युद्ध नहीं करने की प्रतिज्ञा विश्व-विदित है। लेकिन इस प्रतिज्ञा और भारत के सबसे शक्तिशाली सम्राट के बौद्ध धर्म ग्रहण कर अहिंसा के पथ पर चले जाने का प्रभाव भारत के इतिहास पर हमेशा के लिए लिखा गया। बौद्ध धर्म का प्रभाव बढ़ता गया और फिर एक समय संसार के सबसे आक्रामक साम्राज्य के अधिकाँश राजा अहिंसा पथ पर चल पड़े। परिणाम यह हुआ कि सैन्य बल में कम होते हुए भी विदेशी हमलावर अपनी आक्रमक रणनीति के बल पर यहां के राजाओं को परास्त करने में सफल रहे।

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तराइन की दूसरी लड़ाई (1192) – पृथ्वीराज चौहान और मुहम्मद गौरी

सन 1191 तक भारत मुख्य रूप से हिन्दू राजपूत राजाओं के अनेक साम्राज्यों में बंटा हुआ था। इससे पहले कुछ पश्चिमी हमलावर यहाँ आये जरूर लेकिन वो भारत के पश्चिमी भू-भाग तक लूट-पाट करने तक सीमित रहे और वापस लौट गए।

सन 1191 में पहली बार अफगानिस्तान के गौर प्रान्त के मुहम्मद गौरी ने भारत पर आक्रमण किया। उसका मुकाबला दिल्ली के उत्तर-पश्चिम में स्थित तराइन के के मैदान में राजा पृथ्वीराज चौहान से हुआ। गौरी की हार हुई लेकिन अगले वर्ष वह फिर और ज्यादा तैयारी और सेना के साथ वापस लौटा।

सन 1192 के इस तराइन के युद्ध में अपनी आक्रामक घुड़सेना और रणनीति से उसने चौहान की भारी-भरकम सेना को हरा दिया।

पृथिवीराज चौहान इस लड़ाई में मारा गया। इस युद्ध के बाद भारत में राजपूत राजाओं के राज का धीरे-धीरे अंत हो गया।

भारत के इतिहास पर इस युद्ध से ज्यादा राजनीतिक-सामाजिक प्रभाव किसी और युद्ध का नहीं पड़ा। भारत में इस्लामिक शासन की शुरुआत इसी युद्ध से मानी जा सकती है।

पानीपत का युद्ध (1526) – बाबर और इब्राहिम लोदी

उस समय दिल्ली पर लोदी सल्तनत के इब्राहिम लोदी का राज था। दिल्ली के पास स्थित पानीपत में काबुल के शासक बाबर और इब्राहिम लोदी की सेनाओं के बीच भयंकर युद्ध हुआ। लोदी की सेना संख्या में अधिक और ज्यादा शक्तिशाली थी किन्तु उस समय के सामरिक हथियारों से कहीं उन्नत हथियार – अपनी 24 तोपों – के दम पर बाबर ने लोदी की सेना को हरा दिया और इस लड़ाई में इब्राहिम लोदी की मौत हुई। इस प्रकार संसार के सबसे शक्तिशाली और लम्बे समय तक चलने वाले साम्राज्यों में से एक – मुग़ल शासन – की भारत में स्थापना हुई।

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मुग़ल शासन ने भारत के राजनीतिक, आर्थिक एवं सामजिक इतिहास को हमेशा के लिए बदल कर रख दिया। आज जो भारत, विशेषकर उत्तर भारत, का ताना – बाना है, उसकी नींव मुग़ल शासन की स्थापना के साथ ही रख दी गई थी।

प्लासी का युद्ध (1757) – लार्ड क्लाइव और नवाब सिराजुद्दौला

प्लासी की लड़ाई ने भारत में अंग्रेजों के पांव मजबूती से जमा दिए। लार्ड क्लाइव के नेतृत्व में ब्रिटिश ईस्ट इंडिया कंपनी की सेना ने नवाब सिराजुद्दौला की सेना को प्लासी की लड़ाई में पूरी तरह से तहस-नहस कर के बंगाल में ब्रिटिश शासन स्थापित कर दिया।

उस समय भारत में फ्रांसीसियों और अंग्रेजों के बीच व्यापारिक और भविष्य के सामरिक आधिपत्य को लेकर संघर्ष चल रहा था। सिराज-उद -दौला फ्रांसीसियों के समर्थन में था। सन 1756 में उसने अंग्रेजों के कलकत्ता स्थित व्यापार केंद्र पर हमला कर वहां मौजूद ब्रिटिश फ़ौज का नर-संहार कर दिया था।

प्लासी की लड़ाई में में मीर जाफर ने सिराजुद्दौला से गद्दारी कर ब्रिटिश फौजों का साथ दिया। इस लड़ाई के बाद कुछ समय बंगाल की कमान मीर जफ़र के हाथ रही किन्तु अंग्रेजों को चस्का लग चूका था और जल्दी ही उन्होंने वहां का शासन अपने हाथ में लेकर खुद ही बंगाल में राज करना आरम्भ कर दिया। यहाँ से कमाई हुई दौलत के बल उन्होंने अपनी सेना को और मजबूत किया और धीरे धीरे पूरे भारत में अपने साम्राज्य की स्थापना कर डाली।

कोहिमा का युद्ध (1944) – इंग्लैंड (ब्रिटेन) और जापान

कोहिमा भारत में बर्मा की सीमा के निकट नागालैंड में स्थित है। कोहिमा का यह युद्ध इतिहास में “पूरब के स्टालिनग्राद‘ के नाम से प्रसिद्ध है। यहां पर मिली पराजय द्वितीय विश्व-युद्ध के दौरान जापानी फौजों को मिलने वाली सबसे महत्वपूर्ण शिकस्त थी जिसने भारतीय उपमहाद्वीप और संभवतया सारे संसार में जापानियों को बढ़ने से रोक दिया।

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बर्मा पर जापानियों का आधिपत्य था जिन्होंने भारत में आधिपत्य की महत्वाकांक्षी योजना बनाई ताकि यहाँ सम्पदा का इस्तेमाल युद्ध में किया जा सके और अंग्रेजों की ताकत को कमजोर किया जा सके क्यूंकि अंग्रेज भी उस समय सेना और संसाधनों के लिए भारत पर ही निर्भर थे।

खैर, इस भयानक युद्ध में जापानियों की हार हुई और भारत का इतिहास नए सिरे से लिखते-लिखते रह गया। यदि भारत या इसके बड़े भू-भाग पर जापानी अपना कब्ज़ा ज़माने में कामयाब हो जाते तो यह मित्र देशों के लिए बड़ा सामरिक नुक्सान होता। साथ ही भारत का इतिहास भी हमेशा के लिए बदल जाता क्यूंकि संभव है कि मात्र तीन वर्ष बाद भारत को मिलने वाली स्वतंत्रता जापानी शासन के तले संभव न हो पाती।