नोट बंदी का उत्तर प्रदेश चुनाव पर क्या है असर? किस पार्टी को होगा फायदा ?

भाजपा की विपक्षी पार्टियों को नोटबंदी ने फैसले के बाद अपने चुनाव प्रचार के लिए कैंपेन फंड की प्लानिंग नए सिरे से करनी पड़ रही है.

मुख्य बिंदु :
1. भ्रष्टाचार और काले धन के खात्मे के लिए 500 और 1000 के नोट का चलन भारत सरकार द्वारा अभी हाल ही में बंद कर दिया गया है.
2. भारत में  चुनाव के समय काले धन का खुल कर इस्तेमाल होता है.
3. हालांकि कैंपेन फंडिंग की सफाई अभी भी दूर की कौड़ी है.

effect of demonetization on up electionनरेंद्र मोदी के 8 नवम्बर के विमुद्रीकरण यानी 500 और 1000 के नोटबंदी के फैसले की आलोचना के पीछे एक बड़ा कारण उत्तर प्रदेश चुनावों को बताया जा रहा है. कहा जा रहा है कि नरेंद्र मोदी ने नोटबंदी की घोषणा की टाइमिंग यूपी इलेक्शन को ध्यान में रख कर कि ताकि भाजपा के विरोधी दलों को चुनाव में जोरदार झटका लगे. यह भी आरोप लगाए जा रहे हैं कि भाजपा ने इस महत्वपूर्ण इलेक्शन से पहले ही अपनी राजनीतिक प्रचार हेतु धन राशि का इंतेजाम करने के बाद अचानक ही नोटबंदी की घोषणा कर दी और इससे विपक्षी दलों को चुनाव प्रचार में धन का जुगाड़ करने में खासी परेशानी आने वाली है.

साथ ही कुछ लोगों का यह भी मानना है कि बैंकों के सामने लगती लंबी कतारों में खड़ा आम आदमी, जो अपना पैसा निकालने के लिए लाइन में लगा है, नरेंद्र मोदी सरकार के इस फैसले से खासा खफा है और भाजपा को आगामी उत्तर प्रदेश चुनावों में इसका खामियाजा भुगतान पड़ सकता है.

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ध्यान रहे कि हाल के राज्य विधान सभा चुनावों में एक के बाद भाजपा के लिए निराशाजनक परिणाम सामने आये हैं और उत्तर प्रदेश का चुनाव नरेंद्र मोदी-अमित शाह की जोड़ी के लिए 2019 लोकसभा चुनाव की अग्नि परीक्षा साबित हो सकता है.

भारत में चुनावों में किसी किसम की सरकारी फंडिंग के अभाव में काला धन चुनाव प्रचार का सबसे महत्वपूर्ण श्रोत है. इस काले धन का संग्रह मुख्यत; चुनाव प्रत्याशियों और व्यापारिक संस्थानों से किया जाता है. इस धन का इस्तेमाल मुख्यतः हेलीकॉप्टरों के  दौरे, रैलियों में भीड़ इकठ्ठा करने में और वोटरों से वोट खरीदने के लिए किया जाता है.

माना जा रहा है कि बड़े नोटों पर बैन के बावजूद उत्तर प्रदेश विधान सभा चुनावों में 40 बिलियन रुपये का धन खर्च होने वाला है जिसका बड़ा हिस्सा अभी भी काले धन से ही आने वाला है.

नरेंद्र मोदी के विमुद्रीकरण की योजना का युवा वर्ग ने खासा स्वागत भी किया है जो वैसे भी मोबाइल बैंकिंग और डिजिटल ट्रांजैक्शंस करने के अभ्यस्त हैं लेकिन किसान, मजदूर और समाज के वंचित तबके जैसे आदिवासियों के मध्य इसके नुकसानदेह प्रभाव नकारे नहीं जा सकते क्योंकि रोजमर्रा के खर्च पुरे करने के लिए आ रही कैश की तंगी से यह वर्ग खासा परेशान है.

विपक्षी पार्टियां नोटबंदी के खिलाफ इसी सेन्टीमेन्ट को भुनाने में लग गयी हैं. हालांकि विपक्षी दलों को डर है कि केंद्र में सत्ता में होने और बड़े कॉरपोरेट्स से अपनी निकटता का फायदा उठा कर भाजपा उत्तर प्रदेश चुनावों के लिए फंड का जुगाड़ कर लेगी और अन्य दलों को चुनाव प्रचार के लिए फंड की कमी आड़े आ सकती है.

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नरेंद्र मोदी के लिए उत्तर प्रदेश का चुनाव जीतना बहुत जरुरी है क्योंकि न केवल इससे राज्य सभा में भाजपा के पक्ष में संख्या बल झुकेगा वहीँ 2019 के आम चुनाव से पहले पार्टी की स्थिति मजबूत होगी.

चुनाव में राजनीतिक दलों द्वारा खर्च की जाने वाली राश को ट्रैक करने वाली रिसर्च कंपनियों का मानना है जहाँ भाजपा कुल चुनाव खर्च का 60-70 % ही कैश में करती है वहीँ समाजवादी पार्टी और बहुजन समाज पार्टी 80-90% चुनाव प्रचार कैश के दम पर करती हैं.

कुछ राजनीतिक पार्टियां अभी से अपने कार्यकर्ताओं को पुराने 500 और 1000 के नोट दे रही हैं जिन्हें वे अपने खाते में जमा कर रहे हैं ताकि इलेक्शन में इस राशि का इस्तेमाल किया जा सके.

यही कारन है कि भाजपा के आलावा कोई भी पार्टी जनवरी से पहले किसी बड़ी रैली का एलान नहीं कर पा रही है क्योंकि भाजपा के आलावा किसी के पास रैली में भीड़ जुटाने के संसाधन मौजूद नहीं हैं.

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मायावती, जिनकी बसपा चुनाव में भाजपा की सबसे प्रमुख प्रतिद्वंदी है, ने खुलेआम नोटबंदी के फैसले को राजनीतिक बताते हुए इसे वापस लेने की मांग भी की थी.

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सरिता महर

Author: सरिता महर

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