श्री राम तुम वन में भले

भुवनेश कुमार

श्री राम तुम वन में भले,श्री राम तुम वन में भले
घर तो खंडहर हो चुके
मन भी मलिन हो गये
अब वहाँ कैसे रहोगे

हे राम तुम वन में भले।।

जो भी पाना चाहता था,
श्री राम पहले आप को,
शुद्ध मन संकल्प से वो,
पूजता फिर आपको।
ध्यान, विनती, आरती अब,
हो गये सब चोंचले,
हे राम तुम वन में भले।।
वन प्राणी जीव पशु सब
लालसा की बलि चढ़े,
जो बचे खूनी दरिंदे,
सब नगर में आ गये,
अब वहाँ कैसे रहोगे
हे राम तुम वन में भले।।
पूछते हैं आज हमसे,
दुष्ट कैसा प्रश्न ये,
तोड़कर तेरे घरों को,
देखो इन के हौसले,
निर्लज्ज देखो कहें,
क्या कभी तुम भी हुए ?
हे राम तुम वन में भले।।
अब कहाँ वो प्रेम जो,
जूठे बेर शबरी के चखे,
भाई देखो काटता है
भाइयों के ही गले,
अनगिनत लंका यहाँ
हर घड़ी सीता हरे।
हे राम तुम वन में भले।।
देश तो है वही प्रभु
आप जो देकर गये,
रामनवमी आज है,
हो कहाँ खोए हुऐ,
संसार वन में हे प्रभु!
तेरे सहारे हम चले।हे राम तुम वन में भले।
श्री राम तुम वन में भले।।
– भुवनेश कुमार
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सरिता महर

Author: सरिता महर

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